'प्रवासी सम्मेलन का बौद्धिक स्तर घट रहा है'

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साल 2003 से साल 2015 के बीच प्रवासी भारतीय सम्मेलन में काफ़ी अंतर आया है, आजकल इस सम्मेलन का बौद्धिक स्तर कम हो रहा है.

पहले दो सालों में मैं गया था जब एलएम सिंघवी उसके चेयरमैन थे. उसके बाद जाना बंद हो गया. इधर पिछले दो-तीन सालों में फिर से जाने लगा.

पहले प्रवासी भारतीय सम्मेलन में हमारे विदेश में रहने वाले विद्वानों को बुलाया गया कि वे आकर बताएं कि भारत क्या है, कहां से आया, कहां जा रहा है. ऐसे लोग, देश के इतिहास, इसके तत्वचिंतन के बारे में कुछ कहें.

इन विद्वानों में वीएस नायपॉल और अमर्त्य सेन जैसे लोग आए थे. ये विद्वानों के भाषण हम सबके लिए प्रेरणास्पद होते थे. लेकिन आजकल सम्मेलन में बौद्धिक तत्व कुछ कम हो गया है.

भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति बहुत अच्छा बोलते हैं, यह ठीक है लेकिन विद्वानों को बुलाया जाना कम हो गया है, इस बारे में सरकार को कुछ करना चाहिए.

स्वागतयोग्य क़दम

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हालांकि पिछले कुछ सालों में एक स्वागतयोग्य बदलाव भी भी आया है.

पहले प्रवासी भारतीय और सरकार के बीच जो संवाद होता था उसमें सिर्फ़ सरकार बोलती रहती थी और प्रवासी भारतीयों को सुनना होता था, अब दो-तरफ़ा संवाद होता है.

प्रवासी भारतीय सम्मेलन का एक लक्ष्य यह है कि प्रवासी भारतीय भारत में आकर निवेश करें, और दूसरा यह कि प्रवासी भारतीय देश में दिलचस्पी रखें, इससे जुड़ाव महसूस करें.

लेकिन मेरे ख़्याल से दो लक्ष्य और होने चाहिए. पहला तो यह कि भारत में जो हो रहा है उसे प्रवासी भारतीयों को समझाने की ज़रूरत है.

दूसरी बात यह कि सभी प्रवासी भारतीय पैसे वाले नहीं हैं. प्रमुख तौर पर क़रीब 44 देशों में भारतीय रहते हैं, जिनमें से सिर्फ़ दो या तीन देशों में ही पैसे वाले भारतीय प्रवासी हैं.

इसलिए सरकार चाहिए कि वो उन प्रवासियों का भी योगदान ले जो पैसे वाले नहीं हैं, जो अध्यापक हैं, वैज्ञानिक हैं.

वैज्ञानिकों ने किया है नाम

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Image caption गुयाना के राष्ट्रपति डोनाल्ड रामअवतार प्रवासी भारतीय दिवस को संबोधित करते हुए

दुनिया में भारत का जितना नाम पैसे वालों ने किया है उससे ज़्यादा भारतीय वैज्ञानिकों और विद्वानों ने किया है. लेकिन सम्मलेन में अब इन लोगों के लिए उतनी जगह नहीं है.

भारत सरकार को ऐसी नीति बनानी चाहिए कि प्रवासी भारतीय वैज्ञानिकों भारत में आकर विभिन्न प्रयोगशालाओं से अनुबंध करें और विज़िटिंग प्रोफ़ेसर की हैसियत से साल में दो महीने यहां रहें.

सरकार को चाहिए कि वो प्रवासी भारतीय विद्वानों से कहे कि वो भारतीय विश्वविद्यालयों में आकर पढ़ाएं. यहां के विद्यार्थियों को अपने विश्वविद्यालयों में ले जाएं. भारत के लिए इस तरह का बौद्धिक योगदान बहुत ज़रूरी है.

(बीबीसी संवाददाता अपूर्व कृष्ण से बातचीत पर आधारित. यह पूरी बातचीत शुक्रवार शाम को ईटीवी पर प्रसारित कार्यक्रम 'ग्लोबल इंडिया' में देखी जा सकती है.)

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