बाबा आमटेः कार रेसिंग से कुष्ठरोगियों की सेवा तक...

बाबा आमटे इमेज कॉपीरइट Lok Biradari Prakalp

पेशे से वकील मुरलीधर देवीदास आमटे ने करियर और आराम की ज़िंदगी छोड़ कर अपना जीवन कुष्ठरोगियों, आदिवासियों और वंचित तबकों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था.

बाद में उन्हें बाबा आमटे कहा जाने लगा. 1914 में पैदा हुए बाबा आमटे के जन्म के सौ साल 26 दिसंबर को पूरे हो रहे हैं.

उनका जन्म महाराष्ट्र में वर्धा जिले के ज़मींदार घराने में हुआ था. वे तेज़ कार चलाने के शौकीन थे. अंग्रेज़ी फिल्मों पर लिखी उनकी समीक्षाएं लोग काफ़ी पसंद करते थे. वकालत की पढ़ाई के बाद वे गांधी जी के साथ सेवाग्राम आश्रम में रहने लगे थे. तब उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और जेल भी गए. बाद में वे समाज सेवा में जुट गए.

बाबा आमटे की शुरू की गई संस्थाएं आज भी न सिर्फ़ उनके कामों को जारी रखे हुए हैं बल्कि आगे बढ़ा रही हैं.

बीबीसी हिंदी के लिए देवीदास देशपांडे ने गढ़चिरौली का दौरा किया और बाबा आमटे से जुड़ी संस्थाओं का जायज़ा लिया.

'सेवा करो, ज़रिया कोई भी हो'

इमेज कॉपीरइट Devidas Deshpande

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले के हेमलकसा कस्बे में बाबा आमटे ने लोक बिरादरी प्रकल्प की स्थापना की थी. यहां स्थानीय आदिवासियों के विकास के लिए काम किया जाता है.

आमटे परिवार की तीसरी पीढ़ी,- बाबा आमटे के पुत्र डॉ. प्रकाश के बेटे अनिकेत और दिगंत, यहां की ज़िम्मेदारी संभालते हैं.

अनिकेत कहते हैं, "मानव को सम्मानित जीवन देना बाबा आमटे का मूल विचार था जो आज भी जारी है. हम यहां आदिवासी छात्रों को मुफ़्त शिक्षा देते हैं और लोगों का मुफ़्त इलाज करते हैं."

"यहां पढ़े हुए अनेक छात्र सरकारी अफ़सर और पुलिसकर्मी बने हैं लेकिन 99 प्रतिशत छात्र इसी इलाके में काम करते हैं. वे लोग बाबा आमटे के विचारों एवं व्यक्तित्व से प्रेरित होकर काम करते हैं. हम इसे एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं."

इमेज कॉपीरइट Devidas Deshpande
Image caption डॉक्टर प्रकाश आमटे और अनिकेत आमटे हेमकलसा में.

लोक बिरादरी प्रकल्प के प्रमुख डॉक्टर प्रकाश आमटे बताते हैं, "यह बाबा की दूरदृष्टि थी कि उनका काम केवल कुष्ठरोगियों तक सीमित न रहे. जब मैंने उनसे कहा कि मैं आदिवासियों के लिए काम करना चाहता हूं तो उन्हें बड़ी खुशी हुई. आनंदवन का काम मेरे बड़े भाई विकास संभालने लगे और मैंने पत्नी मंदाकिनी के साथ 1973 में यहां इस प्रकल्प की स्थापना की."

डॉ. प्रकाश कहते हैं कि बाबा का विचार यह था कि समाज की सेवा करनी चाहिए, उसका ज़रिया चाहे जो हो. इसलिए 10 साल तक वे नर्मदा आंदोलन से जुड़े रहे और आनंदवन में नहीं आए.

शिक्षा और स्वास्थ्य

इमेज कॉपीरइट Devidas Deshpande

हेमलकसा कसबे में आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल बना जहां आज 650 के आस पास बच्चे पढ़ते हैं. आमटे दंपति मरीज़ों का उपचार करते हैं. स्थानीय लोगों द्वारा मारे गए जंगली जानवरों के बच्चों के लिए यहां एक प्राणी अनाथालय भी शुरू किया गया, जहां आज करीब 60 जानवर हैं.

चंद्रपुर से 150 किमी दूर यह इलाका नक्सलवाद से प्रभावित भी है.

डॉ. प्रकाश कहते हैं. "अब तक यहां अस्पताल नहीं है. कभी-कभी तो 200 मरीज़ बरामदे में सोते थे. अब हमने जो नया अस्पताल बनवाया है. वह गढ़चिरौली के सरकारी अस्पताल के बाद दूसरा अस्पताल है. इस नए अस्पताल में 50 चारपाइयां होंगी."

इमेज कॉपीरइट Devidas Deshpande
Image caption हेमकलसा में एक प्राणी अनाथालय भी है.

जिस दिन मैं हेमलकसा पहुंचा, आदिवासी बच्चों का सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था.

बाबा आमटे के साथ चार दशक पहले यहां आए शरद भाऊ ने कहा, " इन बच्चों का कार्यक्रम देखकर कौन कह सकता है, कि ये आदिवासी बच्चे हैं. उनकी पेशकश शहरों के बच्चों से बिल्कुल कम नहीं थी. यह यहां की शिक्षा का परिणाम है."

बाबा आमटे को 1985 में प्रतिष्ठित रेमॉन मेगसेसे पुरस्कार दिया गया था. इतना ही नहीं 2008 में बाबा आमटे के पुत्र और बहू- प्रकाश आमटे और मंदाकिनी आमटे को भी मेगसेसे पुरस्कार मिला था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार