दिल्ली: महिला सुरक्षा की किसको चिंता?

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नई दिल्ली के बीचोंबीच स्थित मेरे दफ़तर से सबसे नज़दीक का मेट्रो स्टेशन कुछ ही दूरी पर है, बमुश्किल दस मिनट का पैदल रास्ता.

लेकिन कई बार जब देर शाम काम ख़त्म कर घर जाने को होती हूं तो मन में एक किस्म की बेचैनी रहती है. उस समय सड़क पर लोग कम रहते हैं, स्टेशन तक का 10 मिनट का रास्ता निकल तो जाता है लेकिन डर और सहमे हुए कदमों के साथ.

कभी कभी ख़ुद से पूछती भी हूँ कि कहीं मैं बेवजह घबरा तो नहीं रही लेकिन ये सिर्फ़ मेरी कहानी नहीं है.

आख़िरकार, महिला सुरक्षा के मामले में भारत की राजधानी, नई दिल्ली की कोई अच्छी छवि नहीं है. एक साल से लगातार दिल्ली बिना किसी सरकार के है. दिल्ली अगले महीने चुनाव के लिए ख़ुद को तैयार कर रही है और ऐसे समय में बहुत सारी महिला मतदाता भी यही सवाल पूछ रही हैं.

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मशहूर महिलाओं को टिकट

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दिल्ली चुनाव में तीनों बड़े राजनीतिक दल- भारतीय जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने इस बार कुछ मशहूर महिला उम्मीदवारों और कुछ नए चेहरों को टिकट दिए हैं.

लेकिन ये कतई इस बात का संकेत नहीं हैं कि राजनीतिक दल लैंगिक समानता लाने की इच्छुक हैं. पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 सीटों पर तीन मुख्य राजनीतिक दलों की ओर से केवल 17 महिला उम्मीदवार उतारी गई थीं, जिनमें केवल तीन ही चुनाव जीत पाईं.

इस बार भाजपा ने महिलाओं को केवल सात और आम आदमी पार्टी ने केवल छह महिलाओं को टिकट दिया है.

भाजपा ने किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया है.एक पूरी पीढ़ी की महिलाएँ किरण बेदी को एक आइकन के रूप में देखती आई हैं. उन्होंने ग़लत पार्किंग के लिए एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कारवां की एक गाड़ी का चालान कर दिया था.

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काम पर जाते समय मुझे रास्ते में मिलीं रेखा जैसी महिलाएं उम्मीद करती हैं कि पूर्व पुलिस अधिकारी होने के नाते, किरण बेदी महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध रोकने के लिए दिल्ली में पुलिसकर्मियों को संवेदनशील बनाने में मदद कर सकती हैं.

लेकिन जिस तरह किरण बेदी राजनीति में आई हैं उसने भाजपा और किरण बेदी दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. मोदी का तीखा विरोध करने वाली किरण बेदी जब उन्हीं की पार्टी में शामिल हुई तो उन पर अवसरवादी होने का आरोप लग रहा है.

नए-पुराने महिला चेहरे

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दूसरी तरफ़ भाजपा ने एक नए चेहरे नूपुर शर्मा को पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के सामने खड़ा किया है. तीस वर्षीय नूपुर युवा, ऊर्जा और जोश और इस पूरे खेल में ग्लैमर का मिश्रण लेकर आती हैं.

पेशे से वकील और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की पूर्व छात्रा रह चुकीं नुपूर छात्र नेता रही हैं. लेकिन, जब राजनीति के बड़े अखाड़े की बात आती है तो माना जा सकता है कि वो राजनीति की नौसिखिया ही हैं.

आम आदमी पार्टी ने राखी बिडलान समेत छह महिला उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा किया है. राखी बिडलान ने 26 वर्ष की उम्र में 2013 में हुए दिल्ली चुनावों में जीत दर्ज की थी और केजरीवाल सरकार में मंत्री बनीं थीं.

आम आदमी पार्टी ने चुनावी वादों के तहत कहा है कि बसों में मार्शल तैनात करेंगी और सीसीटीवी कैमरे लगवाएँगे.

उधर भारत के राष्ट्रपति की बेटी और प्रसिद्ध क्लासिकल डांसर शर्मिष्ठा मुखर्जी को भी नहीं भूलना चाहिए. उन्होंने नृत्य क्षेत्र में कई पुरस्कार जीते हैं और एक सामाजिक कार्यकर्ता भी रही हैं.

राजनीतिक घराने से आने के बावजूद पिछले साल ही वो कांग्रेस में शामिल हुई हैं और उन्हें जमीन से जुड़ा नेता नहीं माना जाता है.

महिलाएँ वोटबैंक नहीं

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इस बार भाजपा ने महिलाओं को केवल सात और आम आदमी पार्टी ने केवल छह महिलाओं को टिकट दिया है.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किरण बेदी को भी उम्मीदवार बनाना, भाजपा का राजनीतिक चुनाव से ज़्यादा राजनीतिक मजबूरी है.

एक ऐसे राजनीतिक माहौल में, जहां पार्टियां वोट बैंक के पीछे भागती हैं वहाँ राजनीतिक पार्टियों के लिए महिलाओं को वोट बैंक नहीं माना जाता है.

महिला सुरक्षा, बेशक़, दिल्ली में एक बड़ा मुद्दा है. 2012 में जब नई दिल्ली में 23 वर्ष की छात्रा का चलती बस में सामूहिक बलात्कार हुआ था, उसके बाद से भारत की राजधानी को बार-बार 'रेप कैपिटल कहा गया.

दो साल बाद, दिसम्बर 2014 में कथित उबर बलात्कार ने साबित किया कि कुछ भी नहीं बदला है.

'रेप कैपिटल'

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राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में प्रति लाख महिला आबादी में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध की दर 52.2 है. जबकि दिल्ली में आँकड़ा 146.79 है.

और यही वो तथ्य है, जो मुझे उस मुद्दे से जोड़ता है, जहां से मैंने शुरू किया था. क्या चुनाव के बाद दिल्ली महिलाओं के लिए सुरक्षित होगी?

क्या राजनीतिक दल और खास तौर पर महिला उम्मीदवार महिलाओं की समस्याओं और उनकी ज़रूरतों के लिए ज़्यादा संवेदन शील होंगे?

क्या ख़ुद महिला उम्मीदवार इस मुद्दे को लेकर कुछ कारगर कदम उठाने की सोच रखती हैं?

इस समय राजनीतिक अखाड़े में कई महिला उम्मीदवार हैं लेकिन ये कहना मुश्किल है कि क्या वो एक असरदार राजनीतिक ताक़त बनकर उभरेंगी.

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