रेडियो पर 'चूहे-बिल्ली' का राजनीतिक खेल

पान दुकान

पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज इलाक़े में मस्तराम पान भंडार पर हमेशा तेज़ बजने वाले ट्रांजिस्टर की आवाज़ किसी वजह से कम है.

फिर भी भारतीय जनता पार्टी के चुनावी विज्ञापन की आवाज़ लोगों तक पहुंच सकती है.

पान खाने आए पेंटर रफ़ीक़ बातों-बातों में कहते हैं कि 'मोदी का ऐड तो अच्छा होता ही है.'

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हालांकि उनके साथी मोहम्मद शकील को केजरीवाल का इश्तिहार ज़्यादा पसंद है, जो आम आदमी पार्टी नेता ने 'बीजेपी के इश्तिहार के जवाब में बनवाया है.'

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कांग्रेस के विज्ञापन भी सुनने में आते हैं. आजकल राजधानी क्षेत्र में सुनाई देने वाले सभी रेडियो स्टेशनों पर वक़्त-वक़्त पर किसी न किसी राजनीतिक दल के विज्ञापन प्रसारित होते रहते हैं.

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कुछ इस अंदाज़ में कि एक जगह तो इसे रेडियो संसार में जारी 'चूहे-बिल्ली के खेल' की संज्ञा दी गई है.

कई रेडियो स्टेशनों में सीनियर पोज़ीशन पर काम कर चुके फ़िरोज़ अंसारी कहते हैं, "एफ़एम के आने के बाद रेडियो को देखने के लोगों के अंदाज़ में बदलाव आया है. एक बड़ी तादाद आज एफ़एम स्टेशनों के प्रोग्राम सुनती है. इस वजह से इनकी पहुंच बहुत बड़ी है."

राजनीतिक विज्ञापन

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हालांकि व्यवसायी प्रकाश गारिया जैसे भी लोग हैं जो रेडियो सुनते ही नहीं हैं.

आर्थिक जगत से जुड़े समाचार पत्र 'मिंट' के मुताबिक़ राजधानी के एफ़एम स्टेशन प्रति सप्ताह डेढ़ करोड़ लोगों तक पहुंचते हैं.

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अख़बार के मुताबिक़ 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान प्राइवेट रेडियो स्टेशनों को राजनीतिक विज्ञापनों से क़रीब 20 करोड़ रुपए तक की कमाई की उम्मीद है.

'आप' की प्रचार समीति के सदस्य राघव चढ्ढा कहते हैं, "हमारे दल के पास फंड सीमित है इसलिए हमारा ध्यान रेडियो की तरफ़ बहुत है क्योंकि रेडियो पर हम कम पैसों में अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से कह सकते हैं."

रेडियो की कम दर

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उनके मुताबिक़ एफ़एम चैनल्स प्रति 10 सेकंड 300 रुपये से लेकर 800 रुपये तक चार्ज करते हैं जबकि एक टीवी चैनल ने उनकी पार्टी से बातचीत में एक मामूली स्ट्रिप हफ्ते भर चलाने के लिए 70-80 लाख रुपयों की मांग की थी.

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केजरीवाल की पार्टी अपने इश्तिहारों को 'टारगेटेड' बनाने का भी प्रयास करता है– जैसे सुबह सात से 11 बजे के बीच जब शहर की बड़ी जनसंख्या कारों, मेट्रो और बसों में सफ़र कर रही होती है.

इश्तिहार का दूसरा बेहतर वक़्त शाम पांच से नौ के बीच है. फ़िरोज़ अंसारी मानते हैं कि रेडियो की कम दर की वजह है, उसका एक दायरे के भीतर पहुंचना.

लोकप्रिय रेडियो

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वो उदाहरण देते हुए कहते हैं कि दिल्ली के चुनाव में उतरा दल अगर सैटेलाइट टीवी चैनल पर विज्ञापन देता है तो उसका इश्तिहार चेन्नई और अरुणाचल प्रदेश में भी देखा जा सकता है जो उसके किसी काम का नहीं, लेकिन उसे उसके पैसे भरने पड़ते हैं.

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लोकल चैनल ये काम कर सकते हैं लेकिन वो लोगों में लोकप्रिय नहीं हैं.

दिल्ली, मुंबई और उस जैसे दूसरे बड़े शहरों में और उस दौर में जहां लोगों के पास वक़्त की कमी है, लोगों के पास टीवी देखने का वक़्त ही नहीं.

लेकिन वो रेडियो सुनते हैं जब ड्राइव कर रहे होते हैं. और बड़े शहरों में ड्राइव का वक़्त लंबा होता है.

कामकाज का बखान

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हालांकि रेडियो पर इस बार पहले 'आप' आई या कोई दूसरी पार्टी, इसे लेकर कई बाते हैं.

कई जगहों पर बीजेपी के– 'चलो चलें मोदी के साथ' वाले टैगलाइन वाले चार विज्ञापनों का ज़िक्र है तो कहीं उन इश्तिहारों का जिसमें 'आप' ने अपनी 49 दिन की सरकार के काम काज का बखान किया है.

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हां ये सभी मानते हैं कि रेडियो पर राजनीतिक विज्ञापनों की दिल्ली में शुरूआत 'आप' ने की थी.

लेकिन फिर भी बीजेपी ने वो इश्तिहार जारी किया जिसमें एक औरत ग़लत आदमी को वोट देने की बात कह रही है.

जवाबी विज्ञापन

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'आप,' ने तुरंत एक विज्ञापन जारी किया. इसमें अरविंद केजरीवाल बता रहे हैं कि उन्हें ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि उनके पास बहुमत नहीं था. इसलिए इस बार उन्हें और वोटों से जिताएं.

फ़िरोज़ अंसारी कहते हैं कि ये रेडियो की ख़ूबी है कि किसी भी मुद्दे पर जल्दी से जल्दी विज्ञापन तैयार हो सकते हैं और अचानक से सामने आए किसी मामले पर जवाब दिया जा सकता है.

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वो कहते हैं, "ऐसा प्रिंट मे तो लगभग नामुमकिन है और टीवी में बहुत ही ख़र्चीला और उसमें भी अधिक समय की दरकार होती है.”

आप और बीजेपी के राजनीतिक विज्ञापनों में अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी की आवाज़ों का जमकर इस्तेमाल हुआ है.

कांग्रेस के इश्तिहारों में वोटरों से दिल्ली की हुई प्रगति और दूसरे मामलों की बातकर पार्टी के लिए वोट मांगा गया है.

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