भाजपा : विवादित बयानों की 'सच्चाई'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लक्ष्मण रेखा न पार करने की चेतावनी, अनुशासनात्मक कार्रवाई की रस्मी नोटिस और मीडिया के सामने “उनकी व्यक्तिगत राय” से पार्टी को अलग करने की दयनीय चालाकियों के बावजूद भाजपा के बहादुर बाज़ नहीं आ रहे.

यह सोचना कि कुछ महत्वाकांक्षी नेता सिर्फ खुद को चमकाने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं बचकाना होगा. इसके पीछे सुविचारित रणनीति है जिसका मकसद दिल्ली की जनता को चुनावी मौसम में मोदी के अच्छे दिनों के मज़ाक में बदलते नारे को याद करने से रोकना और उन मुद्दों की तरफ से ध्यान भटकाना है जिन पर सबसे बड़े सूबे यूपी में आंदोलन की शुरूआत हो चुकी है.

यूपी भाजपा के कद्दावर नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी की हत्या, बलात्कार और ज़मीन हड़पने के कई आरोपों में दागी होकर तिहाड़ जेल में बंद रह चुके अपने ही ढब के संत साक्षी महाराज का राजनीतिक कैरियर कई पार्टियों की परिक्रमा के बावजूद खत्म हो चुका था. पिछले लोकसभा चुनाव में कल्याण सिंह की सिफारिश पर उन्नाव से टिकट पाकर, मोदी लहर के धक्के से वे संसद में पहुंच गए और अब अपनी जबान से संकटमोचक की अपेक्षित भूमिका निभा रहे हैं. सही टाइमिंग के साथ वे इस समय बेहतरीन फॉर्म में हैं.

विवादित बयान

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औरतों से हिंदुओं की आबादी बढ़ाने के लिए बच्चे पैदा करने की मशीन में बदल जाने के आह्वान के बाद उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के निर्देश पर नोटिस जारी किया गया है लेकिन उन्होंने जिस हेकड़ी से नोटिस को दरकिनार किया उससे ज़ाहिर है कि यह सिर्फ दिखावे की रस्म है उन पर कोई कार्रवाई नहीं होने वाली है.

इससे पहले वे महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त, मदरसों को लवजेहाद और आतंकवाद की नर्सरी बताने के साथ धर्मांतरण की सज़ा मृत्युदंड करने का इरादा जाहिर कर चुके हैं. वे विवादित बयान का कोई मौका चूक नहीं रहे हैं.

दूसरे गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ हैं जिनके ट्विटर पेज पर मोटे अक्षरों में लिखा है-“संघ का कथन बिल्कुल सत्य, भारत को एक दिन हिंदू राष्ट्र घोषित ही होना है”. उन्हें सदा की तरह अब भी बाबरी मस्जिद गिराने पर गर्व की अनुभूति होती है, वे धर्मांतरण में सरकार से मदद मांग रहे हैं और धर्म बदलने को राष्ट्रीयकरण बता रहे हैं.

योगी पर पहले भी भाजपा का बस नहीं चलता था लेकिन अब उनकी हिंदू युवा वाहिनी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए बड़े काम की साबित हो रही है. पार्टी में साध्वी निरंजन ज्योति, यूपी भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी समेत ऐसे नेताओं की भरमार है जो “आफ द रिकार्ड” अपने मुंह से हिंदुत्व की हिफाजत में कोई कसर नहीं बाकी रखते.

'दोहरी चाल'

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भाजपा और फ्रंटल संगठनों के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन नेताओं की पोलिटिकल ट्रेनिंग ऐसी है कि वे इसके अलावा कुछ और बोल ही नहीं सकते. कल तक उनके जिस तेवर और बयानों पर पार्टी पीठ थपथपाती थी वही अचानक आपत्तिजनक कैसे हो सकते हैं. हां, केंद्र में सरकार चलाने की कुछ संवैधानिक मजबूरियां हैं जिनका निर्वाह सीनियर नेता कर रहे हैं.

सबसे बड़े सूबे यूपी के किसानों में मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून बड़ा मुद्दा बन रहा है. इसके विरोध में ग्रेटर नोएडा में किसानों की पुलिस से झड़प हो चुकी है, कांग्रेस ने गाजियाबाद के भट्टा परसौल गांव से आंदोलन की शुरूआत कर दी है. उन इलाकों में किसान संगठनों की पंचायतें हो रही हैं जहां मायावती की सरकार के ज़माने में गंगा एक्सप्रेस-वे के विरोध में आंदोलन हुआ था. कानून का विरोध करने वालों का कहना है कि इसे किसानों के बजाय ज़मीन लेने वाले उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है.

ज़बान पर काबू न रखने वाले नेताओं को नोटिस और चेतावनी वगैरा देने का फायदा यह होता है कि सरकार की नीयत पर सवाल उठाने का मौका नहीं मिलता. इस बीच इतना समय मिल जाता है कि विपक्ष और मीडिया की मेहरबानी से इच्छित मैसेज भी सही जगह पहुंच जाता है.

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