राजस्थान: पंचायत चुनावों में भाजपा हावी

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राजस्थान के पंचायत चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपना परचम लहराया है.

जिला परिषद की कुल 1014 सीटों में से घोषित 880 नतीजों में से भाजपा ने 511 सीटें हासिल की हैं, जबकि कांग्रेस के हिस्से 349 सीटें आई हैं.

पंचायत समिति की कुल 6236 सीटों में से अब तक घोषित 6069 सीटों में से भाजपा 2962 पर काबिज़ रही, वहीं 2494 सीटें जीतकर कांग्रेस ने भी बराबर की टक्कर दी. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अब तक 38, बसपा ने 26 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 548 सीटों पर जीत दर्ज की है.

ये चुनाव काफी दिलचस्प रहे. राज्य सरकार के एक अध्यादेश ने सरपंच का चुनाव लड़ने के लिए आठवीं और जिला परिषद का सदस्य बनने के लिए दसवीं पास होना ज़रूरी कर दिया था. इस कारण बहुत से वरिष्ठ नेता चुनावी दौड़ से बाहर हो गए.

आगे वाली पीढ़ी सावधान

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कई पूर्व सरपंचों को चुनाव न लड़ पाने की कसक रही. निमेड़ा के पूर्व सरपंच दुर्गालाल ने बीबीसी को बताया कि वह इस बार भी अपनी किस्मत आजमाते, लेकिन नई शर्त ने उनकी राह रोक दी. हालाँकि वो इस कदम को अगली पीढ़ी के लिए अच्छा बताती हैं.

जनवरी में तीन चरणों में हुए मतदान में प्रदेश के एक लाख 7 हज़ार 707 वार्ड पंचों के लिए हुए 46 हज़ार 867 पंच और करीब 260 सरपंच निर्विरोध चुने गए.

दिलचस्प पहलू यह है कि राज्य में 13 ग्राम पंचायतें ऐसी हैं, जहाँ निर्धारित शैक्षणिक योग्यता नहीं होने के कारण सरपंच की कुर्सी खाली ही रह गयी. वार्ड पंचों की भी 542 सीटें खाली रहीं.

कुछ स्थानों पर सरपंच पद पर हारे हुए प्रत्याशी की भी हौसला अफजाई की गई. जोधपुर में अपने प्रत्याशी की हार से आहत समर्थकों ने चंदा कर उन्हें 11 लाख रुपए की माला भेंट की. संगरिया में भी पराजित उम्मीदवार को पांच लाख रुपए भेंट किए गए.

बहू-बेटियाँ आगे

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शिक्षा की अनिवार्यता के कारण कई जगहों पर बुजुर्गों ने शिक्षित बहुओं को भी आगे किया. जालौर के बूगाँव पंचायत में शिक्षित प्रत्याशी नहीं मिलने के कारण 11वीं कक्षा के छात्र 21 वर्षीय विजय सरपंच चुने गए.

मुख्यमंत्री राजे के पूर्व संसदीय क्षेत्र झालावाड में उनका दमखम बरकरार रहा. जिला परिषद की 27 में से 23 सीटों पर भाजपा ने अपना कब्ज़ा किया.

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