कश्मीरी पंडित: 'हमारे ज़ख्म मत पूछो'

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कश्मीर घाटी से पंडितों के पलायन को इस महीने 25 साल पूरे हो गए हैं. पंडित मखन लाल उन लाखों पंडितों में से एक हैं जो 1990 में कश्मीर छोड़ कर नहीं गए.

1990 में कश्मीर में हथियारबंद आंदोलन शुरू हुआ तो कश्मीर में रहने वाले लाखों पंडित अपने घर-बार छोड़ कर चले गए.

जो चले गए वो वापस तो नहीं आए लेकिन जो तमाम मुश्किलों में रुके रहे उनकी भी खोज ख़बर न लेने के आरोप सरकार पर लगते हैं.

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पंडित मखन लाल वर्ष 2001 में कश्मीर घाटी में अपने गाँव आकुरा को उस समय डर के मारे छोड़ कर चले गए, जब अज्ञात हथियारबंद लोगों ने उनकी पत्नी की गोली मार कर हत्या कर दी.

मखन लाल अब पास के एक गांव मट्टन में अपने दो छोटे बच्चों के साथ रहते हैं, यहां वो अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं.

किराए के दो कमरों में रहने वाले मखन लाल सरकारी कर्मचारी हैं.

'काश कश्मीर छोड़ा होता'

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कश्मीर को छोड़ कर न जाने की वजह बताते हुए वह कहते हैं, "कुछ ऐसी मजबूरियां थीं, जिन्होंने जाने नहीं दिया और कुछ अपने घर और वतन से गहरी मोहब्बत भी कश्मीर में रुके रहने की वजह बनी."

लेकिन कश्मीर न छोड़ने की उनकी ज़िद की क़ीमत उनको अपनी पत्नी को हमेशा के लिए गवां कर चुकानी पड़ी.

वह बताते हैं, "जिस दिन मेरी पत्नी की हत्या हुई, उस दिन अपने आप से ये पूछा कि काश कश्मीर छोड़ा होता तो मेरी पत्नी की हत्या न हुई होती, लेकिन फिर दिल पर पत्थर रख कर इसे भगवान का फ़ैसला समझा और ज़िन्दगी को आगे बढ़ाया."

मखन लाल को यह बात हमेशा चुभती है कि उनकी पत्नी की हत्या आख़िर किसने की, इसकी जांच आज तक नहीं हो पाई.

पत्नी की हत्या के एक वर्ष बाद मखन लाल ने दूसरी शादी की.

रिश्तेदार जम्मू में

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वह कहते हैं, "दिल पर कितने ज़ख़्म हैं पूछो मत. सबसे बड़ा जो घाव मेरे दिल को लगा, वह मेरी पत्नी की हत्या है. दूसरा घाव मेरे लिए अपने घर में रह कर भी में बेघर रहने का है."

मखन लाल इस बात से भी काफ़ी परेशान रहते हैं कि उनके अपने पंडित लोग कश्मीर में नहीं हैं, जिसके कारण उनको काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

वह कहते हैं, "पहली बात तो यह है कि जब हमारे यहाँ कोई मरता है तो उसके धार्मिक रस्मों को पूरा करने के लिए जम्मू से लोगों को बुलाना पड़ता है. शादी ब्याह के लिए भी इसी प्रकार की परेशानियों से जूझना पड़ता है."

अपनी पत्नी की हत्या के बाद मखन लाल ने कश्मीर छोड़ने का इरादा भी किया और एक महीने के लिए जम्मू चले गए. लेकिन जम्मू पहुंच कर किसी ने उनको किराए पर जगह नहीं दी, जिसके बाद वह वापस कश्मीर आ गए.

खंडहर

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मखन लाल को इस बात का भी दुख है कि जब भी उनका कोई बड़ा त्योहार होता है तो उनको कश्मीर से बाहर जाना पड़ता है.

पंडितों को वापस कश्मीर में बसाने के भारत सरकार के मंसूबे की आलोचना करते हुए मखन लाल कहते हैं कि पहले भारत सरकार यहां रहने वाले पंडितों को अच्छी तरह बसाए फिर पलायन किए पंडितों को बसाने की बात करे.

उनका कहना है, "हमारे मकान खण्डहर बन चुके हैं, सरकार हमारा ख्याल क्यों नहीं करती?"

मखन लाल राजनेताओं से भी ख़फ़ा हैं, उनका कहना है कि आज तक कोई भी राजनेता उनका हाल चाल जानने तक नहीं आया.

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