मोदीराज में 2015: देश में सब कुछ ठीक है?

नरेंद्र मोदी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ. इमेज कॉपीरइट EPA

पिछली मई में नरेंद्र मोदी को मिली चुनावी कामयाबी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के अलावा आम लोगों की उम्मीदें भी बड़ा कारण बनीं थीं. लोगों को ये लग रहा था कि मोदी 'गुजरात मॉडल' के तर्ज़ पर आर्थिक विकास लाएंगे.

यही वजह थी कि सीएसडीएस-लोकनीति की ओर से कराए गए एक सर्वे में जब लोगों से ये पूछा गया कि वे भारत के किस राज्य को सबसे अधिक विकसित मानते हैं तो 64 फ़ीसदी लोगों का जवाब गुजरात था.

इस सर्वे में 22 हज़ार लोगों ने भाग लिया था जिनमें जबकि महज़ चार फ़ीसदी ही लोगों ने कहा, 'महाराष्ट्र.'

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जबकि हक़ीक़त ये है कि सामाजिक विकास के मापदंडों पर गुजरात महाराष्ट्र से पिछड़ा हुआ है और कई ऐसे राज्य भी हैं जिनके सकल घरेलू उत्पाद में इज़ाफ़ा गुजरात से बेहतर हुआ है. लेकिन लोगों की मान्यताओं और उम्मीदों से फ़र्क़ पड़ता है.

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए सात महीने हो गए हैं और लोगों की उम्मीदें विकास के मुद्दे पर, सामाज के बुनियादी ढांचें, सरकार के कामकाज, राजनीतिक स्थिरता और विदेश नीति के सवाल पर मोदी का इम्तिहान ले रही हैं. और ये साफ नहीं है कि वे इसे पूरा कर पाएंगे या नहीं.

अभी तक हमने कई जुमले सुने हैं जैसे कि 'मेक इन इंडिया' और इस कड़ी में सबसे ताज़ा उदाहरण 'एनआईटीआई' या 'नीति आयोग' है.

खुले बाज़ार की नीति

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निवेश दर को बढ़ाने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया है जो जीडीपी को 4.7 फ़ीसदी की निराशाजनक स्थिति से ऊपर उठाने के लिए ज़रूरी था और न ही लोगों की भलाई के लिए ऐसा कुछ किया गया है.

सरकार अभी भी खुले बाज़ार पर सब कुछ छोड़कर चल रही है.

उसने विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु की उस चेतावनी को भी नज़रअंदाज़ कर दिया कि 'मुक्त बाज़ार का मॉडल' हर जगह नाकाम हो गया है.

भारत में सरकारी निवेश की रफ़्तार भी सुस्त बनी हुई है और क़र्ज़ के बोझ से जूझ रहा निजी क्षेत्र भी निवेश करने से घबरा रहा है, ख़ासकर उत्पादन क्षेत्र में.

निजी क्षेत्र के साथ सरकारी साझेदारी में बनने वाली परियोजनाओं की लागत बहुत ज़्यादा पड़ रही है और उनसे वक़्त पर नतीजे भी नहीं मिल पा रहे हैं.

बाज़ार में उछाल!

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मोदी को बस 'क्रॉनी कैपिटलिज़्म' का मॉडल या पूंजीवाद का वो चेहरा, जिसमें कारोबार की ताक़त सत्ता तक पहुंच रखने वाले लोगों तक सिमट जाती है, समझ में आता है.

लेकिन इससे कोई गुणवत्ता वाला विकास नहीं होने वाला.

ये एक ऐसा रास्ता है जो ग़ैरबराबरी की तरफ़ जाता है. यहां तक कि इससे नौकरियों के मौक़े भी ज़्यादा नहीं पैदा होंगे.

भारत में बढ़ रहे कामगारों को काम देने के लिए देश में हर महीने कम से कम दस लाख नई नौकरियों की ज़रूरत है.

इसलिए बनावटी तरीक़ों की बदौलत शेयर बाज़ार में भले ही उछाल आ सकता है लेकिन अर्थव्यवस्था हक़ीक़त में वैसी ही रहेगी.

ख़ासकर भारत के बीमारू कहे जाने वाले राज्यों को इसका ख़मियाज़ा भुगतना पड़ सकता है क्योंकि पैसे के आवंटन और उनकी वास्तविक ज़रूरतों के मूल्यांकन के लिहाज़ से नीति आयोग, योजना आयोग का किसी भी तरह से विकल्प नहीं है.

मनरेगा में कटौती?

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मोदी सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) समेत सामाजिक भलाई की तमाम योजनाओं में कटौती कर रही है.

कल्याणकारी योजनाओं को लेकर उसकी इच्छा है कि सीधे नक़द मदद दे दी जाए लेकिन इसे लागू करने के ज़रूरी बुनियादा ढांचा बहुत ही कमज़ोर है. और पैसे से उन ज़रूरतों को बिल्कुल ही नहीं पूरा किया जा सकता है जो स्थानीय तौर पर उपलब्ध ही नहीं रहतीं.

सबसे ज़्यादा ख़राब बात तो ये हुई है कि सरकार ने भूमि अधिग्रहण क़ानून में अध्यादेश के ज़रिए संशोधन का क़दम उठाया है.

इसके ज़रिए उन परियोजनाओं को इससे प्रभावित होने वाले 70 से 80 फ़ीसदी लोगों की सहमति लेने की शर्त में छूट दी गई है और इतना नहीं बल्कि वन अधिकार क़ानून के असर को भी कम करने की कोशिश की गई है.

संसद की गरिमा

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यह लोगों की आजीविका पर एक गंभीर हमला कहा जा सकता है.

प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों और परिवहन व्यवस्था को तरजीह, जंगलों में लूट खसोट वाली परियोजनाओं को मंज़ूरी और अनिवार्य क़ानूनों को कमज़ोर करने जैसे क़दमों के ज़रिए मालूम पड़ता है कि सरकार ने पर्यावरण पर चुपके से हमला बोल दिया है.

पर्यावरण को होने वाला नुक़सान भारत की जीडीपी को 5.7 फ़ीसदी के बराबर नुक़सान पहुंचाता है. ये आंकड़ें उसकी विकास दर से कहीं ज़्यादा हैं. यह क़ीमत और बढ़ने वाली है.

मोदी अध्यादेश के ज़रिए शासन करना चाह रहे हैं और इससे संसद की गरिमा को नुक़सान पहुंच रहा है.

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वे अमरीकी रिएक्टर आपूर्तिकर्ताओं को ख़ुश करने के लिए न्यूक्लियर लायबिलिटी क़ानून को फिर से लिखने की कोशिश कर रहे हैं.

भारत रत्न सम्मान

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तमाम अच्छी सलाहों के बावजूद जजों की नियुक्ति के मसले पर सरकार को बेइंतहा अधिकार देकर वे न्यायपालिका को भी कमज़ोर कर रहे हैं. इसके ख़राब नतीजे हो सकते हैं.

इस बीच ख़ुद को हिंदुत्व का झंडाबरदार कहने वाले गुट 'रामज़ादा-हरामज़ादा' के स्तर की बयानबाज़ी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ घर वापसी अभियान के ज़रिए उत्पात पर उतर आए.

ये हिंदुत्ववादी गुट शिक्षा और संस्कृति के मोर्चे पर भगवा एजेंडे को आगे बढ़ा रही सरकार से उत्साहित लगते हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को क्रिसमस के दिन भारत रत्न सम्मान देकर उन्होंने इस दिन के महत्व को कमतर करने की कोशिश की है.

घृणा फैलाने वाली बयानों पर प्रधानमंत्री मोदी ने कामचलाउ एतराज़ ही जताया लेकिन हक़ीक़त में उन्होंने संसद में बयान देने से इनकार करके उलटे संकेत दिए.

हिंदुत्व का एजेंडा

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यहां तक कि सुषमा स्वराज ने भी गीता को 'राष्ट्रीय ग्रंथ' घोषित करने की मांग कर डाली जबकि संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता है.

कारोबार जगत में मौजूद मोदी के समर्थक और दुविधा में पड़े हुए उदारवादी 'विकास' के एजेंडे से इस 'भटकाव' को लेकर निराश हैं.

लेकिन मोदी का निर्वाचन किसी 'विकास' के मुद्दे पर नहीं हुआ है.

यह हिंदुत्व के एजेंडे को चाशनी में लपेटकर पेश करने जैसा था जिससे उनकी अपील का विस्तार किया जा सके.

यहां तक कि भाजपा ने पहले के विपरीत ऐसा कोई दावा भी नहीं किया कि वे हिंदुत्व से फ़ासला बनाए रखेंगे.

मोदी के लिए अर्थव्यवस्था और सरकार के कामकाज से ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के असर को बढ़ाना है.

पड़ोसियों से रिश्ते

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Image caption चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

अगर संघ के एजेंडे और विकास में किसी तरह का कोई टकराव हुआ तो संघ को ही तरजीह मिलनी है.

घरेलू मोर्चे पर नाराज़गी के साथ साथ भारत के पड़ोस में अस्थिरता और असुरक्षा का माहौल बढ़ सकता है.

चीन से निपटने के लिए मोदी अमरीका, जापान और अन्य एशियाई देशों के साथ नज़दीकी संबंध बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं और इसराइल को भी बढ़ावा दिया जा रहा है.

लेकिन वे चीन के साथ जुड़ने में नाकाम रहे हैं, पाकिस्तान से तनाव और बांग्लादेश से मतभेद की स्थिति है. 2015 में ये सब बातें भारत को मुश्किल में डालेंगी.

भारत की सुरक्षा पड़ोसियों के साथ दोस्ताना संबंध रखने में है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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