बिहार: जीतनराम मांझी क्यों हुए बाग़ी?

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लगभग नौ महीने पहले जिस जीतनराम मांझी को नीतीश कुमार ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था वही मांझी अब बाग़ी हो गए हैं.

जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने शनिवार को पार्टी विधानमंडल दल की बैठक बुलाई है.

लेकिन विधानमंडल दल के नेता यानी की मुख्यमंत्री मांझी ने ही इसे अवैध ठहराते हुए इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया है.

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पिछले चौबीस घंटे से भी कम समय में सूबे के राजनीतिक समीकरण तेज़ी से बदले हैं.

राजनीतिक गलियारों में जदयू में नया नेता चुने जाने, जदयू के टूटने से लेकर बिहार विधानसभा भंग किए जाने जैसी कई संभावनाएं तैर रही हैं.

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लेकिन इन सबके बीच बड़ा सवाल यह है कि ऐसा क्या हुआ कि जदयू ने मांझी से किनारा करने का फ़ैसला कर लिया, जबकि बुधवार तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का कहना था कि मांझी को हटाना पार्टी के एजेंडे में नहीं है.

राजनीतिक उभार

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दरअसल, गुरुवार को जदयू में जो दरार निर्णायक रूप से सामने आई है, उसकी ज़मीन पिछले कुछ महीनों में तैयार हुई है.

मुख्यमंत्री बनने के बाद मांझी, हाशिए पर पड़े समुदाय के नेता के रूप में उभरे हैं. वे ख़ासकर दलितों और अतिपछड़ों को एकजुट करने में लगे रहे हैं.

ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन का मानना है कि, " नीतीश कुमार को यह लगने लगा है कि मांझी का यह राजनीतिक उभार उनको वापस बिहार के शीर्ष पद पर बैठाने के काम नहीं आएगा और यह स्थिति नीतीश को असहज करने लगी.’’

ग़ौरतलब है कि मांझी कई बार दोहरा चुके हैं कि वे चाहते हैं कि सूबे का अगला मुख्यमंत्री कोई दलित ही बने.

दावा

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वहीं मांझी के राजनीतिक बयान और प्रशासनिक फ़ैसले भी लगातार नीतीश और जदयू के लिए असहज स्थिति पैदा कर रहे थे.

जैसा कि वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "एक तरफ मांझी अपने कई फैसलों से प्रशासनिक रूप से नीतीश कुमार से बड़ी लकीर खींचने का दावा कर रहे हैं तो दूसरी ओर उनके बयान जदयू के सोशल इंजीनियरिंग की हवा निकालते रहे हैं."

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सुरूर के अनुसार इसी का नतीजा है कि अब जदयू ने उनसे किनारा करने का मन बना लिया है.

सुरूर हाल में ही मांझी के दिए उस बयान की याद दिलाते हैं जिसमें उन्होंने यह दावा किया था कि उनके कार्यकाल में नीतीश सरकार के मुक़ाबले बजट का ज़्यादा बेहतर इस्तेमाल हुआ है.

दूसरी ओर मांझी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही कई बार सीधे या इशारों-इशारों में तथाकथित ऊंची जातियों को निशाने पर भी लिया है.

सुरूर का मानना है कि मांझी की यह राजनीति नीतीश और जदयू को स्वीकार्य नहीं है जोकि एक बार फिर से सवर्णों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं.

दांव

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महेंद्र सुमन का मानना है कि अगर मांझी हटाए जाते हैं तो उन्होंने राजनीतिक रूप से ऐसा कुछ भी नहीं किया है जो जदयू के इस फैसले को सही ठहराए.

ऐसे में महेंद्र के अनुसार, अगर नीतीश आने वाले दिनों में फिर से मुख्यमंत्री या फिर चुनावों के दौरान मुख्यमंत्री पद के दावेदार बनते हैं, दोनों ही मामलों में वे अपने गठबंधन को जीत नहीं दिला पाएंगे.

महेंद्र कहते हैं, "जदयू और उनके सहयोगी दलों के राजनीतिक आधार में अब नीतीश को लेकर ज़्यादा आकर्षण नहीं है. ऐसे में नीतीश का नेता बनना इस आधार को भाजपा के और करीब ले जाएगा."

वहीं सुरूर अहमद दूसरी राय रखते हैं. वे कहते हैं, "नीतीश अगर मांझी को हटाने के बाद भी पार्टी में टूट को रोक पाते हैं तो शायद वे अगले कुछ महीनों में अपने काम-काज से अपने गठबंधन के प्रति फिर से जनता में विश्वास पैदा कर सकेंगे."

सुरूर का यह भी मानना है कि नीतीश अब किसी नए 'मांझी' पर दांव लगाने की ग़लती शायद ही करें.

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