भारत रत्न: मोदी का मास्टर स्ट्रोक?

वाजपेयी और मालवीय को भारत रत्न

किसी शासन की पहचान इससे होती है कि वह अतीत के किस हिस्से और किस तरह की विचारधारा को बढ़ावा देता है और किन ऐतिहासिक शख़्सियतों को नायक के रूप में पेश करता है.

पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री जैसे सम्मान आमतौर पर किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों और समाज के लिए उनके योगदान को स्वीकार करने के लिए दिए जाते हैं.

जहाँ तक 'भारत रत्न' की बात है तो पिछले कई दशक से इसे एक तरह के 'पोलिटिकल स्टेटमेंट' या राजनीतिक संदेश के रूप में देखा-समझा जा रहा है.

'भारत रत्न' दिए जाने के लिए लोगों के चुनाव के हर फ़ैसले से ये स्पष्ट होता है कि उस फ़ैसले के तहत किसे अपनाया या सम्मानित किया गया है और किसे बाहर रखा गया है.

अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) को 'भारत रत्न' देने के मोदी सरकार के फ़ैसले को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए.

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नरेंद्र मोदी सरकार बड़े और फैले हुए, लेकिन संकीर्ण विचारधारा वाले राजनीतिक समुदाय (संघ परिवार) का हिस्सा है.

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संघ परिवार को हमेशा से शिकायत रही है कि आज़ादी के बाद की सरकारों ने ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को जैसे पेश किया है, उसमें 'हिंदू' नायकों के साथ न्याय नहीं हुआ है.

संघ समर्थकों का ख़ासकर तथाकथित मार्क्सवादी इतिहासकारों पर आरोप रहा है कि उनका इतिहास लेखन हिंदूविरोधी पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहा है.

सावरकर मूर्ति विवाद

इस संदर्भ में उदाहरण के तौर पर हमें याद करने की ज़रूरत है कि एनडीए सरकार (1998-2004)ने किस तरह से संसद के सेंट्रल हॉल में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा के ठीक सामने वीर सावरकर का पोट्रेट लगाने का फ़ैसला किया था.

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पिछले कुछ दशकों से संघ परिवार ने ऐसी कई ऐतिहासिक शख़्सियतों और विचारधाराओं को आगे बढ़ाने का काम किया है जो उनके अनुसार नेहरूवादी सोच और मूल्यों के विरोध में खड़ा होने का माद्दा रखती हैं.

इसके अलावा एक बात और ध्यान रखने की है. चूंकि संघ परिवार के नेताओं का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कोई ख़ास योगदान नहीं रहा है, इसलिए भगवा ब्रिगेड महात्मा गांधी को अक्सर निशाना बनाती रही है.

गांधी और पटेल

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भगवा विचारधारा ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने में गांधी की ऐतिहासिक भूमिका और हिंदू-मुस्लिम एकता की लगातार वकालत करते रहने के लिए हमेशा उनकी आलोचना करती रही है.

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के महत्व को कमतर आंकना, भाजपा नेतृत्व के लिए, राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की पार्टी होने के कांग्रेस के दावे और उसकी ऐतिहासिक अहमियत को कमज़ोर करने की संघ परिवार की पुरानी रणनीति का अहम हिस्सा रहा है.

हाल ही में सरदार पटेल को अपनाने की मौजूदा सरकार की कोशिश भी देश को नेहरूवादी सोच और विरासत से दूर ले जाने की संघ परिवार की पुरानी नीति का ही एक हिस्सा है.

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इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि मोदी सरकार ने पहला मौक़ा मिलते ही अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को 'भारत रत्न' देने का फ़ैसला किया है.

उनके इस फ़ैसले के पीछे दो कारण हो सकते हैं.

हिंदूवादी छवि

पहले बात मदन मोहन मालवीय की.

याद करें, वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते वक़्त नरेंद्र मोदी की छवि गढ़ने वालों ने कैसे पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) की हिंदूवादी छवि को भुनाने की कोशिश की थी.

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महात्मा गांधी और नेहरू के विपरीत मालवीय को एक रूढ़िवादी हिंदू विचारधारा वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता रहा है.

मालवीय को अपनाने की कोशिश 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंदू वोट को एकजुट करने की भाजपा की व्यापक नीति का हिस्सा रही थी.

ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि वाराणसी चुनाव अभियान के अंतिम दौर में अरुण जेटली और अमित शाह ने चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ विरोध दर्शाने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सामने मालवीय की प्रतिमा की जगह को ही चुना था.

मास्टर स्ट्रोक

'भारत रत्न' के लिए मालवीय को चुनकर प्रधानमंत्री मोदी ने फ़िलहाल कुछ समय के लिए संघ परिवार को तो ख़ुश कर ही दिया है.

उसी तरह वाजपेयी को 'भारत रत्न' देने का फ़ैसला मोदी का मास्टर स्ट्रोक कहा जा सकता है.

इससे आडवाणी ख़ेमे के वे लोग ख़ुश हैं, जो पिछले कुछ वर्षों से वाजपेयी को सर्वोच्च सम्मान से नवाज़े जाने की वकालत करते रहे हैं. इसके ज़रिए आडवाणी ख़ुद को वाजपेयी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं.

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Image caption वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद मोदी के इस्तीफे पर अड़ गए.

मोदी ने ऐसा करके उन उदारवादियों को भी ख़ुश कर दिया है, जो वाजपेयी की तरह 2002 के गुजरात दंगों पर उनकी आलोचना करते रहे हैं.

ये उदारवादी आज अपने मन को समझा सकते हैं कि अल्पसंख्यकों के प्रति तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद नई सरकार वाजपेयी की उदारवादी नीति पर चलने के लिए प्रतिबद्ध है.

यह मान सकते हैं कि अगर वाजपेयी शारीरिक रूप से स्वस्थ होते तो वो अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ आजकल चल रही उग्र बयानबाज़ी के ख़िलाफ़ ज़रूर आवाज़ उठाते.

नज़रअंदाज़

वैसे वाजपेयी के लिए 'भारत रत्न' का सम्मान एक विडंबना भी है.

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प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी और संघ परिवार के बीच राम मंदिर मसले पर हमेशा तनातनी रही थी.

और अब तो यह भी जगज़ाहिर है कि जब वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े पर अड़े, तो कैसे उनकी अपनी ही पार्टी ने उन्हें उनकी बात नहीं मानी थी.

आडवाणी जैसे उनके आजीवन सहयोगियों के हाथों मिले इसी अपमान ने ही, वाजपेयी को दक्षिण एशिया में सुलह-सफ़ाई की नीति अपनाने के लिए एक और प्रयास के लिए प्रेरित किया था.

योग्य राजनेता

टकराव की राजनीति की वकालत करने वाले कुछ चतुर नेताओं को नकारते हुए वाजपेयी ने एक कुशल राजनेता के रास्ते पर चलने का प्रयास किया.

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पहले वह अलग-थलग हो चुके कश्मीरियों से बातचीत के लिए घाटी पहुंचे और फिर जनवरी 2004 के पहले हफ़्ते में पाकिस्तान यात्रा की, जिसमें ऐतिहासिक इस्लामाबाद घोषणापत्र जारी हुआ.

वाजपेयी ने संघ परिवार की देश के भीतर या विदेश नीति का विरोध करने का दृढ़संकल्प कर लिया था.

वाजपेयी के इसी संकल्प ने उन्हें राजनेता से 'स्टेट्समैन' बना दिया था, जो देश के सर्वोच्च सम्मान के पूरी तरह योग्य हो.

(हरीश खरे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार (जून 2009 - जनवरी 2012) रहे. उनकी किताब 'हाउ मोदी वॉन इट- नोट्स फ्रॉम 2014 इलेक्शन' हाल में प्रकाशित हुई)

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