"प्रवासी सम्मेलन महज़ रस्म अदायगी है"

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गुजरात में बुधवार को शुरू हो रहे 13वें प्रवासी भारतीय सम्मेलन में क़रीब 60 देशों के लगभग पांच हजार प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे.

सम्मेलन चार दिन चलेगा.

एक दशक पहले प्रवासी भारतीयों का सम्मलेन एक खास मक़सद से शुरू किया गया था. मक़सद था विदेशों में बसे भारतीयों को अपने देश से जोड़ना और उनकी मदद से देश में निवेश को बढ़ावा देना.

सवाल है कि जितने ज़ोर-शोर और प्रचार-प्रसार के साथ इसका आयोजन होता है क्या उसी अनुपात में इसके ज़रिए निवेश आता है.

इन्हीं मुद्दों पर बात की बीबीसी संवाददाता सुशील कुमार झा ने सेंटर फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो राजीव कुमार से.

सम्मेलन कितना कामयाब?

मुझे नहीं लगता कि इससे भारत को कोई फ़ायदा होता है.

एक दिवसीय या कुछ घंटों के लिए होने वाले ऐसे इवेंट्स बेमानी होते हैं. इनका फ़ायदा तब तक नहीं होता जब तक इनका फ़ॉलोअप न किया जाए या इनकी अच्छी तैयारी न हो.

सम्मलेन की शुरुआत का मक़सद प्रवासी भारतीयों को दिखाना था कि उनकी मातृभूमि उनका ख्याल करती है, उनके बारे में सोचती है.

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लेकिन कई साल से इसके आयोजन के बावजूद उनकी शिकायतें बनी हुई हैं.

सिस्टम के सपोर्टिव न होने की शिकायत का हल?

सरकार एनआरआई की इस शिकायत को 'नेशनल ट्रीटमेंट' यानी राष्ट्रीय तरीक़े से हल कर सकती है. इससे देश के भीतर और बाहर के लोगों को भी फ़ायदा होगा.

दुर्भाग्य से प्रवासी भारतीयों के साथ भी वही होता है, जो घरेलू विदेशियों यानी एक राज्य से दूसरे में जाकर काम करने वालों के साथ होता है.

सरकार भी मानती है कि इनके लिए हालात अब तक उत्साहजनक नहीं बन पाए हैं.

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देश में ऐसी मानसिकता बन गई है कि बिज़नेस करना अंतिम उपाय हो गया है. जब कुछ न समझ आए तो बिज़नेस करो.

सरकार खाड़ी देशों के भारतीयों के सवाल क्यों नहीं उठाती?

यह सही है कि जब भी प्रवासी भारतीयों की बात होती है तो आमतौर पर यूके, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया की होती है.

जबकि खाड़ी देशों में केरल, बिहार, यूपी समेत कई राज्यों से बहुत से लोग काम करने जाते हैं.

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उनके साथ होने वाले भेदभाव की चर्चा किसी फ़ोरम पर नहीं होती.

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जहां तक प्रवासी भारतीय सम्मेलन की बात है तो हर बार खाड़ी देश गए मेहनतकश भारतीयों के लिए एक दिन या आधे दिन का कैंप जरूर लगता है.

लेकिन वो बस प्रतीकात्मक होता है.

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आधे दिन के प्रोग्राम में कई बार ऐसे भाषण होते हैं, जिसमें इनका गुणगान किया जाता है.

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बात सही भी है कि देश में जो 70 बिलियन डॉलर आए हैं वो इन्हीं लोगों ने भेजे हैं न कि लंदन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया के प्रवासी भारतीयों ने.

मगर इनकी सहूलियत के लिए कोई क़दम नहीं उठाया गया. एयरपोर्ट पर इनके प्रति होने वाले व्यवहार में प्रवासी दिवस से कोई फ़र्क नहीं आया.

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