'नोबेल विजेता के साथ फ़ोटो खिंचाना चाहता था'

कैलाश सत्यार्थी

भारत के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि उन्होंने पांच साल की उम्र में पहली बार नोबेल पुरस्कार का नाम सुना था. उस वक़्त वो सोचते थे कि कभी वो भी किसी नोबेल पुरस्कार विजेता के साथ फ़ोटो खिंचवाएंगे.

पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़ज़ई के साथ कैलाश सत्यार्थी को इस बार का शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है.

बीबीसी संवाददाता मोहन लाल शर्मा से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि 30-35 साल पहले जब उन्होंने बाल अधिकारों के लिए अभियान शुरू किया को तो लोगों को समझाना बहुत मुश्किल काम होता था कि बच्चों से मज़दूरी करवाना अमानवीय है और ये किसी बच्चे का बचपन छीनने जैसा है.

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जब हमने अस्सी के शुरुआती दशक में बंधुआ बाल मज़दूरी को लेकर काम शुरू किया तो उस समय यह कोई मुद्दा नहीं था. इसलिए इस मुद्दे पर न तो भारत में और न ही दुनिया भर में लोगों को समझाना आसान था.

तब संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई संस्था भी इस मुद्दे पर काम नहीं करती थी. नब्बे के दशक में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) का कार्यक्रम बना, लेकिन अस्सी के दशक में ये सब नहीं था.

Image caption पाकिस्तान की छात्रा मलाला युसुफ़ज़ई ने कैलाश सत्यार्थी के साथ शांति का नोबेल साझा किया है.

हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपने ही लोगों को यह समझाना कि बाल मज़दूरी सिर्फ़ ग़रीबी नहीं बल्कि यह मानवीय स्वतंत्रता और गरिमा का हनन है.

तबतक संयुक्त राष्ट्र में बाल अधिकार घोषणापत्र भी नहीं आया था, यह 1989-90 के आसपास बना.

हमने भारत में बाल मज़दूरी बंद कराने के लिए क़ानून बनाने की लड़ाई लड़ी, लेकिन यह समस्या पहले भी थी और आज भी है.

घरों में बच्चों से काम कराने वाले ये तक मानने को तैयार नहीं थे कि वे बच्चों के बचपन के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं.

बाल मज़दूरी

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संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, अभी भी पूरी दुनिया में 55 लाख बच्चे बंधुआ मज़दूर के रूप में ग़ुलामी झेल रहे हैं. यह संख्या पिछले दस-बारह सालों में घटी नहीं है.

हालांकि बाल मज़दूरी में थोड़ी कमी आई है. एक दशक पहले यह संख्या 26 करोड़ हुआ करती थी जो अब 17 करोड़ के आसपास है.

स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या 13 करोड़ थी जो अब घटकर छह करोड़ हो गई है.

हमारी अगली कोशिश है कि शताब्दी विकास लक्ष्य की जगह संयुक्त राष्ट्र का अगले साल आने वाले नए विकास पत्र में बाल ग़ुलामी की समाप्ति के मुद्दे को जोड़ा जाए.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव पिछले दिनों भारत आए थे तो मैंने इस बारे में लाखों लोगों के हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन दिया था और उन्होंने इस बारे में आश्वासन भी दिया है.

'भरोसा नहीं था'

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पांच-छह साल पहले मैंने ख़बर पढ़ी थी कि नोबेल समिति ने अन्य लोगों के अलावा पुरस्कार के लिए भारत से भी दो लोगों के नाम पर विचार किया था जिनमें एक मेरा भी नाम था.

उस समय कुछ लोग कहते थे कि आपने बाल अधिकार के लिए इतने काम किए हैं, अंतरराष्ट्रीय क़ानून बनाने में योगदान किया है, लेकिन मुझे भरोसा नहीं हो पा रहा था कि मैं इसके लिए पात्र हूं.

'सेलिब्रिटी नहीं हूं'

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जब पुरस्कार की घोषणा हुई तो किसी पत्रकार बंधु का फ़ोन आया. मैंने सोचा कि नोबेल पुरस्कार की घोषणा हो चुकी है और वो शायद मेरी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं. इसलिए मैंने गूगल में ढूंढना शुरू किया.

इसी बीच मेरे साथी मेरे कमरे में आ गए और नाचने-गाने लगे तब, मुझे लगा कि इस बार यह पुरस्कार मुझे ही मिला है.

मुझे यह पुरस्कार पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़जई के साथ मिला था. मैं मलाला और उनके परिवार को पहले से जानता था.

पुरस्कार समारोह में मैंने और मलाला ने जब बाप बेटी की तरह सबके सामने बात की तो ख़ासतौर पर नोबेल कमेटी और पश्चिम में लोगों को ताज्जुब भी हुआ.

पुरस्कार मिलने के बाद लोग मुझे सेलिब्रिटी समझने लगे हैं और ऑटोग्राफ़ और तस्वीरें खिंचवाने लगे हैं, लेकिन मैं कहता हूं कि मैं एक साधारण आदमी हूं.

'बड़ी ज़िम्मेवारी आ गई है'

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जब मैं पांच साल का था तब पहली बार नोबेल शांति पुरस्कार के बारे में सुना था. मैं सोचता था कि मैं भी किसी दिन किसी पुरस्कार विजेता के साथ फ़ोटो खिंचवाऊँगा.

पुरस्कार मिलने के बाद कोई मुझमें संतुष्टि का भाव नहीं है, बल्कि मैं और अधिक चुनौती और नैतिक तौर पर बड़ी ज़िम्मेवारी महसूस कर रहा हूं.

हमें बाल मज़दूरी के कलंक को समाप्त करना चाहिए और अब नहीं कर पाएंगे तो कब करेंगे!

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