अगर मोदी इंद्रप्रस्थ का युद्ध हार गए तो!

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दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए जैसे-जैसे अरविंद केजरीवाल का चुनाव अभियान आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी और उसके राष्ट्रीय नेतृत्व की बेचैनी ज़ाहिर हो रही है.

भाजपा के स्थानीय नेताओं में से कई लोग किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने के हाईकमान के तरीक़े से नाराज़ हैं.

और उनमें से कई पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह को इस चुनाव में लगे दांव का एहसास है.

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वे आम आदमी पार्टी को चुनाव जीतने से रोकने की हर कोशिश कर रहे हैं. अभी तक मोदी के नाम, पैसे की ताक़त और कीचड़ उछालने के खेल का सहारा लिया गया, लेकिन इससे मन मुताबिक़ नतीजे नहीं निकल पाए हैं.

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विज्ञापनों की बमबारी के बाद प्रधानमंत्री के चुनाव अभियान में आम आदमी पार्टी के ख़िलाफ़ 'आधी रात में हवाला' का आरोप लगाया गया, लेकिन इसके बावजूद 'आप' सभी चुनाव सर्वेक्षणों में आगे है.

लेकिन सवाल उठता है कि भाजपा की विजयकथा में आख़िर ग़लती कैसे हो गई? आख़िरकार दिसंबर 2013 में दिल्ली चुनावों में उसने सबसे अधिक संख्या में सीटें जीती थीं.

चुनाव प्रचार

लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को सभी सात सीटों पर जीत मिली थी. मोदी की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा के मद्देनज़र ये चुनाव पार्टी के लिए बहुत आसान होना चाहिए था.

ख़ासकर तब 'आप' को ग़लत सलाह पर मुख्यमंत्री पद से अरविंद केजरीवाल के इस्तीफ़े का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा था.

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49 दिनों के बाद अरविंद ने जब सरकार छोड़ी, पार्टी और शासन करने की उसकी क़ाबिलियत के बारे में लोगों की एक राय बनी.

और अब जब भाजपा को चुनाव प्रचार के आख़िरी दिनों में ये लड़ाई मुश्किल लग रही है तो इसके लिए वो ख़ुद ज़िम्मेदार है.

एलजी पर रसूख!

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Image caption दिल्ली के लेफ्टीनेंट गवर्नर नजीब जंग.

मोदी और अमित शाह ने जो सबसे बड़ी ग़लती की वो ये कि उन्होंने विधानसभा का चुनाव कराने में देर की.

और वो भी तब जब ये साफ़ था कि 'आप' और कांग्रेस को तोड़े बग़ैर कोई सरकार नहीं बन सकती थी.

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लेकिन भाजपा ने लेफ़्टीनेंट गवर्नर पर अपने रसूख़ का इस्तेमाल करते हुए मामले को लम्बा खींचा.

इससे भाजपा को किस फ़ायदे की उम्मीद थी, ये साफ़ नहीं है, लेकिन इतना तय है कि 'आप' को एक लड़ाका ताक़त के रूप में ख़ुद को फिर से स्थापित करने में मदद मिल गई.

'मोदी लहर'

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हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में मिली चुनावी जीत के उत्साह से लबरेज़ भाजपा ने तब दूसरी ग़लती की.

उसने मुख्यमंत्री पद का कोई सशक्त उम्मीदवार पेश करने के बदले 'मोदी लहर' पर भरोसा किया. हालांकि महाराष्ट्र में यह रणनीति बहुत कारगर नहीं रही.

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यहां पार्टी बहुमत से फ़ासले पर रह गई या झारखंड में उसे ऑल-झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन से गठबंधन करना पड़ा.

लेकिन हरियाणा के नतीजे ने दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने के पार्टी के इरादे को हिम्मत दे दी.

चेहराविहीन अभियान!

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दिल्ली में भाजपा के पास पहले से ही मुख्यमंत्री पद के लिए एक मज़बूत और भरोसेमंद उम्मीदवार हर्षवर्धन थे.

लेकिन इस बार पार्टी ने चेहराविहीन अभियान का सहारा लिया और 'मोदी सरकार' के करिश्मे पर भरोसा किया.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार में मोदी की पहली रैली पर उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिली तो पार्टी को लगा कि यह रणनीति असफल होने वाली है.

और फिर पार्टी ने रास्ता बदला और केजरीवाल की अपील का जवाब देने के लिए एक स्थानीय भरोसेमंद चेहरे को लाने का फ़ैसला किया.

मास्टर स्ट्रोक!

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किरण बेदी को आगे लाने का फ़ैसला पहली नज़र में तो 'मास्टर स्ट्रोक' कहा गया.

लेकिन इस पूर्व पुलिस अधिकारी के चुनावी अभियान में क़दम रखते ही ये साफ़ हो गया कि उनका आकर्षण पार्टी के पारंपरिक मध्यवर्गीय वोट बैंक तक ही सीमित है.

और फिर उनकी कुछ हास्यास्पद बातों ने पार्टी के मध्यवर्ग के समर्थकों को भी दूर कर दिया और उनके शाही रवैये के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को भी कठिनाई होने लगी.

भाजपा ने तीसरी ग़लती को दुरुस्त करने के लिए चौथी ग़लती कर दी.

हवाला का आरोप

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मोदी और पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेताओं ने केजरीवाल पर निजी हमले शुरू कर दिए और 'आप' पर पैसे की अवैध लेन देन और हवाला का आरोप लगाया.

इन आरोपों में सच्चाई हो सकती थी, अगर भाजपा ने ख़ुद अपने घोषित चंदे के साठ फ़ीसदी से भी अधिक रक़म के स्रोतों का ब्यौरा दिया होता.

प्रवर्तन निदेशालय, इनकम टैक्स विभाग और रेवेन्यू इंटेलीजेंस निदेशालय की ओर से किसी कार्रवाई के बग़ैर दिल्ली में कई ऐसे लोग हैं जो इन आरोपों को बदनाम करने के अभियान के तौर पर देखेंगे.

पिछले अप्रैल में 'आप' को दो करोड़ रुपये का चंदा देने वाली कथित फ़र्ज़ी कंपनियों की जांच की ज़िम्मेदारी इन्हीं सरकारी एजेंसियों पर थी.

सत्ता विरोधी रुझान

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मुमकिन है कि मोदी कार्ड के उल्टे परिणाम भी जाएं क्योंकि हर चौराहे पर, हर अख़बार में प्रधानमंत्री का चेहरा और रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनकर मतदाता थक रहे हैं.

दिल्ली के चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहां एक विशुद्ध राजनीतिक मुक़ाबला हो रहा है.

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भाजपा के सामने एक ऐसी राजनीतिक पार्टी है जो मज़बूत है और जिसे भ्रष्टाचार के आरोपों में ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता है और जिसे सत्ता विरोधी रुझान का भी सामना नहीं करना पड़ रहा है.

अगर आम आदमी पार्टी जीतती है तो ये एक राजनीतिक मॉडल स्थापित हो जाएगा और जो देश के किसी और हिस्से में भी उभर सकता है.

मोदी अभी तक अपराजित रहे हैं, 2002 के बाद हर चुनाव जीत रहे हैं. लेकिन अगर मोदी इंद्रप्रस्थ का युद्ध हार गए तो उनकी अपराजेय वाली छवि धूमिल हो जाएगी, जो उन्होंने पिछले 12 सालों से बना रखी है.

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