नीतीश का एक और यू टर्न

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सात फ़रवरी की शाम शायद भारतीय जनता पार्टी के सामने एक नई चुनौती लेकर आई. पहले ख़बर ये आई कि बिहार में नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड विधानमंडल दल की बैठक में एक बहुत बड़ी जीत हासिल की है. इस बैठक में जदयू के 111 में से 97 विधायकों ने नीतीश को नेता चुनने और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रस्ताव का समर्थन किया. थोड़ी देर बाद ये ख़बर आने लगी कि दिल्ली के सारे चुनाव बाद सर्वेक्षणों में ‘आप’ एक बड़ी जीत की तरफ़ बढ़ रही है.

भाजपा के दावे फुस्स

मामला तो बिहार में जदयू के अंदरुनी कलह का है, लेकिन इसमें भाजपा का भी बहुत कुछ दाव पर है.

क्योंकि भाजपा के नेता, सुशील कुमार मोदी बार-बार ये कहते रहे हैं कि जदयू के पचास से ज़्यादा विधायक किसी भी समय भाजपा के पाले में आ जाएंगे. लेकिन इम्तेहान की घड़ी में ऐसा कुछ हुआ नहीं. भाजपा और मांझी दोनों हार गए.

लेकिन बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है. लड़ाई लंबी है और अब सारी नज़रें राजभवन की ओर हैं.

सवाल

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नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बनते हैं या नहीं, इससे बड़ा सवाल अब यह है कि बिहार में हुए इस सियासी उठापटक का फ़ायदा ज़्यादा कौन उठायेगा क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव तय समय के अनुसार इसी साल के अंत में होने हैं.

साथ ही एक सवाल ये भी है कि आज नीतीश के नैतिकता के बड़े-बड़े दावों का क्या हुआ?

वैसे यह पहला मौक़ा नहीं है. पहले भी उन्होंने कई बार नैतिकता की बातें की हैं और उससे पीछे हटे हैं. ग़ौरतलब है कि पिछले साल 2014 में लोकसभा चुनावों में नीतीश के नेतृत्व में जदयू की हार हुई तो उन्होंने नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

उदाहरण कई हैं

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नीतीश ने 1999 में दो अगस्त को अवध आसाम मेल और ब्रह्मपुत्र मेल की सीधी टक्कर के बाद नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन वह फिर उसी साल रेल मंत्री बने. उनके मंत्री रहते ही जब 2002 के सितंबर में बिहार में राजधानी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई तो उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया.

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इसके उलट उन्होंने बिना जांच रिपोर्ट का इंतज़ार किए दुर्घटना का ठीकरा बिहार सरकार पर फोड़ा था.

इसी तरह नीतीश कुमार ने गुजरात दंगों के बाद वहां जाकर नरेंद्र मोदी को केंद्र की राजनीति में आने की दावत दे डाली थी.

और वही मोदी जब 2014 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बन गए तो नीतीश ने अपने सत्रह साल पुराने सहयोगी दल से नाता तोड़ लिया.

मंशा

नीतीश कुमार ने पिछले साल जब इस्तीफ़ा देकर जीतनराम मांझी को नेता चुना था तो उनकी मंशा महादलितों का चैंपियन बनने की थी.

कुछ उसी तरह जैसे कि उन्होंने मुसलमानों का नेता बनने की ख़्वाहिश से भाजपा से नाता तोड़ा था. उन्होंने जीतनराम मांझी को यह सोच कर मुख्यमंत्री बनाया था कि महादलित वोट बैंक उनकी पार्टी में पूरी तरह लौट आएगा.

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शायद वह इसमें सफल होते. लेकिन नीतीश, जो कि हमेशा सबको साथ लेकर विकास करने का दावा करते रहे हैं, अपने साथ कुछ ज़्यादा ही सामाजिक समूहों को जोड़ने में लग गए. भाजपा से हार मानने के बाद वह तुरंत ‘बड़े भाई’ लालू की गोद में बैठ गए. रणनीति थी कि यादवों को भी जोड़ लिया जाए. ग़ौरतलब है कि पिछले आम चुनाव में राजद-कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 30 फ़ीसद वोट मिले थे जबकि जदयू-भाकपा गठबंधन को सिर्फ़ 17 फ़ीसद मत ही मिले थे. इस बीच इनके ख़ेमे में हलचल मचने लगी ओर नीतीश के पुराने सहयोगी दल भाजपा ने इसका पूरा फ़ायदा उठाया.

सवर्ण गुट का दबाव

लेकिन मांझी के कुछ बयानों से जदयू के प्रभावशाली सवर्ण नेताओं के गुट को परेशानी होने लगी. उधर लालू के साथ मिलने से भी यह तबक़ा कुछ सहम सा गया था.

ऐसे में इस प्रभावशाली गुट के दबाव में नीतीश को एक बार फिर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से पीछे हटना पड़ा.

नीतीश ने शनिवार को विधानमंडल दल का नेता चुने जाने के बाद कहा कि सोशल इंजीनियरिंग तभी कामयाब होती है जब क़ानून-व्यवस्था बेहतर हो. मतलब ख़ुद समझा जा सकता है.

मांझी की रणनीति

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जब नीतीश अपने महादलित, अति पिछड़ा और ऊंची जातियों को अपनी तरफ़ लाने की दोबारा कोशिश कर रहे थे तब मांझी चुपचाप नहीं बैठे थे.

वह तमिलनाडु के पनीरसेल्वम नहीं मांझी थे और अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार करने में लगे थे.

मांझी अच्छी तरह जानते हैं कि शायद अभी वह सियासी खेल में नहीं जीत पाएं लेकिन उन्हें पूरी उम्मीद है कि अगर अगले चुनाव में भाजपा जीतती है तो उन्हें बड़ा राजनीतिक पुरस्कार मिलेगा.

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