मालवीय को भारत रत्न: 'इतिहास से खेलने जैसा'

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है.

इस घोषणा के बाद फिर भारत रत्न सम्मान पर राजनीति और भेदभाव के आरोपों का दौर शुरू हुआ है.

इस पर बीबीसी हिंदी ने कुछ नामचीन विश्लेषकों की राय जानने की कोशिश की, पढ़िए किसने क्या कहा?

कांग्रेसी मणिशंकर अय्यर

अटल बिहारी वाजपेयी जी को भारत रत्न मिलना ही चाहिए था. खासकर इसलिए कि जब वे सरकार में थे, तब उन्होंने संघ परिवार और आरएसएस पर कुछ अंकुश रखा था.

उनकी सरकार के वक्त कहीं कोई सांप्रदायिकता नहीं फैली. इसलिए मैं समझता हूं कि वे नेक आदमी हैं.

लेकिन मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न आज देने से खामख्वाह ये बताने की कोशिश की जा रही है कि स्वतंत्रता आंदोलन में हम सब एक नहीं थी.

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उनके रोल को बढ़ाकर, दूसरो को कम दिखाने की कोशिश की जा रही है. ये इतिहास से खेलने जैसा है.

मेरे ख्याल से उनको ये सम्मान इसलिए दिया जा रहा है कि वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे, इसलिए नहीं कि उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में कितना योगदान दिया.

उनके समय तक तो हिंदू महासभा नियंत्रण में था. उनके जाने के बाद और वीर सावरकर के आने के बाद हिंदू महासभा हाथ से निकल गया.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा

भारत रत्न से अब तक जिन लोगों को सम्मानित किया गया है, उस सूची देखते हुए लगता है कि अटल बिहारी वाजपेयी को ये सम्मान मिलना ही चाहिए.

अगर राजीव गांधी, एमजीआर जैसे लोगों को ये दिया जा सकता है तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी- जो प्रधानमंत्री रहे, 40 साल तक संसद में रहे, बेहतरीन वक्ता रहे, सही ज़ुबान बोलते रहे - उन्हें क्यों नहीं.

लेकिन मदन मोहन मालवीय को देना बिलकुल ग़लत है. स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान बहुत कम था.

गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक का उनसे ज़्यादा योगदान था. लेखक और विद्धान के लिहाज से रविंद्र नाथ टैगोर का योगदान ज्यादा था.

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नरेंद्र मोदी खुद वाराणसी से सांसद हैं, इसलिए वे किसी बनारसी को ये सम्मान देना चाहते होंगे.

मेरे ख्याल से जिनका निधन हो गया है, उन्हें नहीं देना चाहिए. इतना ही नहीं नेताओं को कम से कम देना चाहिए. इसे नान पॉलिटकल बनाना चाहिए.

इसकी कमेटी से राजनेताओं को हटाया जाना चाहिए. तब जाकर भारत रत्न का सम्मान बढ़ेगा.

सीपीएम सांसद मोहम्मद सलीम

ये राजनीतिक फ़ैसले हैं और हम वामपंथी, सरकार की दी गई उपाधि को बहुत ज़्यादा महत्व नहीं देते हैं.

यही कारण है कि जब ज्योति बासु को ये उपाधि देने की बात की गई तो इनकार कर दिया गया था.

आम लोगों के बीच में काम करके लोग अमर होते हैं, न तो किसी सर या नाइटहुड या राजा बहादुर सम्मान से.

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भारत रत्न एक दो को दिया जाता तो भी ये रत्न होता, अब तो ये एक दम हीरे जवाहरात की तरह बांटे जा रहे हैं.

दूसरी बात ये है कि भारतीय जनता पार्टी की आज़ादी की लड़ाई में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं है.

न ही स्वाधीनता संग्राम में इनका कोई आइकन था, इसलिए वो कभी स्वच्छता के नाम पर गांधी जी को, कभी सरदार पटेल को खींच रहे हैं देश प्रेम के नाम पर.

वाजपेयी जी को तो ये लोग पिछले पांच साल से याद तक नहीं कर रहे हैं. अगर भाजपा पिछले 10 साल में वाजपेयी जी को बहुत सम्मान देकर रखती तो माना जा सकता था.

मदन मोहन मालवीय जी के बारे में भी यही कहना है कि राजनीतिक सोच के आधार पर राजतंत्र जैसा व्यवहार किया जा रहा है.

मरणोपरांत देना हो तो महात्मा गौतम बुद्ध को देना चाहिए. उसके बाद भाजपा जिन 33 करोड़ देवताओं को इतिहास पुरूष मानती है, उन सबको देना चाहिए भारत रत्न.

गिरिधर मालवीय, मदन मोहन मालवीय के पोते

भारत रत्न में देरी की बात तो मानी जा सकती है. पहले भारत रत्न मरणोपरांत नहीं दिए जाते थे.

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जब मरणोपरांत सम्मान दिए जाने की शुरुआत हुई तो लोगों ने मदन मोहन मालवीय के नाम पर विचार नहीं किया होगा.

मुझे ऐसा लगता है मोदी जी जब पहली बार बनारस गए और वहां उनकी प्रतिमा पर माल्यापर्ण करने गए, तभी उन्होंने सोचा होगा कि इन्हें भारत रत्न मिलना चाहिए था.

इसलिए हम लोग तो उनके शुक्रगुजार हैं.

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