'मैंने क्यों भारत-पाक मैच नहीं देखा?'

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मैंने कल एडिलेड में हुआ भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच नहीं देखा. इस दीवानगी को मैंने बिलकुल मिस नहीं किया.

मैं एक समय करोड़ों देशवासियों की तरह क्रिकेट का दीवाना था. स्कूल और कॉलेज में अपनी क्रिकेट टीम की कप्तानी भी की. लेकिन काफ़ी बरसों से अब मैं फुटबॉल का जुनूनी हूं. क्रिकेट बोरिंग खेल लगता है.

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कल मैंने क्रिकेट के बजाए इंग्लैंड में हो रहे 'एफ़ए कप' में अपनी टीम आर्सेनल और मिड्डिल्सबरा के बीच हुए मैच का लुत्फ़ लिया.

आर्सेनल के शानदार प्रदर्शन ने मुझे वह मज़ा दिया जो पाकिस्तान पर भारत की भारी जीत के बाद मेरे पड़ोस में पटाखों और चीखों ने नहीं दिया.

'हिंदू पर शक़ नहीं'

मेरे क्रिकेट से मुंह मोड़ने के पीछे स्वयं क्रिकेट के साथ-साथ सियासी कारण भी हैं. बचपन से देश प्रेमी होने के लिए कई परीक्षाएं देनी पड़ी हैं जिनमें 'क्रिकेट टेस्ट' भी शामिल है.

ख़ास तौर से अगर क्रिकेट मैच भारत और पाकिस्तान के बीच हो, तो आपको ये साबित करना पड़ता है कि आप भारत को अपना समर्थन दे रहे हैं. यह इम्तिहान केवल मुसलमानों को पास करना होता है.

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बचपन में मेरे पड़ोस की एक किराने की दुकान के मालिक अनिल जैन जावेद मियांदाद और इमरान ख़ान के कारण पाकिस्तानी टीम के एक बड़े हिमायती थे. लेकिन उनके देश प्रेम पर तो किसी ने कभी शक़ नहीं किया.

इस क्रिकेट इम्तिहान की तुलना इंग्लैंड में 'टेबिट टेस्ट' से की जा सकती है. इंग्लैंड के सियासी नेता नार्मन टेबिट भारत और पाकिस्तान से आकर इंग्लैंड में बस जाने वाले एशियाई समुदायों की देशभक्ति पर शक किया करते थे.

उन्होंने 1990 में इन समुदायों की देशभक्ति को आज़माने के लिए एक सुझाव दिया. उन्होंने टेस्ट रखा कि जब इंग्लैंड-भारत या इंग्लैंड-पाकिस्तान के बीच मैच हो रहा हो तो देंखें कि भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोग किस देश का समर्थन करते हैं...

बहुत आगे है भारत

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भारत में 'क्रिकेट टेस्ट' के पीछे कारण यह बताया जाता है (जो एक आरोप हैं), कि दोनों देशों के बीच मैचों में पाकिस्तान की जीत पर भारतीय मुसलमान जश्न मनाया करते थे.

संघ परिवार के लोग तो अब भी ऐसा ही समझते हैं. अगर कल के मैच में पाकिस्तान की जीत होती तो शायद इस तरह के इलज़ाम एक बार फिर लगाए जाते.

इसमें शायद थोड़ी बहुत सच्चाई हो भी...मैने ख़ुद मुस्लिम इलाक़ों में मुसलमानों को पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाते हुए अपनी आंखों से कभी-कभी देखा है.

मैं ऐसे कुछ मुस्लिम परिवारों को जानता हूँ जो शायद आज भी अंदर ही अंदर पाकिस्तानी टीम का समर्थन करते हैं लेकिन खुलकर सामने नहीं आते.

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लेकिन मैं दावे से कह सकता हूँ कि ऐसे मुसलमान पूरे भारत में बस मुट्ठी भर हैं. इनमें से अधिकतर या तो वह हैं जो अनपढ़ हैं, या फिर साम्प्रदायिक किस्म के हैं.

उन्हें क्या मालूम कि ख़ुद पाकिस्तानी ऐसे भारतीय मुसलमानों पर हंसते हैं, और ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने ऐसा पाकिस्तान में देखा है.

ख़ैर, अगर केवल क्रिकेट के हिसाब से भी देखें तो मेरे विचार में भारत पाकिस्तान से कहीं आगे निकल चुका है.

दोनों देशों के बीच रोमांचक मैच हुए हैं लेकिन विश्व कप के बड़े प्लेटफार्म पर भारत ने पाकिस्तान को हमेशा पछाड़ा है.

पाकिस्तान से कैसी तुलना

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कल के मैच के परिणाम पर मुझे बिलकुल हैरानी नहीं हुई. आईपीएल सीरीज़ हो या आईसीसी हो या फिर विश्वभर में पेशेवर खिलाड़ी, सब पाकिस्तान के बजाए भारत को अपना चुके हैं.

भारतीय क्रिकेट में पैसा है, प्रतिष्ठा है, जोश है. भारत ने क्रिकेट जगत को तेंदुलकर दिया जो शायद ही आने वाली पाकिस्तानी क्रिकेट की पीढ़ियां के लिए संभव हो..

पाकिस्तान के पास तो क्रिकेट का अपना घर भी नहीं. उसे 'होम' सीरीज़ खाड़ी देशों में खेलनी पड़ती है.

राजनीति हो या क्रिकेट, भारत पाकिस्तान के मुकाबले एक बड़ी ताकत है.

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जिस तरह से राजनीति में भारत को पाकिस्तान के बजाए चीन से मुक़ाबला करना चाहिए, उसी तरह से क्रिकेट में इसे पाकिस्तान से नहीं ऑस्ट्रेलिया या दक्षिण अफ़्रीका से अपनी तुलना करनी चाहिए.

इस बीच, देखना ये भी होगी कि भारत-पाकिस्तान मैच के ये समर्थक, अब विश्वकप में कितनी रुचि बनाए रखते हैं.

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