बिहारः दलित-पिछड़ा वर्ग एकता में दरार?

उत्तरप्रदेश और तमिलनाडु में जहां दलित और पिछड़ा वर्ग एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंदी लगते हैं, वहीं बिहार में इनकी एकता के सहारे ढाई दशक से पार्टियां सत्ता में हैं.

मगर मांझी प्रकरण के बाद इस एकता पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं.

दलितों में ग़ुस्सा

मांझी को जदयू के विधानमंडल दल के नेता पद और बाद में पार्टी से बर्खास्त किए जाने के बाद पटना सहित बिहार के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए हैं. माना जा रहा है कि दलित समुदाय खुद को ठगा महसूस कर रहा है.

इस पर दलित चिंतक प्रोफ़ेसर रमाशंकर आर्य कहते हैं, ‘‘दलितों ने पिछड़े वर्ग से आने वाले लालू और नीतीश जैसे नेताओं का साथ देकर उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बिठाए रखा. पर अब उन्हें लग रहा है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे एक दलित को हटाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. इससे दलित अपमानित महसूस कर रहे हैं.’’

आर्य का मानना है कि आने वाले दिनों में दलित-पिछड़ा एकता में दरार पड़ सकती है.

मांझी की राजनीति

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार भी यही मानते हैं. वह कहते हैं कि यह इस पर निर्भर है कि मांझी कैसे राजनीतिक फ़ैसले लेते हैं.

अजय कहते हैं, ‘‘सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि मांझी अपनी भूमिका का निर्वहन किस रूप में करते हैं. वे अपनी राजनीति को क्या चेहरा और आकार देना चाहते हैं.’’

बिहार में समाजवादी और वामपंथी आंदोलन के दौरान यह राजनीतिक समीकरण बने थे. 1990 के दशक में मंडलवाद के उभार के बाद यह और मज़बूत हुई.

नीतीश कुमार ने महादलित सबलीकरण जैसे हस्तक्षेप और अति पिछड़ों को पंचायत और नगर निकाय चुनावों में आरक्षण देकर इसे और आगे बढ़ाया.

इसे दोनों सामाजिक समूहों को राजनीतिक हिस्सेदारी और सम्मान मिला.

दोनों समुदायों को नुक़सान

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन के मुताबिक़, ‘‘दलितों को जहां बिहार की राजनीति में जगह मिली वहीं शीर्ष राजनीतिक पद एक तरह से पिछड़ों के लिए आरक्षित हो गए.’’

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आशंका जताई जा रही है कि अगर इनकी एकता टूटती है तो इसकी क़ीमत दोनों समुदायों को चुकानी पड़ेगी.

इस पर समाजशास्त्री डीएम दिवाकर का मानना है, ‘‘ग़रीबों के लिए छोटे-मोटे सुधार लागू करने का जो ऐतिहासिक मौका था, उसमें भी अड़चनें पैदा हो गई हैं.’’

दिवाकर के अनुसार टूट की इस आशंका से बिहार में न्याय के साथ विकास की राजनीति को धक्का लगा है.

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