बेदी ही बीजेपी की उम्मीद की 'किरण' हैं?

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दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले पूर्व आईपीएस अफसर किरण बेदी को बीजेपी में शामिल करके उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से दो सवाल उठते हैं.

क्या वो बीजेपी को चुनाव में जीत दिला सकेंगी? क्या नरेंद्र मोदी के रहते पार्टी को किसी और स्टार की ज़रुरत है?

कहा जा रहा है कि किरण बेदी को पार्टी में शामिल करने का फैसला केवल पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है.

(पढ़ेंः बीजेपी में शामिल हुई किरण बेदी)

उन्हें आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल की काट के लिए उसी तरह की साफ़ छवि वाला नेता चाहिए था. इस संदर्भ में किरण बेदी का चुनाव सही नज़र आता है.

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विजय गोयल, सतीश उपाध्याय और हर्ष वर्धन भाजपा के जाने पहचाने चेहरे हैं और मुख्यमंत्री के उम्मीदवारी के दावेदार भी थे.

(पढ़ेंः आप और टीम अन्ना के रास्ते)

लेकिन पार्टी के फैसले से लगता है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी को शिकस्त देना उनके बस की बात नहीं.

बेदी को दिल्ली चुनाव से ठीक पहले पार्टी में शामिल करना इस बात का संकेत है कि चुनाव के लिए पार्टी में आत्म विश्वास की कमी है.

बीच मंझधार में कप्तान बदलने का काम या तो संकट के कारण किया जाता है या फिर कप्तान से भरोसा उठने के बाद.

जीत का भरोसा!

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अब तक मैंने पार्टी के अंदर और इसके बाहर जितने लोगों से बातें की हैं उससे एक बात साफ़ निकल कर आती है और वो ये कि ये लोग किरण बेदी को एक अच्छा उम्मीदवार तो मानते हैं लेकिन उन्हें उनके नेतृत्व में पार्टी जीतेगी इसका भरोसा नहीं है.

(पढ़ेंः लोकपाल के समर्थन में किरण बेदी)

कई पार्टी नेता उन्हें पार्टी में शामिल करने से खुश नहीं हैं. किरण बेदी को चुनाव के ठीक पहले पार्टी में लाना एक मुश्किल फैसला ज़रूर रहा होगा.

उनके नेतृत्व में भाजपा की चुनाव में हार और जीत, दोनों सूरत में नरेंद्र मोदी की छवि प्रभावित होगी. अगर हार हुई तो मोदी की हार माना जाएगा.

मोदी की लोकप्रियता

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किरण बेदी को हार से अधिक नुकसान नहीं होगा लेकिन अगर उनके नेतृत्व में पार्टी जीत जाती है तो लोग सोचेंगे जीत बेदी के कारण हुई है जिससे मोदी की साख पर ज़रूर फ़र्क़ पड़ेगा.

प्रधानमंत्री हर हाल में ये चुनाव जीतना चाहते हैं. वो इससे ये जताना चाहते हैं कि आठ महीने सत्ता में रहने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है.

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जिस शहर में वो देश के प्रधानमंत्री हैं, वहां की विधानसभा में भी वो पार्टी को विजयी देखना चाहते हैं.

पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी का चुनावी प्रचार शुरू किया जो फीका सा रहा. शायद इसी कारण किरण बेदी को पार्टी में लाने की प्रक्रिया शुरू हो गई.

खुद किरण बेदी कई महीनों से पार्टी में शामिल होना चाहती थीं लेकिन दिल्ली चुनाव के ठीक पहले उन्हें पार्टी में शामिल करके उन्हें सीएम पद के लिए पार्टी का उम्मीदवार बनाना एक जोखिम भरा फैसला हो सकता है.

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