नौकरी के लिए भारत आने लगे हैं अमरीकी

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भारत में सबसे तेज़ी से उभर रहे उपनगरों में शामिल गुडगाँव दुनियाभर के लिए आउटसोर्सिंग का केंद्र बन गया है.

यहाँ काम करने वाली कंपनियां बहीखातों से लेकर पेंशन, बीमा और क्रेडिट कार्ड तक, सभी सेवाएं दुनिया भर की कंपनियों को उपलब्ध कराती हैं.

यहाँ के व्यवसाय का मूल मन्त्र कम दामों पर सेवाओं को उपलब्ध कराना है. यह इसलिए मुमकिन हो पाया क्योंकि कंपनियां स्थानीय लोगों को ही नौकरी दे रही थीं जिनपर खर्च ज़्यादा नहीं करना पड़ता था.

लेकिन अब इस चलन में बदलाव देखने को मिल रहा है और दूसरे देशों के लोगों को भी भारत में नौकरियां मिलने लगी है.

सी-वेंट कंपनी उन कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर बनाती है जो इवेंट मैनेजमेंट का काम करते हैं.

विश्व की कई कंपनियां इनके बनाए सॉफ्टवेयर को बैठक और सम्मलेन को आयोजित करने के लिए उपयोग में लाती हैं.

अच्छा निवेश

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यह कंपनी मुख्य रूप से अमरीका में अमरीका की कंपनियों के लिए ही बनी थी, लेकिन इसके प्रमुख अधिकारी का कहना है कि बदलते वक़्त के साथ काम काफ़ी बढ़ गया है और उन्हें कई अमरीकी नागरिकों को भारत स्थित कार्यालय में नौकरी पर रखना होता है.

सी-वेंट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रेग्गी अग्रवाल कहते हैं, "अमरीकियों को नौकरी देने में खर्च ज़रूर ज़्यादा होता है, लेकिन जब आप ग्लोबल संस्कृति को अपने यहां लाना चाहते हैं तो ये निवेश आपको करना होता है. क्योंकि हमारे ज़्यादातर ग्राहक अमरीकी हैं और वे क्या चाहते हैं, अमरीकी पेशेवर हमारे बाकी कर्मचारियों को बेहतर बता सकते हैं, ये अच्छा निवेश होता है."

भारत के सख़्त वीज़ा कानून के मुताबिक विदेशियों को यहां पर रोज़गार वीज़ा के लिए 25,000 डॉलर के बराबर राशि कमानी होती है. इसका अर्थ यह है कि आम तौर पर नौकरी के लिए आए विदेशी मूल के लोग पढ़े लिखे और तजुर्बेकार होने चाहिए.

रास आता भारत

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युवा अमरीकियों की तरह कई दूसरे देशों के युवा भी गुड़गाँव के आईटी उद्योग में काम करने के लिए रह रहे हैं और उन्हें यहाँ काम करना और रहना रास भी आ रहा है.

28 साल की अमरीकी युवा पेशेवर रचेल कहती हैं, "भारत में काम करने पर केवल एक देश की जानकारी नहीं मिलती, बल्कि ग्लोबल जानकारी मिलती है. हमें यहां सिंगापुर, दुबई और थाईलैंड के पेशेवरों के साथ काम करने का मौका मिलता है."

रचेल भारत आने के अपने फ़ैसले के बारे में कहती हैं, "मेरी टीम यहां थी पर मैं उनसे कभी नहीं मिली और तीन सालों से ज़्यादा वक़्त से मैं इनसे फ़ोन पर ही बातें कर रही थी. तीन सालों तक फ़ोन पर काम करने के बाद इन सभी से असल में मिलना बहुत अच्छा लगा. कल मैंने एक हिंदी फिल्म देखी और मुझे बहुत मज़ा आया."

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भारत में इन पेशेवरों के काम करने की एक वजह यह भी है कि ये अनुभव उनके बायो-डाटा को बेहतर बनाता है.

वहीं दूसरी ओर यह बात भूलनी नहीं चाहिए की अब भी भारत में काम के लिए आने वाले प्रवासियों की संख्या यहाँ से हर साल अमरीका जाने वाले 40,000 लोगों से बेहद कम है.

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