बजट खर्च नहीं कर पा रहे मोदी के मंत्री

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केंद्र सरकार के कई अहम मंत्रालय पिछले छह माह में नियोजित बजट की 30 फ़ीसदी से भी कम राशि ख़र्च कर पाए हैं.

जहां पर्यटन मंत्रालय, नियोजित बजट का 14 फ़ीसदी ही ख़र्च कर पाया है वहीं जल संसाधन के मामले में ये राशि मात्र छह फ़ीसदी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े ज़ोर शोर से 'स्वच्छ भारत अभियान' लॉन्च किया. लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए ज़िम्मेदार शहरी विकास मंत्रालय अपने बजट का 33 प्रतिशत ही व्यय कर पाया है.

अर्थशास्त्री मोहन गुरुस्वामी कहते हैं, “भारत जैसे देश में आर्थिक विकास सरकार के ज़रिए किए गए ख़र्च पर निर्भर होता है. अगर सरकार ख़र्च में कटौती करती है तो इसका असर अर्थव्यवस्था में प्रकट होने लगता है.”

इंजन ऑफ़ ग्रोथ

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मोहन गुरुस्वामी के मुताबिक़ प्राइवेट सेक्टर अभी भी उतना विकसित नहीं हुआ है कि वो अर्थव्यवस्था पर बड़े पैमाने पर असर डाल सके.

इसलिए भारत में ‘इंजन ऑफ़ ग्रोथ’ अब भी सरकारी ख़र्च ही है.

गुरुस्वामी उदाहरण देकर कहते हैं कि अगर सरकार बड़े पुल, सड़क, नहरें और इस तरह की दूसरी चीज़ों के निर्माण का प्लान आगे के लिए टाल देती हैं तो इसका असर स्टील, सीमेंट और दूसरे क्षेत्रों पर पड़ेगा.

इन सेक्टर में निर्माण कम होने से मज़दूरों और कामगारों की ज़रूरत कम होगी जिसका असर रोज़गार पर पड़ेगा.

जानकार कहते हैं कि इस वित्तीय वर्ष में टैक्स से होने वाली आय में एक लाख करोड़ रुपए का घाटा है जो शायद सरकारी ख़र्च को प्रभावित कर रहा है.

सरकार जिस तरह के औद्योगिक विकास की बात कर रही थी वो इस बार नहीं हो पाया.

कार्पोरेट जगत में पिछले साल औसत फ़ायदा 18 फ़ीसदी था वो इस साल घटकर आठ प्रतिशत रह गया है.

उद्योग जगत को उम्मीदें

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ज़ाहिर है उद्योग से भी राजस्व की उगाही कम हो गई है.

हालांकि उद्योग और व्यवसाय जगत के बड़े हिस्से को नरेंद्र मोदी हुकूमत से अभी भी बड़ी उम्मीदें हैं .

कम से कम ये पिछले हफ़्ते तक तो ज़रूर थी जब बीबीसी ने उद्योग जगत के कुछ लोगों से सरकार के कम होते ख़र्च को लेकर बात की.

स्टिक ट्वैल्स के मालिक सुभाष गोयल ने कहा, "हो सकता है कि बहुत सारे आंकड़े अभी सरकार के पास नहीं आए हों क्योंकि कई में राज्य और केंद्र सरकार मिलकर काम करती हैं या ये भी हो सकता है कि फ़िज़ूलख़र्ची में कमी करने का नतीजा हो."

गोयल का कहना है कि मोदी सरकार ने ई-वीज़ा जैसे अहम क़दम उठाए हैं जो पर्यटन क्षेत्र को बहुत फ़ायदा पहुंचाएंगे.

उद्योग और व्यापार जगत संगठन कॉन्फेडेरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री या सीआईआई से जुड़े जयेश ने भी नरेंद्र मोदी सरकार के कई 'अहम क़दमों' को गिनाया जो उनके मुताबिक़ उद्योग जगत में बड़े बदलाव लाएंगे.

निर्यात पर प्रभाव का डर

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अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में जो एक चीज़ मोदी हुकूमत के लिए वरदान के तौर पर आई है वो है अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें जो पिछले नौ साल के सबसे कम स्तर पर पहुंच गई है.

बुधवार तक ब्रेंट क्रूड की क़ीमत 50 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी.

लेकिन इसका असर शेयर बाज़ार में गिरावट के तौर पर देखा गया. बीएसई सेंसेक्स पिछले दिनों तेज़ी से गिरा.

इसमें हालांकि ग्रीस में तैयार राजनीतिक हालात, यूरोपीय आर्थिक स्थिति वग़ैरह जैसे कारण बताए गए.

निर्यात पर असर

Image caption कम सरकारी ख़र्च का प्रभाव कई क्षेत्र जैसे स्टील पर भी पड़ सकता है.

एक डर ये भी था कि गिरते तेल की क़ीमते कहीं खाड़ी के बाज़ार में भी निर्यात पर प्रभाव न डालें.

हालांकि इसका असर आयात पर भी होगा और तेल ख़रीदने पर पिछले सालों की तुलना में भारत के कम पैसे ख़र्च होंगे.

लेकिन तेल के दामों में कटौती से जितना फ़ायदा आम लोगों को हो सकता था वो नहीं हुआ क्योंकि सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर आबकारी शुल्क बढ़ाने का फ़ैसला किया है.

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