मैरेज होम में मुसलमानों को नहीं मिल रही जगह

शारदा जैन अतिथि भवन, खुर्ज़ा इमेज कॉपीरइट Other

पचास की उम्र पार कर चुके फ़हीमुद्दीन पिछले एक महीने से अपनी मुस्लिम पहचान को लेकर बहुत सतर्क हो गए हैं.

वो ख़ुर्जा शहर में एक बूचड़खाने के मालिक हैं. फ़हीमुद्दीन को अपने बेटे के दावत-ए-वलीमा (शादी के प्रीति भोज) के लिए एक खुली जगह की ज़रूरत थी.

और ख़ुर्जा शहर के दो विवाह भवनों- शिल्पी गार्डन मैरेज होम और आरके फ़ॉर्म हाउस- ने उनके इस मक़सद के लिए अपनी जगह देने से इनकार कर दिया.

इन दो विवाह भवनों के मालिक हिंदू बिरादरी से आते हैं. फ़हीमुद्दीन कहते हैं कि विवाह भवनों के मालिकों ने उन्हें कहा, "हम मुसलमानों को अपनी जगह किराये पर नहीं देते हैं."

दिल्ली से 130 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर ख़ुर्जा शहर में इस मुद्दे पर जहाँ नया विवाद खड़ा हो गया है, वहीं ख़ुर्जा के मुसलमानों में ख़ासा असंतोष है.

मांसाहार बना मुद्दा

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फ़हीमुद्दीन को जब जगह न मिली तो ये उन्हें एक झटका लगा. क्योंकि कुछ अर्से पहले उन्होंने आरके फ़ार्महाउस में ही अपनी बेटी की शादी की पार्टी आयोजित की थी.

फ़हीमुद्दीन बताते हैं, "मुझे कहा गया कि मुसलमान अपनी पार्टियों में केवल मांस का खाना परोसते हैं, जगह को गंदा कर देते हैं, बताए गए लोगों से कहीं ज़्यादा लोग इनके दावत में चले आते हैं."

वे कहते हैं, "छोटी-छोटी बातों पर विवाह भवनों को नुक़सान पहुंचाने की आशंका रहती है और पैसा देने में आना कानी करते हैं."

फ़हीमुद्दीन ने इस मुद्दे पर उन्हें बॉन्ड भरने की पेशकश भी की लेकिन इन दोनों पार्टी भवनों ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया.

यहां तक कि ख़ुर्जा के सब डिविज़नल मजिस्ट्रेट इंदु प्रकाश, पुलिस महकमे के सर्किल ऑफ़िसर शैलेंद्र श्रीवास्तव और नगर निगम के चेयरमैन रफ़ीक़ फाट्टा ने मसला सुलझाने की तमाम कोशिश की लेकिन नाकाम रहे.

पार्टी का आयोजन

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इस औद्योगिक शहर के बाहर बने अपने दफ़्तर में बैठे एसडीएम इंदु प्रकाश याद करते हैं, "उन्होंने हमें कहा कि वे मांसाहार वाली पार्टियां नहीं चाहते हैं. वे केवल शाकाहारी खाना परोसें तो हम उन्हें जगह किराये पर दे देंगे."

फ़हीमुद्दीन का मामला इस तरह की कोई अकेली घटना नहीं है.

कुछ हफ़्तों पहले नईम ख़ान और अफ़ज़ल अहमद को अपनी बेटी और बहन के लिए शादी की पार्टी का आयोजन करना था लेकिन उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

अफ़ज़ल अहमद दावा करते हैं कि उन्हें आरके फ़ॉर्महाउस पर बताया गया कि चूंकि ये जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ी हुई है और इसलिए वे मुस्लिम समुदाय की ऐसी किसी गुज़ारिश का ख़्याल नहीं रखेंगे.

आरके फ़ॉर्महाउस के मैनेजर रस्तोगी, फ़हीमुद्दीन के मामले में अपने फ़ैसले के लिए इसी साल में अक्तूबर की एक घटना को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

विवाह भवन में मंदिर

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Image caption सफदर खान (बाएं) कहते हैं कि हिंदू विवाह भवन मालिकों का फैसला अच्छा संदेश नहीं देता है.

रस्तोगी याद करते हैं, "मुस्लिम समुदाय की एक पार्टी के दौरान जितने लोगों के लिए खाना इंतज़ाम करने को कहा गया था, उससे ज़्यादा मेहमान चले आए और हमारा विवाह भवन तहस नहस कर दिया गया."

आरके फ़ार्महाउस के अलावा रस्तोगी अंचल और विनायल नाम के दो और विवाह भवन चलाते हैं.

ख़ुर्जा शहर में 15 विवाह भवन हैं. इनमें दो अमन मैरेज हॉल और मिलन मुस्लिम समुदाय के लोगों का है और बाक़ियों का नियंत्रण हिंदुओं के हाथ में है.

यहां शारदा जैन अतिथि भवन, श्री गंगा भवन और जतिया भवन जैसे मैरिज हॉल भी हैं जो या ता जैन समुदाय के लोगों की हैं या फिर उनके परिसर में गणेश और शिव के मंदिर हैं.

श्री गंगा भवन के कॉन्ट्रैक्टर दिनेश अग्रवाल मुसलमानों को किराये पर विवाह भवन न देने के फ़ैसले को वाजिब ठहराते हुए कहते हैं, "कल अगर किसी ने मांस का एक टुकड़ा दोनों में से किसी एक मंदिर पर फेंक दिया तो इससे सांप्रदायिक हिंसा भड़क सकती है."

विवाह भवन

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Image caption विनीत गुप्त मैरिज पार्टियों में मांसाहार पर रोक लगाए जाने की बात करते हैं.

ख़ुर्जा के ज़्यादातर विवाह भवनों पर हिंदुओं के बनिया समुदाय का नियंत्रण है. माना जाता है कि यह तबक़ा ज़्यादातर किसी न किसी कारोबार से जुड़ा रहता है.

यह साफ़ तौर पर लगता है कि यह तबक़ा उस घटना का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम समुदाय पर शाकाहार का एजेंडा थोपने की कोशिश कर रहा है.

विवाह भवनों के मालिकों के संगठन के सचिव विनीत गुप्त शारदा जैन अतिथि भवन नाम से एक मैरेज हॉल चलाते हैं.

विनीत गुप्त कहते हैं कि वे सभी विवाह भवनों को अपने परिसरों में मांसाहारी भोजन पर रोक लगाने के लिए कहेंगे.

जब उनसे पूछा गया कि मुस्लिम समुदाय के दोनों विवाह भवन वाले भी ऐसा कर सकते हैं तो उनका जवाब होता है, "हिंदू कभी भी उनसे इसके लिए संपर्क नहीं करते हैं."

पार्टियों से गंदगी!

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विनीत गुप्त का दावा है कि कई सालों के अनुभव में उन्होंने कभी भी हिंदुओं के किसी आयोजन में मांसाहार परोसे जाते हुए नहीं देखा.

15 सालों से श्री राम वाटिका चला रहे नीरज चौधरी भी विनीत गुप्त से सहमति रखते हैं, "ख़ुर्जा में हिंदू भले ही अपने घरों में मांस खाएं लेकिन पार्टियों में कभी भी मांस नहीं परोसते हैं."

उद्योगपति एसके जतिया के दादा सूरजमल जतिया को ख़ुर्जा शहर बसाने का श्रेय जाता है. उनका कहना है कि मांसाहार को सभी समाजों में स्वीकार्यता हासिल नहीं है.

जतिया तर्क देते हैं कि मांसाहार वाली पार्टियों में होने वाली गंदगी गिद्धों को आकर्षित करती है.

जतिया, जैन, अग्रवाल, गुप्त और गोयल बिरादरी के लोग ख़ुर्जा के प्रभावशाली तबक़े से आते हैं और यहां के हिंदू समुदाय में उनका ख़ासा रसूख़ है.

अच्छा संदेश नहीं!

अमन मैरेज हॉल के मोहम्मद नाज़िम भरोसा दिलाते हैं कि उनका विवाह भवन किसी भी सूरत में हिंदुओं के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन रह चुके सफ़दर ख़ान को इस बात पर अफ़सोस है कि हिंदू विवाह भवन मालिकों का फ़ैसला अच्छा संदेश नहीं देता है.

एसडीएम इंदु प्रकाश उनसे सहमत हैं लेकिन कुछ न कर पाने को लेकर अपनी बेबसी जताती हैं.

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एसडीएम प्रकाश कहते हैं, "अगर उन्होंने मुझसे ये कहा होता कि वे मुसलमानों को अपना परिसर इस्तेमाल करने के लिए नहीं देंगे तो मैं उनके लाइसेंस को रद्द करने की सिफ़ारिश कर सकता था लेकिन उन्हें इस बात का हक़ है कि वे अपनी जगह पर मांसाहारी खाने को इजाज़त न दें."

ख़ुर्जा शहर की आबादी का 30 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा मुसलमानों का है. 1990 में इस शहर ने सांप्रदायिक दंगा देखा था और जुलाई 2012 में एक जैन मंदिर में मांस का एक टुकड़ा मिलने से थोड़े वक़्त के लिए ख़ुर्जा में तनाव रहा था.

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