सूनामी: पकड़ने के लिए शायद मछलियाँ ही न बचें...

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दक्षिण भारत के तटों पर सूनामी का क़हर टूटने के दस साल बाद भी उसका असर मछुआरों के जीवन पर पड़ रहा है.

इतना असर कि इसने श्रीलंका के साथ भारत के संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है.

समुद्री विशेषज्ञ और मछुआरों के संगठन कहते हैं कि वे सूनामी के बाद हुई ग़लतियों को सुधारने की कोशिशों में 'सचमुच चुनौती' का सामना कर रहे हैं.

समुद्र शोध संस्थान में सलाहकार और पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉक्टर ई विवेकानंदन ने बीबीसी को बताया, "सूनामी के बाद मिली आर्थिक सहायता से छोटी नावों और ट्रॉलरों (बड़े जाल से मछलियां फंसाने वाला जहाज़) की संख्या बढ़ गई."

उन्होंने कहा कि ट्रॉलरों के जाल ने समुद्र तल को खुरच कर इकोलॉजिकल यानी पारिस्थितिकी महत्व के कई जीवों के अस्तित्व को प्रभावित किया जो मछली उत्पादन में सहायक थे.

'नुक़सान'

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वैज्ञानिक डॉक्टर विवेकानंदन कहते हैं, "इस बात के सुबूत नहीं हैं कि जैव विविधता को हुए नुक़सान के लिए सूनामी ज़िम्मेदार है. सूनामी के बाद पारिस्थितिकी तंत्र बहुत तेज़ी से सुधरा था."

भारतीय सीमा में मछली पकड़ने के स्थान कम होने से भारतीय मछुआरे श्रीलंका की तरफ़ बढ़ने को मजबूर हो गए.

श्रीलंका का पानी मछली मारने के लिए अच्छा है और इसके दो कारण हैं. पहला तो यह कि गृहयुद्ध के कारण वहां ज़्यादा शिकार नहीं किया गया है और दूसरा यह कि वहां ट्रॉलर पर सख़्त प्रतिबंध है.

मछुआरा समुदाय के एक नेता ने कहा, "दरअसल हमने पाक स्ट्रेट यानी पाक जलडमरूमध्य में एक से दो हज़ार ट्रॉलों को छोड़ दिया."

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डॉक्टर विवेकानंदन के अनुसार समुद्र तल में रहने वाले कई जीव नष्ट हो गए हैं. इनमें कैटफ़िश, सफ़ेद मछली और छोटी प्रजातियां शामिल हैं जो तल में, मध्य में और तो और ऊपर सतह पर भी जिंदा रहती थीं.

'ज़रूरत'

डॉक्टर विवेकानंदन के मुताबिक मछुआरों को एहसास हो गया है कि भविष्य में पकड़ने के लिए ज़्यादा मछलियां नहीं रहेंगी. वे मानते हैं कि यह अच्छा बदलाव है क्योंकि अब वे सुनने को तैयार हैं. इस मौके को छोड़ना नहीं चाहिए.

तमिलनाडु में विश्व बैंक की सहायता वाला पारिस्थितिकी प्रबंधन कार्यक्रम चल रहा है.

दक्षिण भारतीय मछुआरा संघ (सिफ्फी) के पूर्व मुख्य कार्यकारी आधिकारी वी विवेकानंदन कहते हैं, "व्यापक उपाय करने होंगे और जल्दी करने होंगे. सरकार और मछुआरों को बैठकर मछली पकड़ने के नियम तय करने होंगे और धीरे-धीरे मछली के शिकार को कम करना होगा."

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डॉक्टर विवेकानंदन कहते हैं, "कई विकल्पों पर विचार करने की ज़रूरत है. हमें मन्नार की खाड़ी के एक इलाक़े को जीवमंडल सरंक्षित क्षेत्र घोषित कर देना चाहिए."

"इस क्षेत्र के एक हिस्से को समुद्री जीव राष्ट्रीय पार्क घोषित किया जा चुका है. श्रीलंका ने भी एक समुद्री अभ्यारण्य बनाया है. हमें एक संयुक्त नीति बनाने की ज़रूरत है क्योंकि पारिस्थितिकी तंत्र दोनों देश का साझा है."

अलायंस फॉर रिलीज़ ऑफ़ इनोसेंट फ़िशरमैन के अरुलानन्दन कहते हैं, "अगर लोग ट्रॉलर भेजने के बजाय खुद मछली मारने जाएं तो यह समस्या काफ़ी हद तक सुलझ जाएगी."

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