तुलसीराम: फुले और ग्राम्शी की परंपरा का बुद्धिजीवी

तस्वीर साभार- डॉ गंगा सहाय मीणा
Image caption तस्वीर साभार- डॉ गंगा सहाय मीणा

प्रोफ़ेसर तुलसीराम का लंबी बीमारी के बाद शुक्रवार सुबह निधन हो गया. वह जाने माने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर थे.

लेकिन वो सबसे अधिक मशहूर हुए अपनी आत्मकथात्मक 'मणिकर्णिका' और 'मुर्दहिया' से.

(पढ़ेंः कौन थे प्रोफ़ेसर तुलसी राम)

प्रोफ़ेसर तुलसीराम अंतराराष्ट्रीय संबंधों के अध्येता थे. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वे यही विषय पढ़ाते थे.

मैं उनके बारे में चार स्थापनाओं की चर्चा तक खुद को सीमित रखूंगा. इस उम्मीद के साथ कि बाकी विषयों पर संबंधित लोग अवश्य बात करेंगे.

भारत में वामपंथ की ऐतिहासिकता में दलित और बहुजन प्रश्न एक समस्या की तरह आया है.

विस्तार से पढ़ें

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK PROFILE TULSIRAM

वर्गीय चेतना की केंद्रीयता की ज़िद ने भारतीय वामपंथ को जाति विनाश के महाविमर्श यानी मैटानैरेटिव से अलगाव में डाल दिया है.

इस वजह से आप पाएंगे कि बाबा साहब आंबेडकर के वामपंथ की ओर झुकाव और मज़दूरों, किसानों और महिलाओं के प्रश्नों पर उनकी क्रांतिकारिता का कोई रेज़ोनेंस वामपंथी धारा में नहीं मिलता.

कालांतर में जब वामपंथ और दलित-बहुजनवाद आपस में टकराती दो धाराओं में तब्दील होते हैं, तब प्रोफ़ेसर तुलसीराम उन चंद लोगों में रहे, जिनकी राय में वामपंथी प्रगतिशीलता और जाति विनाश के महाविमर्श के बीच द्वंद्व नहीं है.

वे इन दो विचारों की सिनर्जी और एकता में यकीन करते रहे और बाद के दिनों में दलित लेखक संघ के अध्यक्ष चुने जाने और अपनी आत्मकथा लिखते समय भी वे इससे अलग नहीं होते.

'भारत के ग्राम्शी'

Image caption तस्वीर साभार- डॉ गंगा सहाय मीणा

राष्ट्रनिर्माण की उनकी अवधारणा में वर्ग का प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना जाति का.

वे हमेशा इस बात के पक्षधर रहे कि इन दोनों सवालों से साथ में जूझा जाए. इस मायने में वे भारत के जड़बुद्धि वामपंथियों से अलग लकीर खींचते हैं और इटली के वामपंथी कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी अंतोनियो ग्राम्शी से खुद को ज़्यादा क़रीब पाते हैं.

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK PROFILE TULSI RAM

ग्राम्शी ने जिस तरह अपनी जेल डायरी संख्या 25 में सबाल्टर्न की व्याख्या करते हुए इतिहास के हाशिए के लोगों की समस्याएं और उनकी संभावनाओं को चिह्नित किया है, वह प्रोफ़ेसर तुलसीराम की संकल्पनाओं के काफ़ी क़रीब है.

ग्राम्शी जिस तरह इटली के वंचितों की बात करते हुए ‘सदर्न क्वेश्चन’ में वर्गीय प्रश्नों से परे जाते है, उसी तरह प्रोफ़ेसर तुलसीराम के वंचितों की परिभाषा में ग़रीब भी हैं और दलित-बहुजन भी.

भारतीय वामपंथ

इमेज कॉपीरइट Reuters

इस मायने में प्रोफ़ेसर तुलसीराम अपनी बौद्धिकता की ट्रेनिंग में वामपंथ की भारतीय मुख्यधारा से अलग खड़े नज़र आते हैं.

बल्कि ऐसा करते हुए वे भारतीय वामपंथ को आगे का रास्ता तलाशने की विचारभूमि भी प्रदान करते हैं.

2015 में यह प्रश्न और भी अहम है कि क्या भारतीय वामपंथ इस विचारभूमि के आधार पर नई शुरुआत के लिए तैयार है?

और यह प्रश्न बहुजनवादियों के लिए भी है कि क्या वे वामपंथ की प्रगतिशीलता से ऊर्जा लेकर आगे बढ़ने को तैयार हैं?

तुलसीराम का लेखन दोनों धाराओं को नए तरीक़े से सोचने को मजबूर कर सकता है.

मिथकों के शवपरीक्षक

प्रोफ़ेसर तुलसीराम ने अपने असंख्य व्याख्यानों और लेखन में मिथकों को भारतीय समाज की बड़ी समस्या के तौर पर चिह्नित किया है.

इस मायने में वे 19वीं सदी के महान सामाजिक क्रांतिकारी और चिंतक ज्योतिबा फुले के बेहद क़रीब हैं.

प्रोफ़ेसर तुलसीराम ऐसा करते हुए फुले की किताब 'गुलामगीरी' को अक्सर संदर्भ ग्रंथ के तौर पर पेश करते हैं.

ब्राह्मणवादी मिथकों की चीरफाड़ में वे पूरी वैज्ञानिकता बरतते हैं और बेहद निष्ठुर नजर आते हैं.

उनकी शिकायत उन तमाम वर्चस्ववादी प्रतीकों से है, जिनके सांस्कृतिक प्रभाव की वजह से समाज में वैज्ञानिक और प्रगतिशील चेतना बाधित है.

अांबेडकर

इमेज कॉपीरइट EPA

वे अपने भाषणों में और लेखन के जरिए बताते हैं कि बहुजन समाज भी ब्राह्णवादी मिथकों की चपेट में है और यह उनके विकास में अड़चन है.

इस संदर्भ में प्रोफ़ेसर तुलसीराम का यूट्यूब में मौजूद यह भाषण देखा-सुना जाना चाहिए जो उन्होंने जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस के मौक़े पर दिया था.

इसमें प्रोफ़ेसर तुलसीराम ब्राह्मणवादी वर्चस्व के मुक़ाबले भारत की समानांतर बौद्ध परंपरा का ज़िक्र करते हैं और उसकी वैज्ञानिकता और मानववादी दर्शन को भारत का आगे का रास्ता मानते हैं.

प्रोफ़ेसर तुलसीराम इस प्रश्न को लेकर बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के क़रीब हैं.

समकालीन राजनीतिक-सामाजिक प्रश्नों को लेकर प्रोफ़ेसर तुलसीराम एक आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतक के बतौर अपनी भूमिका का निर्वाह करते दिखते हैं.

विचार और अभिव्यक्ति पर होने वाले हर हमले के ख़िलाफ़ उन्हें मुखर देखा गया.

हिंदू कट्टरता

इमेज कॉपीरइट Jaiprakash Baghel

हिंदू कट्टरता के साथ ही मुसलमानों के एक धड़े द्वारा हिंदुवाद की नक़ल में अपनाई गई कट्टरता का भी वे विरोध करते हैं.

कंवल भारती को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा प्रताड़ित करने का विरोध करते हुए प्रोफ़ेसर तुलसीराम आस्था के प्रश्न को लेकर मुसलमानों को आक्रामक चित्रित किए जाने की समाजवादी पार्टी की कोशिशों की आलोचना करते हैं.

फासिज़्म के ख़तरों को लेकर प्रोफ़ेसर तुलसीराम लगातार सजग रहे अपने आखिरी दिनों में भारतीय राजनीति की दिशा को लेकर उन्होंने कई बार चिंता जताई.

भारत के फ़ासिस्ट दिशा में चल पड़ने को वे विश्व इतिहास की बड़ी त्रासदी के तौर पर चिह्नित करते हैं और कहते हैं कि यह दुनिया के लगभग 50 छोटे देशों के फ़ासिस्ट हो जाने के बराबर है.

इसके साथ ही वे विरोधी विचारों के बीच संवाद के भी प्रबल समर्थक रहे.

प्रोफ़ेसर तुलसीराम अपने व्यक्तित्व में खरे समन्वयवादी भी नज़र आते हैं और वैचारिक प्रखरता के बावजूद उनकी सर्वस्वीकार्यता एक ऐसी चीज़ है, जिससे सीखा जाना चाहिए.

गांधी से शिकायत

इमेज कॉपीरइट Getty

प्रोफ़ेसर तुलसीराम ब्राह्मणवाद के निर्मम आलोचक हैं लेकिन समकालीन दलित-बहुजन विचारधारा की कई स्थापनाओं से वे निरंतन अपनी असहमति भी जताते रहे.

उन्हें गांधी से शिकायत है कि वे वर्ण व्यवस्था को दैवीय मानते थे, लेकिन वे यह नहीं मानते थे कि गांधी दलितों के दुश्मन थे. गांधी को 'विलेन' की तरह दर्शाए जाने से वे सहमत नहीं थे.

दलितों के उत्थान में वे गांधी की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते रहे और इस सवाल पर कई दलित लेखकों से वे टकराते भी रहे.

प्रेमचंद को दलित विरोधी बताए जाने से भी प्रोफ़ेसर तुलसीराम सहमत नहीं थे.

इन सवालों पर वे अपनी राय खुलकर जताते रहे और विरोध का ख़तरा उठाकर भी अपनी बात कहते रहे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार