एयर इंडिया की उड़ान हो सकती है महंगी

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सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया ने कहा है कि वे अगले साल 20 करोड़ डॉलर से ज्यादा की बचत करने के लिए अपनी लागत में कटौती करेगी.

भारत सरकार ने एयर इंडिया को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने को कहा है.

घरेलू उड़ानों के बाज़ार के पांचवे हिस्से पर एयर इंडिया का नियंत्रण है लेकिन सरकार को साल 2012 में उसे होने वाले घाटे के मद्देनज़र बेल आउट पैकेज देना पड़ा था.

कीमतों को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा और बड़ी लागत के कारण एयर इंडिया सालों से जबरदस्त घाटे में चल रही है.

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एक वक्त था जब घरेलू उड़ान के क्षेत्र में एयर इंडिया का एकाधिपत्य होता था लेकिन अब इसकी केवल 20 फ़ीसदी भागीदारी रह गई है.

पिछले साल सरकार ने एयर इंडिया को डूबने से बचाने के लिए 580 करोड़ का बेल आउट पैकेज दिया था लेकिन कई विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि यह एयर इंडिया को नया रूप देगा.

विमानन विशेषज्ञ फैनी शेखर पोनांगी का कहना है, "अगर यह किसी निजी कंपनी की बात होती जिसका मकसद सिर्फ पैसा कमाना होता तब तो ठीक था लेकिन यह थोड़ा अजीब है कि इसे नया स्वरूप देने में इतने साल लग गए. लेकिन एयर इंडिया एक अजीब सी दुविधा से गुजर रही है कि इस सरकारी विमानन कंपनी का मकसद फायदा कमाना है या सामाजिक उद्देश्य की पूर्ती करना."

ऐसा लगता है कि सरकार का धैर्य जवाब दे गया है और वे एयर इंडिया पर वित्तीय हालात सुधारने का दबाव बना रही है.

एयर इंडिया इसके लिए अगले वित्तीय वर्ष में अपनी लागत में 23 करोड़ डॉलर की कटौती करने की योजना बना रही है.

यह अभी साफ़ नहीं है कि कंपनी नौकरियों में भी कटौती करने जा रही है या नहीं.

एयर इंडिया का कहना है कि हमने पहले से ही कंपनी के कर्मियों की यात्राओं पर रोक लगा रखी है. अब हम अनुबंध के तहत नए रोजगारों को रोकने पर भी विचार कर रहे हैं.

एयर इंडिया में 13 हज़ार से ज्यादा लोग काम करते हैं.

निजीकरण

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दो साल पहले कंपनी ने अपने कर्मियों की संख्या आधी कर दी थी और हज़ारों इंजीनियरिंग और देखभाल करने वाले कर्मियों को दूसरे सरकारी विमानन संस्थानों में नियुक्त किया था.

इसके बावजूद यह अभी भी दुनिया में सबसे अधिक कर्मचारियों वाली विमानन सेवा में एक है.

बचत की योजना के तहत कंपनी उन मार्गों पर अपनी सेवा में कटौती कर सकती है जिससे फायदा नहीं हो रहा है.

हाल के महीनों में तेल की कीमतों में कमी आई है लेकिन भारत सरकार की ओर से लगने वाली टैक्स के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंदियों की तुलना में एयर इंडिया के ईंधन का बिल 60 फ़ीसदी तक ज्यादा है.

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या तेल की कम कीमतें निजीकरण की संभावना को टाल सकेंगे?

विमानन कंपनी का अपनी लागत कम करने पर विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रियों को इसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.

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