गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस

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हाल ही में दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह शरीफ़ पर 711वां उर्स (मेला) आयोजित किया गया. ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन, चिश्ती घराने के चौथे संत थे.

उन्होंने 92 साल की उम्र में अपने प्राण त्यागे और उसी साल उनके मकबरे का निर्माण शुरू हुआ. यह मकबरा सूफ़ी काल की एक दरगाह है, जहां आज भी दुनिया भर से लोग आते हैं.

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उत्तर प्रदेश के बंदायूं ज़िले में सन् 1238 में जन्मे ख्वाज़ा हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का पूरा नाम मोहम्मद बिन अहमद बिन दानियाल अल बुखारी था.

सूफ़ी संत बाबा फ़रीद के शिष्य रहे निज़ामुद्दीन औलिया बाद में उनके उत्तराधिकारी नियुक्त किए गए.

बाईस ख्वाज़ा दिल्ली में हुए और सबसे अधिक प्रसिद्धि हज़रत निज़ामुद्दीन साहब के बाद उनके शिष्य अमीर ख़ुसरो को हासिल हुई.

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अमीर ख़ुसरो को हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शिष्य व अभिन्न मित्र का स्थान मिला.

अमीर ख़ुसरो कई भाषाओं के जानकार, कवि (शायर), गायक और संगीतकार थे.

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भारतीय शास्त्रीय संगीत में ख़याल गायन उन्हीं की देन मानी जाती है. उन्होंने अपने उस्ताद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया साहब और सूफ़ी संतों की बातों को ख़ूबसूरत शब्दों में पिरो कर कई नज़्में लिखीं.

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सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन की मौत की ख़बर पाकर अमीर ख़ुसरो साहब भी इस सदमे से कुछ दिनों में चल बसे. ख़ुसरो का मकबरा भी उनके उस्ताद के मकबरे के सामने ही बना है.

गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस

चल ख़ुसरो घर आपने सांझ भई चहुं देस

इस आख़िरी शेर के साथ ख़ुसरो ने भी संसार छोड़ दिया.

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हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह पर हर साल होने वाले इस उर्स में दुनिया जहान के लोग शिरकत करते हैं.

ऐसा माना जाता है कि यहां हर दुआ क़ुबूल होती है.

संत होने के साथ साथ हज़रत निज़ामुद्दीन महान कवि भी थे. उनके लिखे होली और फाग आज भी गाए जाते हैं.

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कहा जाता है अमीर ख़ुसरो जिस दिन निज़ामुद्दीन औलिया साहब के मुरीद बने थे, उस दिन होली थी.

अपनी मां से ये बात ज़ाहिर करते हुए उन्होंने कहा था-

आज रंग है, ऐ मां रंग है री

मोहे मेहबूब के घर रंग है री

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उर्स के दौरान मशहूर कवाल्लों ने अमीर ख़ुसरो साहब की कई मशहूर नज़्मों को पेश किया.

देश भर से आए हुए और कई कवाल्लों ने भी कव्वाली के जरिये हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के लिए अपनी मोहब्बत ज़ाहिर की.

अपनी छवि बनाई के मैं तो पी के पास गई

जब छवि देखी पीहू की सो अपनी भूल गई

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ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के बाहर कई दुकानें सजी हैं जहां आपसे गरीबों को खाना खिलाने की गुहार करती आवाजें सुनाई पड़ जाती हैं.

ख़ुसरो दरिया प्रेम का, सो उलटी वा की धार

जो उबरो सो डूब गया, जो डूबा सो पार

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निज़ामुद्दीन की तंग गलियों से लौटते हुए मशहूर शायर ग़ालिब की खामोश खड़ी मज़ार चुपचाप इस उर्स का हिस्सा बनी नजर आती है और बरबस मज़ार के पास लिखा उनका मशहूर शेर ध्यान खींच लेता है.

न था कुछ तो खुदा था, न होता कुछ तो खुदा होता

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता

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