वाइब्रेंट गुजरात 2015 कितना कामयाब रहा?

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वाइब्रेंट गुजरात, 2015 कितना कामयाब रहा? नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस सम्मेलन से गुजरात को कितना फ़ायदा हुआ?

क्या विदेशी निवेशकों का भरोसा नरेंद्र मोदी में बना हुआ है?

क्या भारत को लेकर उनके रवैये में कोई बदलाव आया है, या फिर इस साल के आयोजन ने नरेंद्र मोदी के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं?

इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती ग्राउंड रिपोर्ट.

विस्तार से पढ़िए रिपोर्ट

निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बुलाए गए सम्मेलनों में अमूमन कपड़ों के स्टाल नहीं होते, लेकिन वाइब्रेंट गुजरात 2015 इस मामले में अपवाद साबित हुआ.

वहां कपड़ों के स्टॉल पर दो ही आइटम उपलब्ध थे - बिना कॉलर वाली जैकेट या फिर बिना कॉलर वाली शर्ट. ये दोनों आइटम भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैशन स्टेटमेंट में शामिल हो चुके हैं.

मोदी जैकेट की तस्वीरों के नीचे लिखा है, "यहां से स्मृतिचिन्ह के तौर पर घर लेकर जाइए. भारत में बना है और दुनिया भर में पसंद किया जा रहा है."

वाइब्रेंट गुजरात 2015 के दौरान हर ओर राज्य के 13 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके नरेंद्र मोदी का जलवा दिखा.

मोदी का अंग्रेजी में भाषण

मोदी का चेहरा हर प्रचार बोर्ड पर नजर आ रहा है. इतना ही नहीं एक स्टॉल पर तो आने वाले लोग प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ ही सेल्फी लेते नज़र आए.

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हालांकि आधिकारिक तस्वीरों में नरेंद्र मोदी अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी, संयुक्त राष्ट्र महासचिव और वर्ल्ड बैंक प्रमुख के साथ नजर आए. अपनी सरकार के दर्जनों मंत्रियों और दुनिया भर में कारोबार करने वाली कंपनियों के प्रमुखों के साथ भी मोदी ने तस्वीरें खिंचवाई.

वाइब्रेंट गुजरात 2015 राज्य में भारी भरकम निवेश जुटाने में भी कामयाब हुआ. नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन में अंग्रेजी में भाषण दिया.

अपने संबोधन में मोदी ने साफ़ किया कि कारोबार के लिए भारत पूरी तरह से खुला हुआ है.

उन्होंने कहा, "हमारे पास काम करने के लिए ज़्यादा हाथ हैं और सच करने के लिए ढेर सारे सपने भी."

अरबों का निवेश

सम्मेलन के पहले ही दिन भारतीय कंपनियों ने राज्य में सैकड़ों अरब रुपये के निवेश की घोषणा कर दी, हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे सम्मेलनों में की गई घोषणाएं अमूमन पूरी नहीं होतीं और इसका इतिहास रहा है.

इस दौरान राज्य में विदेशी निवेश की भी घोषणाएं हुईं. ब्रिटेन की ओर से राज्य में पावर प्लांट में करीब 1.5 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की गई.

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ब्रिटेन के वाणिज्य मंत्री लार्ड लिविंगस्टन ने बीबीसी को बताया कि इस निवेश के पीछे नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका है.

लार्ड लिविंगस्टन ने कहा, "वे (मोदी) भारत में कारोबार के लिहाज से बेहतर माहौल देने की कोशिश कर रहे हैं. मैं भारतीय और ब्रितानी कारोबारियों में उत्साह देख रहा हूं. हमें जल्द ही कुछ बदलाव देखने को मिलेगा."

सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों को एक फिल्म भी दिखाई गई जिसमें बताया गया कि केंद्र सरकार ने सत्ता संभालने के बाद बीमा, रक्षा और रेल में निवेश बढ़ाने के लिए क्या-क्या फ़ैसले लिए हैं.

कई कदम उठाने की जरूरत

उधर कुछ लोगों का कहना है कि ज़मीनी स्तर पर अभी भी कई कदम उठाने की ज़रूरत है.

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अमरीकी मैन्यूफैक्चरिंग एवं टैक्नालॉजी फर्म इमर्सन के अध्यक्ष एडवर्ड मोनसर कहते हैं, "हम कई परियोजनाओं में काफी विलंब देख रहे हैं. उन्हें जितनी जल्दी मंज़ूरी मिलेगी, उतनी तेजी से अर्थव्यवस्था का विकास होगा."

बीते साल नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान में अर्थव्यवस्था का मुद्दा ही केंद्र में था. उन्होंने लोगों को भरोसा दिलाया था कि वो देश भर में गुजरात जैसा विकास ला देंगे.

नरेंद्र मोदी के विरोधियों का कहना था कि गुजरात दूसरे कई राज्यों की तुलना में पिछड़ा हुआ है. कई लोग गुजरात में कुपोषण और शिक्षा के स्तर पर भी सवाल उठाते रहे हैं.

वर्ल्ड बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने सम्मेलन में अपने भाषण में भारत को साधारण वैश्विक आर्थिक दृष्टि के बावजूद उम्मीदों का केंद्र बताया.

उन्होंने ये भी कहा कि भारत में अगर विकास का फायदा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना है तो जातीय पहचान और अन्य भेदभाव से भारतीय समाज को उपर उठना होगा.

मोदी की चुनौती

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वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन के बाहर स्थानीय लोगों में कुछ इस तरह के भाव नजर आए.

सम्मेलन के बाहर रिक्शे का इंतजार कर रही एक महिला ने कहा कि राज्य सरकार ने इस सम्मेलन पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया है लेकिन वो गरीबों के लिए बहुत कुछ नहीं कर रही है.

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इसी महिला ने बताया कि कुकिंग गैस के दाम दोगुने हो चुके हैं और नई नीति के तहत उनका बैंक एकाउंट खुला है जिसके कारण बैंक तक आने-जाने का खर्चा भी बढ़ गया है.

मोदी को भारतीय कारोबारी जगत का समर्थन जरूर हासिल हुआ है. बाहरी निवेशकों को भरोसा भी उनमें दिख रहा है लेकिन भारत के लोगों का पूरा समर्थन हासिल करना उनके लिए अभी भी चुनौती बनी हुई है.

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