मदरसों में दिए जा रहे हैं हिंदू संस्कार

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राजनीति में भले ही कई बार जात-पात और धर्म के नाम पर सियासी ध्रुवीकरण होता हो लेकिन 12 साल की शबनम को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

मध्‍य प्रदेश के मंदसौर ज़िले में एक नहीं ऐसी अनेक शबनम और आदिल हैं, जो मदरसे में हिंदू धर्म की शिक्षा लेने में भी रुचि दिखा रहे हैं.

उन्‍हें इस्‍लामी दीनियात के साथ हिंदू धर्म के सोलह संस्‍कारों, गीता सार और गायत्री मंत्र की शिक्षा भी दी जा रही है.

तेरह साल की जैनब जब सोलह संस्‍कारों को एक सांस में सुनाती है तो सुनने वाला हतप्रभ रह जाता है.

पढ़िए पूरी रिपोर्ट

मंदसौर में 17 साल पहले महिलाओं- जिनमें पांच मुसलमान हैं और दो हिंदू- ने निदा महिला मंडल (एनएमएम) बनाकर मदरसों से हिंदुत्व और इस्लाम की शिक्षा देना शुरू किया था.

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Image caption डॉक्टर तलत कुरैशी मदरसों को संचालित करने वाले निदा महिला मंडल की अध्यक्ष हैं.

इसकी अध्‍यक्ष तलत कुरैशी कहती हैं, "हम गरीब परिवारों के बच्‍चों को शिक्षा देने का काम कर रहे हैं. कई हिंदू गरीब परिवार अपने बच्‍चों को पढ़ाना चाहते थे लेकिन जब हमने धार्मिक शिक्षा को लेकर उनकी चिंताओं को देखा तो मदरसों का पुराना पैटर्न लागू किया. ऐसा, जो काफ़ी सस्‍ता था और जिसने राजा राममोहन राय, मुंशी प्रेमचंद और भारतेंदु हरिश्‍चंद्र जैसे नामचीन शख्‍स दिए."

निदा महिला मंडल 128 मदरसों को संचालित करता है और इसका मुख्‍यालय मदरसा फिरदौस है. गुरुकुल विद्यापीठ, नाकोडा, ज्ञान सागर, संत रविदास, एंजिल और जैन वर्धमान सरीखे नाम वाले 128 मदरसों में से 78 मदरसों में मुस्‍लिम छात्रों के साथ हिंदू बच्‍चे भी पढ़ते हैं.

तलत बताती हैं कि 14 मदरसों को सरकारी अनुदान मिलता है लेकिन समय पर नहीं. हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा पढ़ना ज़रूरी है, जबकि तीसरी भाषा के लिए उर्दू और संस्‍कृत में से एक का विकल्‍प दिया जाता है.

"दीनी तालीम के लिए कोई बंदिश नहीं है. जो बच्‍चे उर्दू लेते हैं, उन्‍हें दीनियात और संस्‍कृत वाले बच्‍चों को हिंदू धर्म की पुस्‍तक पढ़ाई जाती है. चूंकि एक छत के नीचे एक माहौल में सारे बच्‍चे पढ़ते हैं तो उनका परस्‍पर धार्मिक किताबों में दिलचस्‍पी लेना लाजमी है."

स्मार्ट क्लासेज़ भी

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ज़िला मदरसा केन्‍द्र के समन्वयक डॉक्टर शाहिद कुरैशी बताते हैं, "मध्‍य प्रदेश में आधुनिक मदरसों में धार्मिक शिक्षा की पुस्तक ज़रूरी है. सिलेबस का निर्धारण भी संस्था को करना है. लिहाजा हिंदू बच्चों की संख्या देखते हुए हमने अपने मित्र नेमीचंद राठौर से हिंदू धर्म पर एक पुस्‍तक लिखने का आग्रह किया. उन्होंने 'हिंदू धर्म सोलह संस्कार, नित्यकर्म एवं मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार' शीर्षक से किताब लिखी."

इस किताब में नित्यकर्म, दंतधावन विधि, क्षौर कर्म, स्नान, वस्‍त्र धारण विधि, आसन, तिलक धारण प्रकार, हाथों में तीर्थ, जप विधि, प्राणायाम, नित्य दान, मानस पूजा, भोजन विधि, धार्मिक दृष्टि में अंकों का महत्व और नवकार मंत्र को भी शामिल किया गया है.

शाहिद बताते हैं कि मदरसों के शिक्षक हिंदू धर्म पर आधारित इस पुस्तक को भी पढ़ा रहे हैं, "इसके ज़रिए दोनों ही धर्मों के बच्चों और शिक्षकों ने एक-दूसरे को जानने और समझने की पहल की है."

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उन्‍होंने बताया कि साढ़े 13 लाख की आबादी वाले मंदसौर ज़िले में लगभग 250 मदरसे संचालित किए जा रहे हैं और इनमें दोनों धर्मों के लगभग 15 हज़ार बच्‍चे (एनएमएम के 128 मदरसों के 12 हज़ार बच्‍चों सहित) पढ़ते हैं.

ख़ास बात यह है कि पन्‍द्रह हज़ार बच्‍चों में से 55 फ़ीसदी हिंदू हैं. लगभग 20 मदरसों में स्‍मार्ट क्‍लासेज प्रारंभ की गई हैं और पहली से चौथी तक अंग्रेज़ी माध्‍यम भी शुरू किया गया है.

पेशे से पत्रकार और पुस्‍तक के लेखक नेमीचंद राठौर ने बताया कि डॉ कुरैशी के आग्रह पर संकलन तैयार तो कर दिया पर मन में शंका थी कि मदरसों में यह किताब स्वीकार भी होगी या नहीं. लेकिन हिंदू बच्चों के साथ जब मुस्लिम बच्चों और शिक्षकों ने भी इसे पसंद किया तो ख़ुशी हुई.

राठौर के अनुसार बीते पांच वर्षों से उनकी पुस्‍तक मदरसों में पढ़ाई जा रही है.

शुरुआती हिचक

मदरसा फिरदौस की छात्रा जैनब गौरी ने बीबीसी से कहा, "दोनों धर्मों की किताबों में कई सारी बातें एक सी हैं. सिर्फ़ नाम अलग-अलग हैं."

जैनब को हिंदू धर्म की पूरी पुस्‍तक याद है. वह पूछती हैं, "हम सब जब रोटी एक खाते हैं तो अलग कैसे हुए."

इसी मदरसे की 11वीं की छात्रा आयुषि वर्शी कहती है धार्मिक शिक्षा को लेकर कोई पाबंदी नहीं है. उसके पिता संजीव बताते हैं कि पन्‍द्रह सौ रुपये की सालाना फ़ीस में ऐसी मॉडर्न शिक्षा कहीं और नहीं मिल सकती.

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वह कहते हैं, "मैंने तो कभी नहीं देखा कि एक स्‍कूल में दोनों धर्मों की अलग-अलग शिक्षा दी जाती हो."

मदरसा फिरदौस की टीचर नुसरत ख़ान कहती हैं, "मदरसे में हिंदू धर्म से संबंधित पुस्तक देखकर पहले तो हमको ही कुछ अटपटा लगा. लेकिन पढ़ने के बाद हिचक दूर हो गई. हिंदू बच्चों को पढ़ता देख कई मुस्लिम बच्चे भी इसमें दिलचस्‍पी दिखाने लगे."

भोपाल के नोशेरवान-ए-आदिल कहते हैं, "ये मदरसे उन लोगों के लिए आईना हैं, जो सेक्‍युलरिज्‍म–कम्‍युनलिज्‍म के नाम पर सियासी रोटियां सेंक मुल्‍क का नुक़सान करते हैं."

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