आर्थिक मोर्चे पर चीन को पछाड़ देगा भारत?

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विश्व अर्थव्यवस्था के लिए वर्ष 2014 इसलिए ज़रूर याद रखा जाएगा कि कोई बड़ा उलटफ़ेर या अप्रत्याशित झटका नहीं लगा.

लेकिन सच ये भी है कि ये वर्ष दुनिया की किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यादगार नहीं कहा जा सकता.

भारत पर भी इसके अच्छे या बुरे प्रभाव तो पड़ने ही थे. वर्ष की शुरुआत में आर्थिक नीतियों से ज़्यादा राजनीति पर भी ज़ोर रहा क्योंकि आम चुनाव होने थे.

सवाल उन कथित सरकारी नीतियों पर भी उठ रहे थे जिनके चलते भारत की विकास दर लगभग आधी हो चुकी थी.

प्रगति की रफ़्तार

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वैश्विक आर्थिक सुस्ती के बीच कैसा रहा वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए:

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ ने 2014 के बारे में परिवर्तन की भविष्यवाणी की थी और हुआ भी वही.

अमरीका और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्थाओं में कुछ मज़बूती आई तो चीन, ब्राज़ील और रूस जैसे बड़े बाज़ारों में प्रगति की रफ़्तार न सिर्फ़ थमी बल्कि पीछे भी खिसकी.

जापान के लिए अभी भी अपने बढ़े हुए क़र्ज़ को घटाने की जद्दोजहद जारी है.

भारतीय अर्थव्यवस्था

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ज़ाहिर है, भारत पर भी नज़रें रही होंगी क्योंकि पिछले एक दशक से भी ज़्यादा में भारत में न सिर्फ़ विदेशी निवेश का पैमाना बढ़ा है बल्कि उसकी विकास दर भी मज़बूत रही.

हालांकि जाने-माने अर्थशास्त्री गुरचरण दास को लगता है कि बीच में एक दौर ऐसा भी आया जब भारतीय अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक डगमगा चुकी थी.

उन्होंने बताया, "दरअसल भारतीय तरक्की की रफ़्तार में ब्रेक वर्ष 2012 में लगा और लुढ़कते हुए दो ही वर्षों के भीतर हम नौ फ़ीसदी की विकास दर से गिर कर साढ़े चार फ़ीसदी तक पहुँच गए."

औद्योगिक विकास

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वे कहते हैं, "लेकिन 2014 में विकास दर बेहतरी दर्ज की गई और उसके बाद हालात कम से कम और बदतर तो नहीं हुए हैं. लेकिन बहुत नुकसान भी हुआ क्योंकि दो वर्षों में भारतीय साख लगभग हर जगह हताहत हुई."

वर्ष 2014 को खासतौर पर इसलिए याद रखा जाएगा क्योंकि दशकों बाद, सरपट भागती चीन की विकास की गाड़ी में पहली बार ठहराव-सा दिखा.

कच्चे तेल के गिरते दामों के बावजूद चीन की विकास दर घटी और देश में औद्योगिक विकास के आंकड़े भी नकारात्मक हुए.

अमरीका के कुछ अर्थशास्त्रियों ने तो यहाँ तक कहा कि एशिया की दोनों बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के दिन अब लदने वाले हैं.

विकास का रास्ता

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हार्वर्ड विश्विद्यालय के प्रोफ़ेसर लांट प्रिशत और लॉरेंस समर्स ने अपने शोध में लिखा, "भारत और चीन ने पिछले कुछ वर्षों में अप्रत्याशित विकास दर्ज किया है. इसमें चीन का दबदबा कम से कम तीन गुना लम्बा खिंच गया. लेकिन दोनों देश इसे बरकरार सकेंगे ये मानना ठीक नहीं है."

कई लोगों का मत है कि भारत के विकास का रास्ता काफी कुछ चीन सा है.

पिछले साल चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारी बहुमत से एक नई सरकार भी बनी, जिससे न सिर्फ़ घरेलू बल्कि विदेशी निवेशकों का ध्यान भी भारत पर रहा.

सरकारी हस्तक्षेप

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लेकिन भारत और चीन में एक बुनियादी फ़र्क ये भी है कि दोनों की आर्थिक नीतियों में सरकारी हस्तक्षेप के पैमाने बिलकुल अलग हैं.

वर्ष 2014 में जानकारों को इस बात का भी अंदेशा था कि चीन के विकास में आई सुस्ती का सीधा असर भारतीय रफ़्तार पर दिखने लगेगा.

लेकिन आईआईटी दिल्ली में अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर रीतिका खेड़ा इस राय से बिल्कुल इत्तेफ़ाक़ नहीं रखतीं.

उन्होंने कहा, "दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में देखें तो हालात उतने बुरे नहीं हैं कि भारत में घबराहट जताई जाए. विकसित देश ऐसे भी थे जहाँ इस वर्ष विकास दर नकारात्मक रही."

भारतीय मुद्रा

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वे कहती हैं, "भारत में आप स्टॉक मार्केट को देख लीजिए फिर मुद्रास्फ़ीति को. दोनों पर सकारात्मक छाप साफ़ दिखाई पड़ेगी."

भारत में भी कच्चे तेल के गिरते दामों ने संतोषजनक परिणाम दिए और उसका सीधा असर दिखा बढ़ती महंगाई से मिली थोड़ी सी राहत में.

हालांकि भारतीय मुद्रा अब भी स्थिरता के लिए जूझ रही है जिसके चलते वर्ष 2015 की आर्थिक अहमियत और बढ़ जाती है.

आर्थिक मंदी

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गुरचरण दास के अनुसार भारत सही रास्ते पर चल पड़ा है लेकिन असल परिणाम आने में कम से कम दो वर्ष तो लग ही जाएंगे.

साल 2008- 09 में जब विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक मंदी चपेट में थीं तब तो भारत अपने संस्थागत ढाँचे और ऋण प्रणाली पर बारीक़ नज़र के चलते ज़्यादा प्रभावित नहीं हुआ था.

केंद्र की नई सरकार अगर वही जादू फिर दोहरा पाई तो विकास की गाड़ी एक बार फिर सरपट भाग सकती है.

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