'मोदी को झटका, पर वे कभी नहीं सीखेंगे'

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दिल्ली में आम आदमी पार्टी की भारी बहुमत से हुई जीत, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सोचने पर मजबूर करता है.

लेकिन शाह और मोदी की काम करने की जो शैली है उससे नहीं लगता है कि वो इस चुनाव से कोई सबक सीखेंगे.

हालांकि इस चुनाव से देश के अन्य हिस्सों में अन्य पार्टियों को एक उम्मीद की किरण दिख रही है.

लेकिन एक नई किस्म की राजनीति के ग़ैरमौजूदगी में वहां भी ऐसा चमत्कार होगा, कहना मुश्किल है.

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जैसा कि कहावत है, नरेंद्र मोदी जो चाहते थे, उसके बारे में उन्हें सावधान रहना चाहिए था.

दिल्ली विधानसभा चुनावों के प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने कह दिया था, "जो देश का मूड है, वही दिल्ली का मूड है."

अब जबकि दिल्ली ने आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटें और 54 फ़ीसदी वोट दे दिया है, प्रधानमंत्री निश्चित तौर पर सोच रहे होंगे कि देश के दूसरे हिस्सों में बन रहे मूड के लिए इसके क्या मायने हैं.

भारतीय जनता पार्टी की इस ज़बरदस्त हार के राष्ट्रीय नतीजे पर विचार करने के लिए हम जब दिल्ली के बाहर देखते हैं, दो सवाल उठते हैं, एक भाजपा के लिए और दूसरा विपक्ष के लिए.

क्या मोदी संघ पर लगाम लगाएंगे?

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पहला सवाल यह है कि क्या मोदी और भारतीय जनता पार्टी दिल्ली के नतीजों से कुछ सीखेंगे और संघ परिवार की विभाजनकारी राजनीति पर लगाम लगाएंगे?

क्या प्रधानमंत्री को यह अहसास होका कि वो सिर्फ़ घोषणाओं के बूते मतदाताओं को नहीं लुभा सकते?

और अभी नहीं तो बाद में उन्हें रोज़गार, विकास, सफ़ाई और ढांचागत सुविधाओं जैसे चुनाव पूर्व वायदों पर काम करना ज़रूरी होगा?

कोई भी राष्ट्रीय नेतृत्व दिल्ली चुनावों के नतीजों को इस रूप में देखेगा कि यह उभर रहे राष्ट्रीय मूड का एक छोटा और साधारण सा प्रतिबिंब है और फिर अपने कामकाज में बड़ा बदलाव लाएगा.

पर मुझे नहीं लगता है कि मोदी और अमित शाह तर्कसंगत फ़ैसले लेंगे.

हम यह पहले से ही देख रहे हैं कि राष्ट्रीय सरकार और इसकी नीतियों के बचाव की कोशिशें हो रही हैं.

दिल्ली को दोहराना आसान भी नहीं

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किसी भी तरह का बदलाव के अभाव में इस बात का ख़तरा है कि भाजपा की नाकारत्मक और संकीर्ण भावनाएं और तेज़ हो सकती हैं.

जहां तक विपक्ष की बात है, हर एक के मन में यही बात होगी कि मोदी लहर को रोकने के आम आदमी पार्टी के कारनामे को वे कैसे दुहरा सकते हैं.

इसका छोटा उत्तर तो यही होगा कि ऐसा करना बहुत आसान नहीं है.

वर्ष 2014 के आम चुनाव और इसके बाद अबतक हुए तमाम बड़े राज्यों, मसलन, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू एवं कश्मीर और दिल्ली के चुनावी नतीजों से साफ़ है कि इस लहर के प्रभावी बने रहने के लिए दो शर्तें ज़रूरी हैं.

मोदी 'फ़ैक्टर' की ख़ामियां ज़ाहिर

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पहली बात, सत्ताधारी दल का भ्रष्टाचार, खराब प्रशासन और सरकार विरोधी भावनाओं का होना.

दूसरी बात, भारतीय जनता पार्टी का मजबूत विकल्प न होना.

वर्ष 2014 में यूपीए अपनी साख खो चुकी थी और भाजपा का कोई असली राष्ट्रीय विकल्प नहीं था.

हरियाणा में भी यही हुआ, जहां मोदी लहर हुडा सरकार को बहा ले गई.

पर महाराष्ट्र में शिव सेना की वजह से मोदी कारक की सीमाएं ज़ाहिर हो गईं और झारखंड में भी जीत हासिल करने के लिए भाजपा को ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन की मदद की ज़रूरत पड़ी.

दिल्ली में रुक गई मोदी की गाड़ी

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दिल्ली में नकारात्मकता का 'आप' पर असर नहीं हुआ और वो हर उस व्यक्ति की स्वाभाविक पसंद बन गई जो भाजपा से नाखुश था.

यही वजह है कि मोदी की गाड़ी यहां आकर रुक गई.

क्या बिहार में ऐसी ही स्थितियां दुहराई जा सकती हैं? शायद हां, यदि जनता दल यूनाईटेड और राष्ट्रीय जनता दल एकजुट और मजबूत बने रहें और अतीत के खराब शासन के रिकार्ड को दुरुस्त करें.

लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल और वाम दलों की जगह उसी तीसरे विकल्प की भूमिका में खुद को देख रही है, जो दिल्ली में आप ने निभाई और संभव है कि वो सफल रहे.

नई किस्म की राजनीति

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आम आदमी पार्टी की जीत ने दूसरी जगहों पर ग़ैर भाजपा दलों को एकजुट कर दिया है. जम्मू और कश्मीर में अब पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी से ज़्यादा मोल भाव कर सकती है.

हालांकि सबसे ज़रूरी बात यह है कि दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी की हार राजनीतिक दलों के बीच किसी रणनीतिक एकजुटता की वजह से नहीं हुई है. यह नई किस्म की राजनीति के उभरने का नतीजा है.

राष्ट्रीय स्तर पर मोदी का प्रभुत्व दवाब में तभी आ सकता है जब दूसरी जगहों पर भी इस तरह की नए किस्म की राजनीति अपनी पकड़ मजबूत बनाए. वो चाहे आप के नेतृत्व में हो या उस तरह के किसी और की अगुआई में.

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