'हिंदू विरोधी’ छवि कांग्रेस के पतन का कारण ?

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लोकसभा चुनावों में हार के बाद विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए निराशाजनक रहे हैं.

मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार पार्टी अपनी 'बिगड़ती छवि' पर चिंतन करने के मूड में है. वहीं यह भी कहा गया कि एक के बाद एक हार मिलने की वजह है पार्टी की 'हिंदू विरोधी' छवि.

हालांकि कांग्रेस के बारे में ऐसे बयान नए नहीं हैं.

लेकिन पार्टी की लोकप्रियता में कमी के कारण शायद कुछ और हैं, जिन्हें समझने के लिए ज़रूरी आत्ममंथन से पार्टी शायद गुज़रना नहीं चाहती?

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कांग्रेस क्या वास्तव में अपनी बिगड़ती छवि से परेशान है? या इस बात से कि उसकी छवि बिगाड़कर ‘हिंदू विरोधी’ बताने की कोशिश की जा रही हैं?

इससे भी बड़ा सवाल यह है कि वह अपनी बदहाली के कारणों को समझना भी चाहती है या नहीं?

छवि वाली बात कांग्रेस के आत्ममंथन से निकली है. पर क्या वह स्वस्थ आत्ममंथन करने की स्थिति में है? आंतरिक रूप से कमज़ोर संगठन का आत्ममंथन उसके संकट को बढ़ा भी सकता है.

अस्वस्थ पार्टी स्वस्थ आत्ममंथन नहीं कर सकती. कांग्रेस लम्बे अरसे से इसकी आदी नहीं है. इसे पार्टी की प्रचार मशीनरी की विफलता भी मान सकते हैं. और यह भी कि वह राजनीति की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ में फेल हो रही है.

आरोप नया नहीं

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यह मामला केवल ‘हिंदू विरोधी छवि’ तक सीमित नहीं है.

पचास के दशक में जब हिंदू कोड बिल पास हुए थे, तबसे कांग्रेस पर हिंदू विरोधी होने के आरोप लगते रहे हैं पर कांग्रेस की लोकप्रियता में तब कमी नहीं आई.

साठ के दशक में गोहत्या विरोधी आंदोलन भी उसे हिंदू विरोधी साबित नहीं कर सका.

वस्तुतः इसे कांग्रेस के नेतृत्व, संगठन और विचारधारा के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. एक मोर्चे पर विफल रहने के कारण पार्टी दूसरे मोर्चे पर घिर गई है.

कांग्रेस की रणनीति यदि सांप्रदायिकता विरोध और धर्मनिरपेक्षता की है, तो वह उसे साबित करने में विफल रही.

आत्ममंथन में जोखिम

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अब पार्टी आत्ममंथन के दौर से गुज़र रही है. यह उसकी सबसे बड़ी परीक्षा का समय है. सवाल है कि क्या आत्ममंथन उसके स्वास्थ्य के लिए नुक़सानदेह होगा?

यह खुली प्रक्रिया है, इसमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल होंगे. इसलिए पार्टी नेतृत्व को असमंजस में डालने वाले मौक़े भी आएंगे.

प्रक्रिया पारदर्शी रही तो स्वस्थ निष्कर्ष भी निकलेंगे, जिनसे पार्टी का ही भला होगा. पर पार्टी को इससे जुड़ा जोखिम भी उठाना होगा.

अचानक इस ख़बर का फैलना कि पार्टी ‘हिंदू विरोधी’ छवि से परेशान है, यह संदेह पैदा करता है कि यह सब उसके प्रतिस्पर्धियों के प्रचार का हिस्सा है.

पर पार्टी ने औपचारिक रूप से अपनी छवि को लेकर या आत्ममंथन के निष्कर्षों को लेकर कुछ कहा भी तो नहीं है.

पिछले साल दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल गांधी आम आदमी पार्टी की रीति-नीति से प्रभावित हुए थे. पर लगता नहीं कि पार्टी नेतृत्व कार्यकर्ताओं से जुड़ा हुआ है.

एंटनी की चेतावनी

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जून में पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ और अल्पसंख्यकों के प्रति झुकाव रखने वाली छवि सुधारनी होगी.

उनके बयान से लहरें उठी थीं, पर जल्द थम गईं.

मीडिया रिपोर्टों में कहा जा रहा है कि पार्टी की आंतरिक बैठकों में यह मसला कई बार उठा है, इसलिए अब पार्टी निचले स्तर के कार्यकर्ता की राय लेना चाहती है.

राहुल गांधी ने सहज भाव से पार्टी महासचिवों से कहा है कि वे निचले स्तर के कार्यकर्ताओं की राय लें कि पार्टी को कैसे आगे ले जाया जा सकता है.

‘हिंदू विरोधी’ छवि पार्टी की चिंता का विषय है या विरोधियों के प्रचार का हिस्सा है? विरोधी तो छवि बिगाड़ना ही चाहेंगे, पर क्या पार्टी-कार्यकर्ता की राय भी यही है?

अतिशय भाजपा-विरोध

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भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी साबित करने के अतिशय उत्साह में तो यह स्थिति पैदा नहीं हुई?

इसकी शुरुआत गुजरात से हुई थी. नरेंद्र मोदी को पराजित करने की ज़िम्मेदारी जिन पर थी उनके पास 2002 दंगों के बाद बनी मोदी की छवि का कार्ड था.

कांग्रेस की पहली हार गुजरात में हुई. क्या वह सांप्रदायिकता की जीत थी?

2007 के चुनाव में जैसे ही सोनिया गांधी ने उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा, मोदी ने उसे गुजरात की अस्मिता से जोड़ दिया.

इसके विपरीत कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के संरक्षण से जुड़े क़दम जब भी उठाए, भाजपा उन्हें ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने में कामयाब रही.

क्या पार्टी अल्पसंख्यकों के हितों को समझ पाई? क्या वे उसके साथ हैं?

जामा मस्जिद के इमाम से भेंट

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लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सोनिया गांधी का जामा मस्जिद के इमाम से भेंट करने का फ़ायदा नहीं मिला, उल्टा नुक़सान हो गया.

दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी बांग्लादेशियों के अवैध आगमन और सांप्रदायिक हिंसा बिल जैसे क़ानूनों का मुद्दा उठाते रहे. कांग्रेस के पास इनके जवाब में कोई कारगर रणनीति नहीं थी.

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पंद्रहवीं लोकसभा के अंतिम सत्र में यूपीए सरकार ने सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा अधिनियम 2011 को पास कराने की कोशिश की तो भाजपा ने उसे बहुसंख्यकों के ख़िलाफ़ साबित किया.

अंततः यह विधेयक ठंडे बस्ते में चला गया. इसके विपरीत भाजपा ने कांग्रेस को धर्मांतरण विरोधी क़ानून के मसले में उलझा दिया है.

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