दिल्ली में किसका पलड़ा, कितना भारी

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शनिवार को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होने जा रहा है, जिसमें आठ पार्टियों के उम्मीदवार मैदान में हैं.

आज़ाद उम्मीदवारों को मिलाकर कुल 673 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला एक करोड़ 33 लाख से अधिक मतदाता करेंगे.

मुक़ाबला सीधा भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच है. कांग्रेस भी मैदान में है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, वो इस चुनावी दौड़ में काफी पीछे हैं.

अधिकतर सर्वेक्षण ये बता रहे हैं कि आम आदमी पार्टी को बहुमत प्राप्त हो जाएगा, लेकिन ये चुनाव पिछली बार की तरह कांटे का साबित हो सकता है.

बीबीसी संवाददाताज़ुबैर अहमद तीनों पार्टियों की कुछ रैलियों में गए और आम मतदाताओं के अलावा कुछ उम्मीदवारों से उनकी राय जानने की कोशिश की.

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दिल्ली चुनाव से इस बार मुक़ाबला मुख्य रूप से भाजपा और 'आप' के बीच है.

इस चुनाव की मुहिम के दौरान दोनों पार्टियों के बीच एक विज्ञापन जंग छिड़ी जिसका स्तर काफी गिरा हुआ था. यह चुनाव भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक प्रतिष्ठा की बात है और पार्टी इस चुनाव को हर हाल में जीतना चाहती है.

ये भी वोटरों को पता है कि चुनावी मुद्दों में बिजली, पानी, अवैध बस्तियों को नियमित करना, दिल्ली को दुनिया का सबसे सुन्दर शहर बनाने का वादा और महिलाओं की सुरक्षा ख़ास हैं.

लेकिन इस चुनाव से जुड़ी कई बातें अक्सर चुनावी मुहिम के शोर में मद्धम पड़ गई हैं.

पिछले साल के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की ज़बरदस्त हार हुई. केजरीवाल ने दिल्ली में 49 दिन सरकार चलाने के बाद अचानक सत्ता छोड़ दी, जिससे पार्टी और केजरीवाल की छवि काफी ख़राब हुई. एक समय पार्टी के नेताओं के बीच आपसी मतभेद और आन की लड़ाई से पार्टी का वज़ूद ख़तरे में पड़ गया.

मज़बूत आम आदमी पार्टी

लेकिन आज आम आदमी पार्टी एक बार फिर दिल्ली चुनाव में सब से अहम पार्टी मानी जा रही है. 'अराजकतावादी' केजरीवाल फिर से मुख्यमंत्री पद के योग्य माने जा रहे हैं और पार्टी पहले से मज़बूत नज़र आती है.

ये कायापलट कैसे? पार्टी के नेता आशुतोष कहते हैं, "आम चुनाव में ग़लतियां हुईं. पार्टी को दिल्ली में सत्ता छोड़ने से पहले हमें जनता के पास जाना चाहिए था. ये ग़लत हुआ. लेकिन हमने माफ़ी मांगी और पार्टी को मज़बूत करने के लिए इसके अंदर कई सुधार किए."

शक्ति नगर में पार्टी के एक कार्यकर्ता ने कहा, "केजरीवाल ने बड़ी मेहनत की. संगठन में नीचे से लेकर ऊपर तक सुधार किया गया. सब मतभेद दूर किए गए और शाखाओं को मज़बूत किया और ये सब कुछ मीडिया की नज़रों से दूर हो कर किया. इसका फल आज मिल रहा है."

चुनावी मुहिम में शामिल फ़िल्म अभिनेत्री गुल पनाग का कहना था कि चुनाव से कई महीने पहले पार्टी ने 'डेल्ही डायलॉग' शुरू किए जिनमें आम लोगों ने हिस्सा लिया. इन समारोहों में आम लोगों की समस्याओं का पता लगा, जिनका समाधान हमारी पार्टी के मैनिफेस्टो में शामिल किया गया.

पिछले चुनाव में कांग्रेस सत्ता में थी. आज दिल्ली में इसकी बुनियाद हिली हुई है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुख़र्जी ग्रेटर कैलाश से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं.

'बिखरी नहीं है कांग्रेस'

वो कहती हैं कि कांग्रेस बिखरी नहीं है. उन्हें आशा है कि इस चुनाव में पार्टी अच्छा प्रदर्शन करेगी, "कांग्रेस पार्टी को अपातकाल के बाद होने वाले चुनाव में भी धक्का लगा था, लेकिन बाद में पार्टी ने कई चुनाव जीते."

दूसरी तरफ भाजपा ने आम चुनाव में जीत के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भारी जीत हासिल की. दिल्ली में 'आप' ने चुपके चुपके काम किया, भाजपा जीत के नशे में थी, दिल्ली पर ख़ास ध्यान नहीं गया और जब गया तब तक थोड़ी देर हो चुकी थी.

इसका एहसास पार्टी को उस समय हुआ जब पिछले महीने नरेंद्र मोदी की पहली चुनावी सभा में अपेक्षा से कहीं कम संख्या में जनता आई. पार्टी का नेतृत्व घबरा गया.

बौखलाहट में किरण बेदी को पार्टी में शामिल करके उन्हें मुख्यमंत्री पद का उमीदवार घोषित कर दिया गया.

उम्मीदवारों के चयन के लिए पार्टी की समिति के एक सदस्य ने बीबीसी से कहा, "हमारे भूत को भी ख़बर नहीं थी कि बेदी को ऊपर से लाद दिया जाएगा. हमें ऐलान से थोड़ा पहले पता चला."

ऐसा ही पार्टी के दूसरे लोगों ने कहा.

बौखलाहट

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किरण बेदी का चयन एक तरफ पार्टी की बौखलाहट का इज़हार था तो दूसरी तरफ पार्टी के उन नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिरने का, जो काफी सालों से पार्टी की सेवा करते आ रहे थे और दिल्ली में चुनाव लड़ने का खुद को हक़दार मानते थे.

इससे पार्टी की दिल्ली यूनिट में विद्रोह सा हो गया. सबने ऊँगली उठाई पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह की तरफ. अमित शाह नर्वस ज़रूर हैं, लेकिन अपने फ़ैसले को सही साबित करने के लिए दिल्ली चुनावी मुहिम की ख़ुद निगरानी कर रहे हैं.

पार्टी ने केजरीवाल के ख़िलाफ़ जो विज्ञापनों के ज़रिए निजी हमले किए हैं उसके बारे में टिप्पणी करते हुए भाजपा के एक नेता ने कहा, "इन मामलों की कमान होती है अमित भाई के पास. हमें केवल आक्रमण करने के लिए आदेश दिए जाते हैं."

भाजपा की घबराहट को सभी महसूस कर रहे हैं. पार्टी के अंदर भी और इसके बाहर भी.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ने एक महफ़िल में कहा कि पार्टी पहली बार चाहती है कि कांग्रेस कुछ सीटें जीते. ज़ाहिर है अगर कांग्रेस दस या 12 सीटें हासिल करती है तो इसका फ़ायदा भाजपा को होगा.

कांटे की टक्कर

पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र विधान सभा के चुनाव मोदी के नाम पर लड़े थे और कामयाब हुई थी, लेकिन दिल्ली की चुनावी रैलियों में नारा अलग है, "केंद्र में मोदी और दिल्ली में बेदी."

प्रधानमंत्री के नाम कुछ ही सभाएं हैं. हाँ उनकी जगह पर उनका एक हमशकल पार्टी की चुनावी रैलियों में घूमता नज़र आता है.

इस व्यक्ति के इर्द गिर्द पार्टी कार्यकर्ता 'मोदी, मोदी' के नारे लगते हैं और मज़े लेते हैं. मनोरंजन इसका एक मक़सद हो सकता है.

इसका दूसरा अर्थ ये भी लगाया जा सकता है कि मोदी का नाम लिए बग़ैर पार्टी को जीत की आशा नहीं है.

सारे सर्वेक्षणों में आम आदमी पार्टी आगे है, लेकिन मुक़ाबला सही मायने में कांटे का है.

ऐसे में जीत उसी की होगी जो शनिवार को अधिक हरकत में रहे और लोगों को वोट डालने की सलाह देने सुबह सुबह वोटरों के घर पहुंच जाए.

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