रुमाल के हिलते ही 'जल्लाद ने लीवर खींच दिया'

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मुंबई सीरियल धमाकों में दोषी क़रार दिए गए याक़ूब मेमन को गुरूवार सुबह फांसी दे दी गई.

सुबह जब नागपुर सेंट्रल जेल की दीवारों के पीछे जेल कर्मचारियों की चलहक़दमी तेज़ रही होगी, और याक़ूब को फांसी दिए जाने से पहले अगर नहलाया-धुलाया गया होगा तो संभव है शायद उनकी अंतिम इच्छा के बारे में भी पूछा गया हो!

जेल में होने वाली ऐसी ही तमाम औपचारिकताओं और फांसी की प्रक्रिया के बारे में जेल के कर्मचारियों के अलावा शायद ही कोई जानता हो.

लेकिन 1978 में रायपुर सेंट्रल जेल में फांसी का आंखों देखा हाल जानने का एक मौक़ा मिला छत्तीसगढ़ अख़बार के संपादक सुनील कुमार को.

वो 25 अक्तूबर 1978 को रायपुर सेंट्रल जेल में हत्या के दोषी बैजू की फांसी देखने पहुंचे थे. हालांकि अब जेल अधिकारियों के अलावा और किसी को फांसी देने की जगह तक जाने की इजाज़त नहीं है.

बाद में उन्होंने इस अनुभव को लफ़्ज़ों में पिरोया.

फांसी का हाल, सुनील कुमार की ज़ुबानी -

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Image caption सुनील कुमार. (फ़ाइल फ़ोटो)

बैजू ऊर्फ़ रामभरोसे की फांसी की तारीख़ तय होने से कोई सप्ताह भर पहले मैंने उनसे मिलना-जुलना शुरू कर दिया था.

बैजू पर आरोप था कि उन्होंने तांत्रिक क्रियाओं के लिए एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या की थी.

लेकिन हर मुलाक़ात में बैजू अपने को बेगुनाह बताते थे.

उनका दावा था कि उनकी पत्नी ने अपने प्रेमी से मिलकर उन्हें फंसाया है.

फांसी वाले दिन एक क़िस्म की अंतहीन उत्तेजना से भरा हुआ मैं सुबह तीन बजे के आसपास जेल पहुंचा.

जहां मुझे जेल मंत्री के इजाज़तनामे को सौंपने के बाद बैजू की कोठरी में ले जाया गया. वहां तब तक कुछ-कुछ तैयारियां शुरू हो चुकी थीं.

'बच्चों से मिलवा दो...'

बैजू को पहनाने के लिए नए कपड़े रखे थे. एक पंडित वहीं बैठकर उसे तुलसी और गंगाजल देने की कोशिश कर रहा था और उसे बार-बार राम का नाम लेने को कहे जा रहा था,"राम का नाम लो बैजू..राम का नाम."

लेकिन बैजू राम का नाम लेने को पूरी तरह ख़ारिज कर रहे थे. वो आख़िरी पल तक यही मान रहे थे कि वह बेक़सूर हैं और उन्हें फंसाया गया है.

आख़िरी समय में वह अपने बच्चों से मिलने की मांग कर रहे थे, "हमारे बच्चों को एक बार दिखला देते सरकार और हम कुछ नहीं मांग रहे हैं. मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं. उन्हें मैं अपने कंधे पर रखकर गाय चराता था. बहुत छोटे-छोटे बच्चे हैं. मुझे मरना तो है ही, बस एक बार मुझे उनसे मिलवा देते .. बस एक बार!"

पंडित ने उन्हें फिर से हाथ में गंगाजल देकर पीने को कहा लेकिन वह गिड़गिड़ाने वाली मुद्रा में बच्चों से मिलवाने की मांग करते रहे.

उन्होंने अंजुली में रखे गए तुलसी के पत्ते को खैनी की तरह मलना शुरू किया था.

जेलर एक काग़ज़ निकालकर उनकी फांसी का फ़रमान पढ़ रहे थे.

नहाने से इंकार

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जेल अधीक्षक ने दो सिगरेट सुलगाई. एक ख़ुद के लिए और दूसरी उन्होंने बैजू की कंपकपाती उंगलियों में थमा दी.

जेलर ने बैजू से नहाने के लिए कहा, जिससे उन्होंने साफ़ इंकार कर दिया. बहुत मुश्किल से वह नए कपड़े पहनने को राज़ी हुए. कपड़े क्या थे, एक कुर्तानुमा बनियान और एक चड्डी.

लेकिन जब हथकड़ी में हाथ डाली जाने लगी तो वह नाराज़ हुए, "इसकी अब क्या ज़रुरत है. हम ऐसे ही चल देंगे!"

समझाने-बुझाने के बाद उनके हाथों में हथकड़ी लगाई गई और उनकी बाहें एक रस्सी से पीछे कर बांध दी गईं.

जेल अधीक्षक ने फिर से सिगरेट पीने के लिए पूछा. उसने हथकड़ी लगे हाथों को लेकर झल्लाहट दिखाई तो जेल के एक कर्मचारी ने उसे अपनी उंगलियों से सिगरेट पिलाई.

बाहर पूरी तैयारी हो चुकी थी. सिपाहियों की बूटों की आवाज़, जलाए जा रहे पेट्रोमैक्स और मशाल और इन सबके बीच जब बैजू के सिर पर एक काले रंग का कनटोप डालकर उनसे उनका चेहरा ढका गया तो उन्होंने आंखें खुली रखने को कहा. लेकिन सिपाहियों ने कनटोप डालकर उसका नाड़ा गर्दन पर कस दिया.

दो सिपाहियों ने बैजू को बाज़ुओं से खड़ा किया और उन्हें जेल की कोठरी से बाहर लेकर आ गए.

हिलती रस्सी

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बैजू ने फिर से कनटोप उतारने के लिये कहा तो जेल अधीक्षक के कहने पर कनटोप उतार दिया गया.

कोई सौ क़दम चलने के बाद हम सब जेल की चारदीवारी के भीतर ही खुले मैदान में आ गए थे.

सामने एक चबूतरा बना था, जहां चार मशाल और पेट्रोमैक्स की रोशनी में फांसी के दो फंदे साफ़ नज़र आ रहे थे. सिपाहियों का एक पूरा दल चबूतरे के दोनों ओर फैल गया था.

विरोध के बाद भी काले रंग का कनटोप बैजू के चेहरे पर चढ़ाया जा चुका था. उन्हें चबूतरे पर ले जाया गया तो सबकी सांसें थमी हुई थीं.

बैजू के सिर में फंदा डालकर उसे कसा जा रहा था, वहीं उनके पैरों को भी रस्सी से बांधा जा रहा था.

मशाल, टॉर्च और पेट्रोमेक्स की रोशनी के बीच सारी तैयारी को अंतिम रूप दिया जा चुका था.

कुछ ही मिनटों में जेल अधीक्षक ने रुमाल से इशारा किया और चबूतरे के पास खड़े एक व्यक्ति ने चबूतरे से जुड़ा लीवर खींच दिया.

इस पूरे सन्नाटे में एक हल्की-सी आवाज़ आई-‘एह’ और बैजू का शरीर एक झटके के साथ चबूतरे के गड्ढे में झूल गया. मुझे हवा में बस एक रस्सी हिलती दिखाई दे रही थी.

जेल अधिकारियों के साथ हम सब जल्दी से चबूतरे के पीछे पहुंचे, जहां बैजू का शरीर छटपटा रहा था.

कुछ देर के बाद जेल के डॉक्टर ने बैजू की जांच की और बताया कि उसकी धड़कनें अभी भी चल रही हैं.

फांसी के बाद भी धड़कन

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गर्दन की नलिकाओं के टूटने के साथ ही शरीर का दिमाग़ से संपर्क टूट जाता है लेकिन कुछ देर तक शरीर काम करता रहता है.

डॉक्टर ने फिर कुछ मिनटों बाद बैजू की जांच की. धड़कनें अभी भी चल रही थीं. तीसरी बार जांच के बाद डॉक्टर ने मौत की पुष्टि की.

बैजू का शरीर फंदे से उतारा जा रहा था तो मैंने देखा, गर्दन से ख़ून की कुछ बूंदें टपकी हुई थीं और उसके सफ़ेद कुर्तानुमा बनियान पर भी ख़ून के कुछ क़तरे थे. फांसी वाली जगह को सफ़ेद चूने से पोता गया था, वहां भी ख़ून बिखरा हुआ था.

मेरे पास रुकने का कोई और कारण नहीं था. मैं जल्दी से जेल से निकलकर अपनी रिपोर्ट पूरी कर लेना चाहता था.

आपको यह बात अमानवीय लग सकती है कि बैजू की फांसी से पहले और उनकी फांसी के बाद भी बैजू की मौत मेरे लिए संवेदना के किसी धरातल पर प्रभावित करने वाली नहीं थी.

इसके बजाय फांसी की आंखों-देखी रिपोर्टिंग के लिये इजाज़त मिलना, बैजू की मौत को देखना और फिर उसे लिखना मेरी पहली और अंतिम प्राथमिकता थी, जिसकी उत्तेजना मुझ पर लगातार हावी थी.

(आलोक प्रकाश पुतुल से बातचीत पर आधारित, ये कहानी बीबीसी पर पहले प्रकाशित हो चुुकी है.)

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