बिहार: मझधार में मांझी और नीतीश के विकल्प

इमेज कॉपीरइट PIB

बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी चाहते तो बिहार की दलित-उत्पीड़ित जनता के पक्षधर और सेक्युलर-लोकतांत्रिक सियासत के तरफ़दार नेता बनकर एक नया इतिहास रच सकते थे.

लेकिन बीते कुछ महीनों के दौरान उनके काम, बयान और गतिविधियों पर नज़र डालें तो निराशा होती है. उन्होंने दलितों के बीच चुनावी-जनाधार पैदा करने की कोशिश ज़रूर की, पर दलित-उत्पीड़ितों के मुद्दों और सरोकारों के लिए कुछ खास नहीं किया.

ले-देकर वह बिहार के कुछ सवर्ण-सामंती पृष्ठभूमि के दबंग नेताओं के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संरक्षण-समर्थन में उभरते ‘दूसरे रामसुदंर दास’ नज़र आए.

अगर उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के रास्ते पर चलने की कोशिश की होती, तो नीतीश कुमार या शरद यादव उनके खिलाफ़ मुहिम छेड़ने का साहस नहीं कर पाते.

लेकिन कुर्सी पर बने रहने और जिस नीतीश ने उन्हें मुख्यमंत्री नामांकित किया, को चिढ़ाने और नीचा दिखाने के लिए वह भाजपा के शीर्ष पुरूष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही नहीं, राज्य के छोटे-मोटे भाजपा नेताओं का भी अभिनंदन करने लगे.

'भाजपा भी मांझी से खुश'

इमेज कॉपीरइट PTI

जदयू-राजद समर्थन की सरकार चला रहे मुख्यमंत्री ने भाजपा में किसकी-किसकी तारीफ नहीं की? वह भी अगले विधानसभा चुनाव से महज़ सात-आठ महीने पहले.

इस सहनशीलता के लिए नीतीश-शरद के धैर्य की तारीफ़ करनी होगी. शायद, उनमें डर भी था कि मांझी को छेड़ने से जद(यू)-राजद के दलित-समर्थन में दरार न पैदा हो!

उनके दिमाग में सवाल रहा होगा कि भाजपा को ऐसा मौका क्यों दें?

मांझी के बयान और प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर डालें तो उनके व्यक्तित्व की एक जटिल तस्वीर उभरती है. कभी वह बहुत हल्की किस्म की बातें कहते नजर आते हैं तो कभी नए राजनीतिक हस्तक्षेप का संकेत दे रहे होते हैं.

कभी वह सेक्युलर-सामाजिक न्याय की बात करते रहे हैं तो कभी ‘दस या बीस मिनट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा से दोस्ती कर लेने’ की अपनी पार्टी नेताओं को धमकी भी देते रहे हैं.

कभी उनमें वैचारिक प्रौढ़ता के अभाव के साथ एक तरह की सरलता दिखती तो कभी उनमें ज्यादा चतुराई, अति महत्वाकांक्षा और परले दरजे का अवसरवाद नजर आता रहा. उनके बारे में यह भी कयास लगाया जाने लगा कि अगले विधानसभा चुनाव आते-आते वह कहीं भाजपा के मददगार न बन जायें!

यह महज़ संयोग नहीं कि पिछले कुछ समय से भाजपा-एनडीए के बड़े नेता भी मांझी से खुश नज़र आते रहे. कभी प्रधानमंत्री मोदी तो कभी उमा भारती तो कभी पासवान ने उनकी तारीफ में कसीदे पढ़े.

यह भी संयोग नहीं कि उनकी अपनी पार्टी में सवर्ण-सामंती छवि के नेताओं ने उनके पक्ष में मोर्चा संभाले रखा. इनमें महाचंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रवीन्द्र राय जैसे लोग सबसे आगे हैं.

दलितों पर रवैया

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya

एक सवाल उठना लाज़मी है, अगर मांझी सचमुच दलित-उत्पीड़ित अवाम के हमदर्द रहे हैं, तो बिहार में ऐसे समुदायों के लिए चले कार्यक्रमों के प्रति उनका रवैया क्या था?

शायद ही इस बात पर किसी तरह का विवाद हो कि बिहार जैसे राज्य में भूमि-सुधार दलित-उत्पीड़ित समुदायों के पक्ष का सबसे प्रमुख एजेंडा है. आजादी के तुरंत बाद ही बिहार में भूमि सुधार कार्यक्रम लागू करने की कोशिश की गई.

लेकिन ताकतवर नेताओं की एक लाबी ने इसे नहीं होने दिया. क्या जीतनराम मांझी के ‘दलित-एजेंडे’ में भूमि सुधार जैसा अहम मुद्दा शामिल है? क्या अब तक के अपने कार्यकाल में मांझी ने भूमि सुधार की बंदोपाध्याय रिपोर्ट को पटना सचिवालय की धूलभरी आलमारियों से बाहर निकालने की एक बार भी कोशिश की?

अगर नहीं, तो कहां है उनका दलित-एजेंडा? दलित-एजेंडा सिर्फ भाषणबाजी नहीं हो सकता! ऐसी भाषणबाजी तो दलित समुदाय से आने वाले पहले के नेता भी करते रहे हैं. क्या अमीरदास आयोग को फिर से बहाल करने के बारे में कभी विचार किया?

इसका गठन कुख्यात रणवीर सेना के राजनीतिक रिश्तों की जांच के लिए हुआ था लेकिन भूस्वामी लाबी के दबाव में पूर्ववर्ती सरकार ने उस आयोग को ही खत्म कर दिया.

राज्य के मुख्यमंत्री और दलित नेता के तौर पर मांझी की बड़ी परीक्षा शंकरबिघा हत्याकांड के सारे अभियुक्तों के स्थानीय अदालत द्वारा छोड़े जाने के फैसले पर भी होनी थी.

क्यों ख़ामोश रहे मांझी?

शंकरबिघा गांव में सन 1999 के दौरान रणवीर सेना सेना की अगुवाई में 24 दलितों की हत्या की गई थी. कुछ समय पहले लक्ष्मणपुर बाथे कांड में भी ऐसा ही हुआ था. उस कांड में 58 दलित मारे गये थे. पर अदालत ने सबको बरी कर दिया.

शंकरबिघा और लक्ष्मणपुर बाथे जैसे हत्याकांडों को लेकर वह क्यों खामोश रहे? पुलिस और अन्य सरकारी एजेंसियों के स्तर पर इस तरह के मुकद्दमों से जुड़ी पड़ताल आदि में कितनी लापरवाही की गई होगी, इसका अंदाज लगाना मुश्किल नहीं.

बहुत संभव है, यह ‘लापरवाही’ योजना के तहत की गई हो. मांझी सरकार अमीर दास आयोग की बहाली या इस तरह की कोई और पहल कर सकती थी. पर अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ.

मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों सरकारी सम्मेलन कक्ष में राज्य के दलित-आदिवासी अफसरों की एक ‘गोपनीय बैठक’ को संबोधित किया.

फ़ायदा या नुकसान

इमेज कॉपीरइट Manish Shandilya

सवाल है, संवैधानिक ढंग से निर्वाचित एक मुख्यमंत्री कुछ समुदाय विशेष से जुड़े अफसरों की ‘गोपनीय बैठक’ क्यों संबोधित करता है?

ऐसे में, आज जब विधानसभा चुनाव को महज कुछ महीने रह गये हों, मांझी को बनाये रखना जद(यू)-राजद के नज़रिये से न केवल आत्मघाती होगा बल्कि भाजपा को मुंहमांगा मौका देने जैसा होगा.

जिस सियासी-समूह का कप्तान स्वयं अपने प्रतिद्वन्दी समूह के प्रति उदार और सहानुभूति वाला दिखे, वह भला चुनावी-रणक्षेत्र में कैसा प्रदर्शन कर सकता है!

ऐसे में नीतीश-शरद वही करना चाहते हैं जो उन्हें करना चाहिए. लेकिन एक पेंच है. राजभवन का, जहां भाजपा के एक पूर्व नेता विराजमान हैं.

अगर मांझी ने स्वेच्छा से इस्तीफा देकर नीतीश के शपथग्रहण का रास्ता तैयार नहीं किया तो कुछ मुश्किलें जरूर पैदा हो सकती हैं. पर संविधान इस बारे में साफ है, विधायक दल में बहुमत वाले नेता की बात ही निर्णायक होती है.

बहुमत का फैसला शनिवार को होना है. और बहुमत नीतीश के साथ नज़र आता है.