कम अंतर वाली सीटें बड़ा अंतर करेंगी?

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दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव के नतीजों को बदले हालात में देखें तो संभावनाओं की कई तस्वीर उभरती दिखती हैं.

भाजपा ने पिछली बार 31 सीटें जीतीं थी और 29 पर वह दूसरे नंबर पर रही थी. एक तरह से पार्टी के पास पाने के लिए बहुत कुछ है और खोने के लिए भी.

बहुमत के लिए

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कई सीटें ऐसी हैं जहां पार्टी बड़े अंतर से जीती थी और कुछ ऐसी भी थीं जिन्हें वह क़रीबी मुक़ाबले में हारी थी. ज़ाहिर है पार्टी ने इन पर पूरा ज़ोर लगाया होगा.

भाजपा ने पिछली बार दिल्ली कैंट 355 वोट से, विकासपुरी 405 के अंतर से, संगम विहार 777 मतों से, सदर बाज़ार 796 से और मादीपुर 1103 वोट के फासले से गंवा दी थीं. बहुमत के लिए उसे इन्हीं सीटों को जीतना भर था.

मगर राजनीति में हमेशा दो और दो चार नहीं होता और इस बार 'आप' के लिए भी ये सीटें बहुत मायने रखती हैं क्योंकि मतदान बाद के सर्वेक्षणों ने उसके लिए माकूल माहौल बना दिया है.

नतीजे

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नतीजे बताएंगे कि इन सीटों पर लोगों की राय किस हिसाब से और किसके पक्ष में कितनी बदली है.

आम आदमी पार्टी पिछले विधानसभा चुनाव में 28 सीटों पर चुनाव जीती थी और 20 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर रही.

इनमें आरके पुरम में हार का अंतर 326, कालकाजी में 2044, राजिंदर नगर में 1796, जनकपुरी में 2644 और करावल नगर में 3083 था.

कांग्रेस की ज़मीन

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आम आदमी पार्टी के लिए अगर लहर जैसी कोई बात नहीं हुई तो यह चुनाव उसके लिए वाकई चुनौतीपूर्ण है.

ऐसी कई सीटें हैं जहां दूसरे और तीसरे स्थान के बीच मामूली अंतर है और इससे लगता है कि 'आप' ने पिछले चुनाव में कांग्रेस की ज़मीन पर अच्छी सेंध लगाई थी.

ये सिलसिला अगर इस चुनाव में भी जारी रहा, तो कांग्रेस के लिए मुश्किल भरी स्थिति हो जाएगी जहां उसके विधायकों की संख्या के आठ से आगे बढ़ने की संभावना पर पानी फिर सकता है.

बसपा कहां?

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हालांकि पिछली बार कांग्रेस कुल 17 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही थी पर इन चुनावों में राजनीतिक पंडित उसे गंभीर दावेदार के तौर पर नहीं देख रहे.

मायावती की बसपा दिल्ली में एक अहम राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरी थी, लेकिन पिछली बार उसकी भद पिट गई थी.

वह केवल नरेला सीट पर दूसरे नंबर पर रही जहां उसकी हार का अंतर 20 हज़ार से भी ज़्यादा का था.

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