'मर गया पेरुमल मुरुगन'

तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन

"मर गया पेरुमल मुरुगन. वो ईश्वर नहीं कि दोबारा आए. अब वो पी मुरुगन है, बस एक शिक्षक. उसे अकेला छोड़ दो."

इन शब्दों के साथ तमिल भाषा के मशहूर लेखक पेरुमल मुरुगन ने अपने फ़ेसबुक पेज पर ये ऐलान किया कि वे लिखना छोड़ रहे हैं.

दरअसल, पेरुमल मुरुगन अपने उपन्यास 'मधोरुबगन' के विरोध से गुस्से में हैं और निराश भी.

'मधोरुबगन' का स्थानीय हिंदूवादी और जातिवादी समूह भारी विरोध कर रहे हैं. मुरुगन पर लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का आरोप लगाया जा रहा है.

दिसंबर में दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी समूह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इस किताब की प्रतियां जलाईं थीं.

इसका अंग्रेज़ी अनुवाद 'वन पार्ट वूमन' भी आ चुका है. इसे पेंग्विन ने 2014 में प्रकाशित किया था.

हिंदू धर्म पर लिखी विवादास्पद किताब 'वापस ली गई'

विवाद क्यों?

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साल 2010 में प्रकाशित तमिल उपन्यास 'मधोरुबगन' दरअसल, एक गरीब निःसंतान दंपति की कहानी है.

भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी कितनी?

ये कहानी है उस स्त्री की जो बच्चे के लिए तड़प रही है और प्राचीन हिंदू रथयात्रा उत्सव में पहुंचती है, जहाँ एक रात के लिए किसी भी स्त्री और पुरुष के बीच आपसी सहमति से यौन संबंध बनाने की इजाज़त है.

मुरुगन इस किताब में जाति और समुदाय की उस दबंगई की पड़ताल करते हैं जो पति-पत्नी और शादी को संकट में खड़ा कर देती है.

एक 'बुरी किताब' का अनुवादक ?

हालाँकि लेखक मानते हैं कि इस तरह की परंपराओं का कोई ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन ये कहानियां जुबानी ही आगे बढ़ती रही हैं.

मुरुगन किताब में कहते हैं कि उन्हें अपने अध्ययन के दौरान ऐसे लोग मिले, जिन्हें लोग 'भगवान का दिया हुआ बच्चा' पुकारते हैं.

वे लिखते हैं, "मैंने अनुमान लगाया कि उन्हें ऐसा इसलिए पुकारा जाता है क्योंकि वे ईश्वर की पूजा के बाद जन्मे थे."

बात ज़्यादा बिगड़ी

Image caption 'मधोरुबगन' का अंग्रेजी अनुवाद 'वन पार्ट वूमन'

सोमवार को मुरुगन और उनकी किताब का विरोध कर रहे समूहों के बीच एक बैठक के बाद बात ज़्यादा बिगड़ गई.

इस बैठक में समूहों ने मुरुगन से बिना शर्त माफी मांगने, विवादित हिस्सा हटाने और ऐसी चीजों को लिखने से तौबा करने के लिए कहा था जिससे आम आदमी की भावनाएं आहत होती हैं.

इसके विपरीत, कई लेखकों ने मुरुगन की अलग और चौंकानेवाली कल्पना और दंपति के 'संवेदनशील चित्रण' की सराहना भी की है.

किताब पर पाबंदी को चुनौती

अनुवादक अनिरुद्ध वासुदेवन कहते हैं, "इस तरह की शादी में बेऔलाद दंपति, ख़ासकर स्त्री आज भी हर रोज अनकही प्रताड़ना झेलती है. अगर आपको पाबंदी ही लगानी है तो स्त्री की यौनिकता पर लगी बंदिशों पर रोक लगे."

अभिव्यक्ति पर हमला

कई लेखक और बुद्धिजीवी किताब पर हो रहे जातिवादी हमले को अभिव्यक्ति पर हमला मानते हैं.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा कहते हैं, "पेरुमल मुरुगन का इस तरह चुप हो जाना तमिलनाडु ही नहीं पूरे भारत के लिए दुखद है."

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रामचंद्र गुहा की ही तरह दूसरों का भी मानना है कि अगर मुरुगन ने भारत में अभिव्यक्ति पर बढ़ते हमले के बीच लिखना नहीं शुरू किया तो ये निराशाजनक होगा.

लेखक और अनुवादक एन कल्याण रमण कहते हैं, "मुरुगन तमिल भाषा के बेहतरीन लेखकों में से हैं. उनकी रचनाओं में तमिलनाडु बसता है. वे अपनी कलम से जातिगत भेदभाव पर सवाल खड़े करते रहे हैं. वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति एक सजग और इतिहास के प्रति संवेदनशील रचनाकार हैं."

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