'भारतीय फ़ौज के क़ब्ज़े में है कश्मीर'

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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में हाल में हुए चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला. शुक्रवार को राज्य में राज्यपाल शासन की घोषणा कर दी गई.

सुनेंः सैयद अली शाह गिलानी से बीबीसी की बातचीत

राज्य की कुल 87 सीटों में से पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को 28 और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 25 सीटें मिलीं.

नेशनल कांफ्रेंस को 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिली हैं. सात सीटें अन्य दलों एवं निर्दलीयों को मिली.

वहीं अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी मानते हैं कि राज्य में भाजपा के समर्थन से कोई भी सरकार बनाना सही नहीं होगा.

पढ़ें रिपोर्ट विस्तार से

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में जिस वक़्त राज्यपाल शासन का ऐलान हुआ उस समय अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी सूबे में नहीं दिल्ली में थे.

हालांकि खंडित जनादेश, सूबे के दो हिस्सों में आए दो बिल्कुल अलग नतीजे और राजनीतिक दलों – ख़ासतौर पर भाजपा और पीडीपी के बीच जारी भारी मोल-तोल के अलावा जिस बात ने राज्य में सरकार गठन को थोड़ा और जटिल बना दिया वो था गिलानी का बयान!

लेकिन गिलानी का मानना है कि सूबे में चाहे राज्यपाल शासन हो या पीडीपी, नेशनल कांफ्रेस, कांग्रेस या किसी दूसरी सियासी पार्टी की सरकार, उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है.

भाजपा से गठबंधन

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चंद दिनों पहले उन्होंने पीडीपी को भाजपा से संभावित गठबंधन पर आगाह किया था.

हुर्रियत नेता ने एक बयान में कहा था, "अगर सूबा वैसे लोगों के हाथों में जाता है जिनके विचार फ़ासीवादी हैं तो उससे करो या मरो वाले हालात पैदा हो जाएंगे."

बयान में कहा गया था, "सबकुछ – लोगों के जीवन, संपत्ति, मज़हब और संस्कृति पर ख़तरा मंडराएगा. कश्मीर का इस्तेमाल ‘घर वापसी’ और ‘बेटी बचाओ और बहु लाओ’ जैसे प्रोजक्ट्स की प्रयोगशाला के तौर पर किया जाएगा."

दक्षिणी दिल्ली के निम्न मध्यवर्गीय इलाक़े खिड़की एक्सटेंशन के एक तंग कमरे में बैठे गिलानी राज्यपाल शासन के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, "कश्मीर वैसे भी पिछले साठ से अधिक सालों से भारतीय फ़ौज के क़ब्ज़े में है."

रोज़मर्रा के मामलों के लिए वोट

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बीबीसी से एक लंबी बातचीत में मगर उन्होंने ये माना कि लोग दिन प्रतिदिन के मसलों को सुलझाने और उसमें आसानी पैदा करने के ग़र्ज़ से वोट देते हैं.

जिस दिन गिलानी का बयान जारी हुआ उसी दिन यूनाइटेड जिहाद कांउसिल और चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन के चीफ़ सैयद सलाहुद्दीन की ओर से भी एक बयान जारी हुआ.

बयान में कहा गया था कि कश्मीर के लोगों को भारत से कभी भी किसी तरह की कोई उम्मीद नहीं रही और अब सरकार का डरावना चेहरा सामने आएगा जब वह सबसे सांप्रदायिक, घोर कश्मीर और मुस्लिम विरोधी पार्टी भाजपा की मदद से तैयार हो रही है.

एक साथ बयान महज इत्तेफ़ाक

इस इत्तेफ़ाक़ पर कि हिज़्बुल और उनके बयान एक ही दिन ही जारी हुए गिलानी ने कहा कि उनका "तालुक्क़ किसी भी बाहरी तंज़ीम से नहीं और वह जो बयान जारी करते हैं वे समय और स्थिति को ध्यान में रखकर जारी किए जाते हैं."

बुधवार को ही हुर्रियत के एक और धड़े के नेता शब्बीर शाह की तरफ़ से भी कहा गया कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद सत्ता के लालच में कश्मीर और मुस्लिम विरोधी भाजपा से हाथ मिला रहे हैं.

इसने इस मामले पर कई तरफ़ा – जिसमें पार्टी के कुछ नेता भी शामिल हैं, हमले झेल रही पीडीपी पर दबाव को और बढ़ा दिया है.

दरअसल चुनाव नतीजे आने के कुछ दिन बाद से ही सूबे में राजनीतिक दबाव का खेल जारी है.

उमर का ट्वीट

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23 दिसंबर के चंद दिनों बाद ही पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने पीडीपी को सरकार गठन में सहयोग देने का ऑफर देकर मुफ़्ती मोहम्मद सईद पर मनोवैज्ञानिक दबाव की पहल कर दी.

अब वो अपने ट्वीट के ज़रिए पीडीपी की न सिर्फ सरकार न पाने को लेकर खिल्ली उड़ा रहे हैं बल्कि उनका समर्थन न लेने के लिए भी व्यंग्य कर रहे हैं.

भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर जारी गोलीबारी और आम लोगों के विस्थापन पर भी उन्होंने एक संदेश जारी कर दिया जिसे पीडीपी ने दूसरों की पीड़ा पर ख़ुशियां मनाने वाला जैसा बताया.

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Image caption भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू में एक चुनावी रैली में.

अब्दुल्लाह के "मुफ़्ती का पाकिस्तान के साथ जल्द-से-जल्द बातचीत का सपना टूट रहा है" जैसे ट्विटर संदेशों ने भाजपा के लिए भी मुश्किलें पैदा की हैं जो पाकिस्तान को ईंट का जवाब पत्थर से देने वाली भाषा में बात करती रही है.

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