साल 2014 के उल्लेखनीय कविता संग्रह

कविता 2014, हिन्दी साहित्य

हिंदी में अच्छे स्तर की कविताएँ खूब लिखी जा रही हैं. वर्ष 2014 में करीब पंद्रह कविता-संग्रह मेरे पास आए हैं. ज़ाहिर है यह सीमित संख्या है और सिर्फ़ इनके आधार पर पूरे कविता परिदृश्य पर कहना कठिन है.

इनमें कुछ तो वरिष्ठ रचनाकारों की हैं - केदारनाथ सिंह : 'सृष्टि पर पहरा (राजकमल)', नन्दकिशोर आचार्य की किताबें 'मृत्यु शर्मिंदा है ख़ुद' और 'मुरझाने को खिलाते हुए' (सूर्य प्रकाशन, बीकानेर), दिवंगत कवि वेणु गोपाल की अप्रकाशित कविताओं का संग्रह 'और ज़्यादा सपने (दख़ल)', शरद कोकास : 'हमसे तो बेहतर हैं रंग (दख़ल)', मोहन डहेरिया : 'इस घर में रहना एक कला है (दख़ल)', सुधीर रंजन सिंह : 'मोक्षधरा (राजकमल)' और हरिओम राजोरिया: 'नागरिक मत (दख़ल)'. बाकी सभी युवा कवियों के संग्रह हैं. इस वर्ष सिर्फ़ एक स्त्री कवि का संग्रह मुझे मिला है, प्रसून प्रसाद : 'जंगल जो दरवाज़े पर शुरू होता है' (सतलुज)'.

महुए की टपक

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Image caption फ़िल्म गीतकार गुलज़ार और कवि केदारनाथ सिंह(दाएँ)

केदार की किताब पर तो क्या कहें, उन्हें इस साल ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है. ताज़ा संग्रह में मुझे सबसे ज़्यादा 'भोजपुरी' शार्षक कविता ने प्रभावित किया. आज जब भाषाएँ विलुप्त होती जा रही हैं, अनोखे ढंग से केदार ने मातृभाषा के लिए कहा है, '...क्रियाएँ खेतों से...संज्ञाएँ पगडंडियों से...बिजली की कौध और महुए की टपक ने ..दी थीं..ध्वनियाँ'.

नन्दकिशोर जी की कविताओं में सघनता होती है. दोनों संग्रह एकांत में बैठ पढ़ने की माँग करते हैं. इसके विपरीत वेणुगोपाल की कविताएँ अपने अपेक्षित तेवर के साथ हमारे सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करती हैं. पर साथ ही कुछ कविताएँ अंदर की ओर झाँकती भी हैं. 'फूलों में क़ैद कवि' कविता में वे कहते हैं - 'वह यह तो जानता है कि दीवारें कैसे तोड़ी जा सकती हैं/ लेकिन फूलों के आगे वह लाचार है.'

शरद कोकास, मोहन डहेरिया, सुधीर रंजन सिंह और हरिओम राजोरिया पिछली सदी के आखिरी दशकों में उभरे प्रतिबद्ध कवियों में से हैं और उनके ताज़ा संग्रहों के विविध रंग की कविताओं में उसी की झलक है.

कविता रचने की बेचैनी

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युवाओं में चुनकर नाम लेना ग़लत होगा क्योंकि विविध होते हुए भी कमोबेश एक स्तर की कविताएँ कई युवा कवि लिख रहे हैं.

मेरे पास मौजूद संग्रहों में कुछ उल्लेखनीय हैं, दख़ल प्रकाशन से शिरीष मौर्य: 'दन्तकथा और अन्य कविताएँ', अशोक कुमार पाण्डेय: 'प्रलय में लय जितना', तुषार धवल : 'ये आवाज़ें कुछ कहना चाहती हैं', जसम की प्रकाशित मृत्युंजय की 'स्याह हाशिए'.

इन सब की कविताओं में कई तरह की बेचैनी है. यह बेचैनी कविता रचने की और सार्थक कुछ कह पाने की भी है. प्रसून की कविताओं में अलग ढंग की परिपक्वता है जो आगे के लिए उम्मीद जगाती हैं.

समकालीन सामाजिक मुद्दों के अलावा अपने परिवेश के प्रति खास संवेदनशीलता इनकी कविताओं में हैं. कहना न होगा कि ये अपनी उम्र में पिछली पीढ़ियों से अधिक पढ़े-लिखे और सचेत दिखते हैं.

कविता में जनपक्ष

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हिंदी कविता में जनपक्ष मुखर रहा है, इसलिए कइयों को लगता है कि साफबयानी न हो तो कविता सार्थक नहीं है. इस वजह से शब्दों का अतिरेक होना और प्रयोगों से परहेज आम बात है. जबकि प्रयोगधर्मी होना और नए अंदाज़ की तलाश कविता-कर्म की शर्त है.

अक्सर समकालीन प्रसंग को सीधे-सीधे कह देने को ही लोग कविता मान लेते हैं. ऐसी कविता रेटरिक में आगे हो सकती है, पर यह सोचना चाहिए कि वह पिछली पीढ़ियों से किस मायने में अलग है.

जीवन में अपने विचारों के पक्ष में सक्रिय होना ज़रूरी है, कविता में बयान करके बच निकलना तो बेईमानी है. इन बातों को मैं अपने लिए सबसे पहले कह रहा हूँ. दूसरे कवि सहमत नहीं भी हो सकते हैं.

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