मोदी से क्या नहीं करा पाए ओबामा?

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अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा का समापन हो चुका है. इस दौरे को मीडिया में काफ़ी जगह मिली. लेकिन एक बात का कहीं जिक्र नहीं हुआ जिसके बारे में भारत आने से पहले ओबामा को काफ़ी उम्मीद थी.

जलवायु परिवर्तन पर पिछले नवंबर में चीन के साथ अमरीका राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ऐतिहासिक समझौता किया था.

उसके बाद से इस बात को लेकर उम्मीद बढ़ी थी कि ओबामा के भारत दौरे में भी जलवायु परिवर्तन को लेकर कोई समझौता होगा.

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दुनिया के सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक चीन ने पहली बार घोषणा की है कि उसका उत्सर्जन 2030 तक चरम पर पहुंच जाएगा.

कार्बन उत्सर्जन करने वाले दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश अमरीका ने कहा कि वो 2025 तक वर्ष 2005 के मुक़ाबले 26 से 28 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कटौती करेगा.

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उस समय इसी तरह की घोषणा की उम्मीद में सभी की नज़रें तीसरे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश भारत पर लगी थीं. माना जा रहा था कि इन घोषणाओं से इसी साल होने वाले वैश्विक जलवायु परिवर्तन समझौते की पृष्ठभूमि तैयार होगी.

भारतीय अधिकारियों का तर्क है कि भारत की तुलना चीन से करना सही नहीं है और भारत प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के मामले में भी चीन से काफ़ी पीछे है. भारत में अभी भी 30 करोड़ लोगों तक बिजली की पहुँच नहीं है.

पिछले दिसम्बर में पेरू में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक के दौरान पर्यवारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने बीबीसी को बताया था, "भारत से दुनिया चीन और अमरीका की तरह की घोषणा की उम्मीद नहीं कर रही है."

उन्होंने कहा, "फिर भी, एक लाख मेगा वॉट का सौर ऊर्जा प्लांट लगाने का मतलब है कि हम जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक लड़ाई में हम बाकियों से अधिक नतीजे देंगे."

भारत की नई सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी कि देश 2022 तक 100 गीगा वॉट तक सौर ऊर्जा का उत्पादन करने लगेगा.

सीमित लक्ष्य

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इससे पहले, भारतीय मीडिया में ख़बर आई थी कि अमरीका-चीन समझौते की तर्ज पर भारत के साथ पर्यावरण समझौता करने के लिए अमरीका बहुत उत्सुक था.

लेकिन भारत सरकार कोई भी वादा करने की इच्छुक नहीं थी, खासकर इस बारे में कि उसका कार्बन उत्सर्जन कब सर्वाधिक रहेगा.

जलवायु परिवर्तन पर लीमा में संयुक्त राष्ट्र की बातचीत में सभी देश इस बात पर सहमत हो गए थे कि वो मार्च 2015 तक वैश्विक तापमान में और वृद्धि रोकने के बारे में अपनी मंशा जाहिर करेंगे.

वैज्ञानिकों का मानना है कि खतरनाक़ जलवायु परिवर्तन से बचने के लिए वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी की दर दो डिग्री सेल्सियस के कम होनी चाहिए.

इसे पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र की भाषा में इंटेंडेड नेशनल डिटरमाइंड कांट्रीब्यूशन (आईएनडीसी) के नाम से जाना जाता है.

अमरीकी रणनीति

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आईएनडीसी को वैश्विक पर्यावरण समझौते की बुनियादी प्रस्थापना के रूप में पेश किया गया है.

इसमें कोई देश कार्बन उत्सर्जन के सबसे अधिक स्तर पर कब पहुंचेगा समेत कई अन्य जानकारियां होंगी.

इस बात को भांपते हुए कि भारत अभी इस पर बात नहीं करने जा रहा है, अमरीका ने ऊपरी तौर पर भारत सरकार पर सौर ऊर्जा लक्ष्यों पर बात करने का रास्ता चुना.

ओबामा की यात्रा के समापन पर दोनों देशों की ओर से जारी किए गए संयुक्त बयान में कहा गया है, "राष्ट्रपति ओबामा भारत के महत्वाकांक्षी सौर ऊर्जा लक्ष्य का स्वागत करते हैं और इस क्षेत्र में निजी निवेश और व्यापार को बढ़ाने की इसकी कोशिशों के लिए भारत की सराहना करते हैं."

इसमें कहा गया है, "राष्ट्रपति ओबामा ने इस क्षेत्र में निवेश के लिए अमरीका के सरकारी अधिकारियों की उपलब्धता की बात भी कही है."

कोयले पर निर्भरता

संयुक्त बयान में उन पांच स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों की सूची दी गई, जिनमें अमरीका भारत की मदद करेगा.

यदि ये सभी उपाय काम करते हैं तो भारत ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम कर सकता है या कम से कम बिजली घरों में जीवाश्म ईंधन से पैदा होने वाले उत्सर्जन से बच सकता है. लेकिन इसी बीच इसने एक बड़ी योजना शुरू कर दी है, जो वास्तव में कार्बन उत्सर्जन को और बढ़ाएगा.

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नई सरकार पांच साल के अंदर कोयला उत्पादन को दोगुना बढ़ाकर एक अरब टन करना चाहती है.

ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल ने इस महीने एक ट्वीट कर कहा था, "घरेलू कोयला उत्पादन में वृद्धि भारत की ऊर्जा सुरक्षा की ओर एक लंबा क़दम साबित होगा."

उन्होंने लिखा, "भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कोयला भंडार है, फिर भी हम अरबों डॉलर का कोयला आयात करते हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर इसका असर पड़ता है."

नई नीति

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अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुसार, भारत में 80 प्रतिशत बिजली का उत्पादन जीवाश्व ईंधन से होता है और वर्ष 2011 में देश में कुल कोयला उत्पादन का क़रीब 70 प्रतिशत की खपत ऊर्जा क्षेत्र में हुई.

वर्ष 2017 तक अपने ग्रिड में 70 गीगा वॉट से अधिक बिजली उत्पादन क्षमता जोड़ने की भारत की योजना है. इसका लगभग पूरा हिस्सा कोयला ऊर्जा प्लांट से आने वाला है.

देश के पास पहले से ही 250 गीगा वॉट बिजली उत्पादन क्षमता है.

राष्ट्रीय योजना आयोग के अनुसार, "नजदीक भविष्य में भी ऊर्जा क्षेत्र में कोयले की प्रमुखता बने रहने की संभावना है."

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