निवेशक सम्मेलन: नई बोतल में पुरानी शराब

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कोलकाता में इस हफ़्ते बेहद गहमा-गहमी के बीच आयोजित भव्य दो-दिवसीय निवेशक सम्मेलन के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में 2.43 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिलने का दावा किया है.

यह अपने किस्म का दूसरा सम्मेलन था. इससे पहले हल्दिया में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था. लेकिन तृणमूल सरकार के ट्रैक रिकार्ड को ध्यान में रखते हुए अर्थशास्त्रियों और विपक्ष को निवेश के इन दावों पर संदेह है.

उनकी दलील है कि सहमति पत्रों पर हस्तक्षार और उन परियोजनाओं को अमली जामा पहनाने में काफ़ी अंतर होता है.

व्यापक भागीदारी

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सम्मेलन में राज्य के प्रमुख उद्योगपतियों के अलावा गोदरेज समूह के आदि गोदरेज, आईटीसी के वाईसी देवेश्वर, यस बैंक के राणा कपूर, एचएसबीसी की नैना लाल किदवई, ललित ग्रुप की ज्योत्सना सूरी, पीरामल इंटरप्राइजेज की स्वाती पीरामल, एनटीपीसी अध्यक्ष अरूप राय चौधरी, सेल के अध्यक्ष सीएस वर्मा और टीसीएस के सीईओ एन चंद्रशेखर ने भी शिरकत की.

उनके अलावा चेक रिपब्लिक, इसराइल, लक्जमबर्ग, अमरीका, इंग्लैंड, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, थाईलैंड और स्पेन के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल भी इस मौके पर मौजूद थे.

रिलायंस समूह के अध्यक्ष मुकेश अबानी को भी न्योता दिया गया था. लेकिन वे नहीं पहुंच सके.

पुरानी परियोजनाएं

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ममता बनर्जी सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की विभिन्न परियोजनाओं को इस सम्मेलन की उपलब्धि करार दिया है. लेकिन सच यह है कि सेल और डीप-सी पोर्ट समेत कम से कम 78 हजार करोड़ की यह तमाम परियोजनाएं पुरानी हैं.

वित्त मंत्री अमित मित्रा ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद राज्य में 83 हज़ार करोड़ के निवेश का दावा किया है. लेकिन इस दौरान जेएसडब्ल्यू स्टील की सालबनी परियोजना समेत कई परियोजनाएं बंद हुई हैं.

वर्ष 2012 में राज्य में महज 312 करोड़ की परियोजनाओं को अमली जामा पहनाया जा सका था. बीते साल हिंद मोटर्स और शालीमार पेंट्स जैसी पुरानी कंपनियों में ताले बंद हो गए. हल्दिया पेट्रोकेम में भी काम शुरू नहीं हो सका. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012-13 में राज्य में उद्योगों की वृद्धि दर 5.48 प्रतिशत रही.

वित्त मंत्री ने 2013-14 के दौरान यह दर बढ़ कर 8.78 प्रतिशत होने का दावा किया है. सम्मेलन में शामिल केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट आफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन के सचिव अमिताभ कांत का कहना था कि वृद्धि दर का यह आंकड़ा छोटे और मझौले उद्योगों पर आधारित है.

कांत ने कहा, "बंगाल निर्माण क्षेत्र का महत्व नहीं समझ सका है."

विपक्ष का आरोप

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विपक्षी राजनीतिक दलों ने सम्मेलन के बाद मुख्यमंत्री के कथित हवाई दावों की खिल्ली उड़ाई है.

भाजपा नेता और पश्चिम बंगाल के प्रभारी सिद्धार्थ नाथ सिंह कहते हैं, "पहले दिन ममता ने 93 हजार करोड़ के जिन निवेश प्रस्तावों का दावा किया उनमें से 78 हजार सात सौ करोड़ रुपए तो केंद्र ही देगा. तो फिर इस वैश्विक निवेशक सम्मेलन का क्या फायदा?"

सीपीएम नेता सूर्यकांत मिश्र कहते हैं, "जितनी भारी रकम इस सम्मेलन के आयोजन पर खर्च की गई उसमें कम से कम एक उद्योग तो लग ही सकता था. सम्मेलन ने खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत को ही चरितार्थ किया है."

ममता का दावा है कि सम्मेलन के दौरान 2.43 लाख करोड़ के निवेश से संबंधित सहमतिपत्रों पर हस्ताक्षर किए गए हैं. अभी कई अन्य निवेशकों से भी बातचीत चल रही है.

बदलाव की वकालत

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लेकिन ममता के माथे पर लगा सिंगुर का कलंक अब तक नहीं धुल सका है. उद्योग जगत का कहना है कि सरकार जब तक अपनी जमीन संबंधी नीति नहीं बदलेगी तब तक राज्य में कोई बड़ा निवेश होना मुश्किल है.

सम्मेलन में शिरकत करने वाले एक उद्योगपति ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं, "दलालों और सत्ताधारी पार्टी के बिचौलियों की दादागीरी की वजह से किसी निवेशक के लिए सीधे ज़मीन ख़रीदना मुश्किल है. लेकिन ममता सरकार ने इस मामले में हाथ खड़े कर लिए हैं."

अर्थशास्त्री भी राज्य की जमीन नीति में बदलाव की वकालत करते हैं.

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफेसर शंकर कुमार भौमिक कहते हैं, "राज्य में निवेश बढ़ाने के लिए सरकार को सिंगल विंडो के जरिए निवेशकों की तमाम समस्याएं सुलझानी होंगी. जमीन किसी भी उद्योग के लिए पहली शर्त है. सरकार के इससे पल्ला झाड़ लेने पर निवेशक कहीं भी निवेश से पहले सौ बार सोचेंगे."

सवाल

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प्रोफेसर भौमिक कहते हैं कि सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर होने और परियोजनाओं के अमली जामा पहनने के बीच की दूरी लंबी होती है. इसलिए सम्मेलन से भारी उम्मीद नहीं बांधनी चाहिए.

एक अन्य अर्थशास्त्री अंजन चक्रवर्ती कहते हैं, "जिन परियजोनाओं की बात की जा रही है उनमें से ज्यादातर या तो पहले की हैं या फिर केंद्र सरकार की."

अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों ने दो-तीन वर्षों में एक करोड़ नौकरियां पैदा होने के मुख्यमंत्री के दावे पर भी आश्चर्य जताया है. उनका सवाल है कि तमाम परियोजनाएं दीर्घकालीन हैं. ऐसे में इतने कम समय में इतना रोजगार कैसे पैदा हो सकता है? यानी निवेशकों का यह सम्मेलन जवाब से कहीं ज़्यादा सवाल छोड़ गया है.

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