ख़ुदकुशी की कोशिश के बाद....

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अब तक भारत में ख़ुदकुशी में नाकामी का मतलब था जेल. क़ानूनन ऐसे लोगों को धारा 309 के तहत एक साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान था.

मगर अब सरकार का प्रस्ताव है कि इस धारा को हटाया जाए और ख़ुदकुशी की कोशिश को अपराध न माना जाए.

बीबीसी श्रृंखला की पहली कड़ी में आपने पढ़ा एक व्यक्ति के आत्महत्या के फ़ैसले तक पहुंचने और इसकी कोशिश करने की कहानी.. अब पढ़ें बचने के बाद नई ज़िंदगी को लेकर उनके हौसले की कहानी.

ख़ुदकुशी की कोशिश करने वाले की आपबीती

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ख़ुद को मौत के गले लगाने का वह क्षणिक फैसला सिर्फ़ कोरे जज़्बात का फ़ैसला नहीं था. मुझे अपने मक़सद का ख़्याल था और एक मन फ़ैसले पर जोड़-घटाव कर रहा था.

मैं इससे भी वाकिफ़ था कि जान है तो जहान है, लेकिन ज़माने की मखौल उड़ाती आँखें मेरी रूह को जकड़े थीं. न जाने मैं क्यों और किस बात पर शर्मिंदा हो रहा था.

इहाबास (जिसे शाहदरा के पागलखाने के नाम से भी जाना जाता है) में जब मुझे दाखिल कराया गया, तो मेरे दोस्तों नें मुझे ताईद की कि मैं अपने ज़ज्बात पर काबू रखूं. मेरा रोना-चिल्लाना मुझे पागल क़रार देने में मददगार होगा.

यहां पहली रात मैं न सोया, न रोया, न सुबका.

फ़रियादी आवाज़ें

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दूसरे बेडों से आ रही कराहें, मधुर गाने की आवाज़ें, सुबक-सुबककर फ़रियादी आवाज़ें और सबको चुप कराती गार्ड की कर्कश आवाज़ ने मुझे सोने नहीं दिया.

दो दिन तक मैंने घंटों की मैराथन काउंसलिंग झेली और डॉक्टरों के पैनल को लाजवाब भी किया, जो किसी भी तरह मुझे मानसिक रोगी घोषित करने पर तुले थे.

लोग न्यूज़ चैनल, अख़बार, और फ़ेसबुक के ज़रिए खबर पाकर मुझसे मिलने आने लगे. वो मुझे समझाते, हौसला देते, सुसाइड वाले हिस्से को छोड़कर मेरी लड़ाई के लिए मेरी तारीफ़ करते.

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लोगों की हमदर्दी और हौसले ने मुझे मेरे डर कि ‘लोग क्या कहेगें’ से जूझने की हिम्मत दी. इसी बल पर मैं कोर्ट में जज को कायल करवा सका कि मैं मानसिक रुप से स्वस्थ हूं और अब ज़िंदगी जीना चाहता हूं.

मुख्यधारा में

मगर मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं था. लोगों की आँखों में मेरे लिए तरह-तरह के सवाल थे. कॉलेज में दोबारा इज़्ज़त के साथ लौटने के बाद मैं विख्यात हो चुका था.

लोग मुझे हाथों-हाथ लेते थे. हर वक़्त कोई न कोई मेरे इर्दगिर्द होता पर मैं ख़ुद को अजनबी महसूस करता था. नए दोस्त भी कई बने लेकिन यह सब मुझे और तन्हा महसूस कराते गए.

सुसाइड के बाद जब मैं पहली बार घर पर गया, तो वहां भी लोगों के व्यवहार में मैंने एक सतर्कता देखी.

हर कोई मुझे खुश रखने की विशेष कोशिश करता नज़र आ रहा था. अम्मा,अब्बा, भाई-बहन, रिश्तेदार समेत गांव के लोग मेरे सामने हँसते हुए चेहरों का साथ हाज़िर होते पर इन चेहरों के पीछे छिपी थी मेरी ज़िंदगी की चिंता.

यह मुझे बार-बार मेरे ख़ुदकुशी के फ़ैसले की कुरुपता का अहसास करा रहा था.

भूलने की कोशिश

मैं ज़िंदगी के अब तक के सबसे काले अध्याय को भुला आगे बढ़ना चाहता था और लोगों से सामान्य व्यवहार की उम्मीद कर रहा था.

कई बार मन में नकारात्मक ख़्याल भी आए लेकिन लोगों के प्यार को याद कर मैं उम्मीद लगाता गया.

समय के साथ मैंने सीखा कि कैसे इन बातों को पीछे छोड़ा जाए. मैं ख़ुद को व्यस्त रखने लगा और फिर पढ़ाई में जुट गया.

फ़ोटोग्राफ़ी

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2013 में मैंने किसी तरह एक पुराना कैमरा खरीदा. पुरानी बातें भूलने में फ़ोटोग्राफ़ी ने भी मेरी बहुत मदद की. सपने पूरे करने की ललक जगाए रखने को मैं दिन-रात भागता रहा.

आज उस घटना को क़रीब तीन साल होने को आए, कभी सोचता हूँ कि मैं कितना खुशकिस्मत हूँ कि मैंने ज़िंदगी की तरफ लौटने का फैसला लिया.

मुझे यक़ीन है कि ज़िंदगी अपनी विषमतओं और उठापटक के बावजूद ख़ूबसूरत है.

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