भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी कितनी?

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लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान किया जाना चाहिए.

लेकिन क्या इसकी कोई सीमा भी बांधी जानी चाहिए और रचनात्मक आलोचना और अपमान के बीच कोई लकीर होनी चाहिए.

धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने को लेकर भारत में भी समय समय पर विवाद होता रहा है और कई पुस्तकों को प्रतिबंध का सामना करना पड़ा है.

ऐसे में शार्ली एब्डो पर हमले के बाद यह सवाल और मौजू हो गया है.

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पिछले बुधवार को फ्रांस में व्यंग्य और हास्य की अग्रणी पत्रिका 'शार्ली एब्डो' के पत्रकारों की हत्या की भारत में हर तरफ़ निंदा की गई.

मुसलमानों के संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत ने कहा, "हम पेरिस पत्रिका कार्यालय पर हुए कायरतापूर्ण हमले की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं जिसमें 12 मासूम इंसानों की जान चली गई."

बयान में यह भी कहा गया है, "इस्लाम और मुसलमान किसी भी राष्ट्रीयता और धर्म से संबंधित मासूम इंसानों की हत्या को ख़ारिज करते हैं. सिर्फ़ अदालतें ही किसी को सज़ा देने के लिए अधिकृत हैं और केवल एक मुस्लिम राज्य ही जिहाद की घोषणा कर सकता है."

'रचनात्मक आलोचना'

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मजलिसे-मुशावरत के इसी बयान में यह भी कहा गया है कि सभी सभ्य समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता 'रचनात्मक आलोचना' तक सीमित होनी चाहिए और विभिन्न धर्मिक पुस्तकों और पैग़म्बरों आदि के अपमान के लिए उपयोग नहीं की जानी चाहिए.

भारत में पेरिस जैसे मामले का सामना पहली बार 1920 के दशक में उस समय हुआ जब अविभाजित भारत के शहर लाहौर में एक आर्य समाजी हिंदू प्रकाशक ने मुसलमानों के पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के निजी जीवन के बारे में एक विवादास्पद किताब प्रकाशित की.

पैग़म्बर मोहम्मद पर लिखी जाने वाली किताब के प्रकाशक राजपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया और उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चला, तब धर्म के अपमान का कोई क़ानून नहीं था.

कलाकृतियों पर प्रतिबंध

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Image caption चित्रकार एमएफ़ हुसैन के चित्रों का काफ़ी विरोध हुआ था.

कई साल की सुनवाई के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन एक मुस्लिम युवक ने पुस्तक के प्रकाशक राजपाल की 1929 में हत्या कर दी.

हत्यारे को उसी साल फांसी की सज़ा हुई. इस घटना के नतीजे में भारतीय दंड संहिता में धर्म के अपमान की धारा 295-ए के तौर पर शामिल किया गया.

भारत में दो बड़े धर्मों हिन्दू और इस्लाम के अनुयायी धर्मों और धार्मिक पात्रों पर लिखी जाने वाली पुस्तकों, फ़िल्मों और कलाकृतियों को प्रतिबंधित करने के लिए ईश निंदा के क़ानून का इस्तेमाल करते रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में असहिष्णुता में अधिक तेज़ी आई है और हिन्दुओं और मुसलमानों के समूहों ने कई बार हिंसक प्रदर्शन के माध्यम से किताबों, फ़िल्मों और नुमाइशों पर पाबंदी लगवाने में सफलता हासिल की है.

रश्दी की किताब पर प्रतिबंध

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ब्रिटेन के प्रसिद्ध लेखक सलमान रश्दी की किताब 'सैटेनिक वर्सेज़' पर मुसलमानों के विरोध और धमकियों के कारण भारत में 1988 में प्रतिबंध लगाया गया था.

दो साल पहले कुछ मुस्लिम संगठनों की धमकी के मद्देनज़र सलमान रश्दी जयपुर के साहित्यिक समारोह में शामिल नहीं हो सके.

भारत में दर्जनों पुस्तकों पर तथाकथित 'धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने' के नाम पर प्रतिबंध लगा हुआ है.

डीएन झा की किताब 'द मिथ ऑफ़ द होली काउ', वेंडी डोनिगर की 'द हिन्दूज़' और डेसमंड स्ट्वार्ट की 'अर्ली इस्लाम' इन दर्जनों प्रतिबंधित पुस्तकों में शामिल हैं.

तसलीमा की किताब पर विवाद

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Image caption बांग्ला लेखिका तसलीमा नसरीन की किताब पर विवाद हुआ था.

बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन कुछ साल पहले कोलकाता में रहती थीं. वहां मुस्लिम अतिवादियों ने शहर की सड़कों पर उनके ख़िलाफ़ दंगा कर दिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें शहर छोड़ना पड़ा और वह कोलकाता वापस न जा सकीं.

हैदराबाद में एक पुस्तक के विमोचन के दौरान वहां के एक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन के कार्यकर्ताओं ने तसलीमा पर हमला किया था.

देश के अग्रणी पेंटर मक़बूल फ़िदा हुसैन की बनाई गई हिंदू देवी-देवताओं की कुछ कलाकृतियों को कुछ कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने हिंदू देवताओं का अपमान क़रार दिया.

मक़बूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग प्रदर्शनियों पर हमले किए गए और वह चरमपंथियों के हमले के अंदेशे से अपनी धरती पर वापस न आ सके और विदेश में अंतिम सांस ली.

मौलिक अधिकार

Image caption वेंडी डोनिगर की किताब 'द हिन्दूज़' का कवर.

भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष, सहिष्णु और उदार समाज की गारंटी देता है. संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मनुष्य का एक सार्वभौमिक और प्राकृतिक अधिकार है और लोकतंत्र, सहिष्णुता में विश्वास रखने वालों का कहना है कि कोई भी राज्य और धर्म इस अधिकार को छीन नहीं सकता.

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पेरिस में 'शार्ली एब्डो' के पत्रकारों की नृशंस हत्या के बाद भारत में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गया है कि किसी लोकतांत्रिक समाज में अन्य सभी संस्थानों की तरह क्या धर्मों और धार्मिक पात्रों को भी आलोचना और किसी के अपमान के दायरे में नहीं लाना चाहिए?

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