'आप' की वजह से बदले प्रधानमंत्री मोदी

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में ईसाइयों के एक कार्यक्रम में कहा कि उनकी सरकार में किसी भी धर्म पर किसी भी तरह का हमला बर्दाश्त नहीं होगा.

उनका कहना था कि सभी धर्मों का सम्मान और सहनशीलता भारत की परंपरा है. भारत का संविधान भी इसी परंपरा से निकला है.

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धार्मिक हिंसा के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान को दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) को मिली जीत से जोड़कर देखा जा सकता है.

कई विश्लेषक मानते हैं कि दिल्ली डेढ़ करोड़ मतदाताओं की दिल्ली ही है, इससे क्या फ़र्क पड़ता है.

लेकिन दिल्ली अब 1967 वाली दिल्ली नहीं रही जो पुरानी दिल्ली और कुछ सरकारी बाबुओं या पंजाब-सिंध से आए शरणार्थियों की दिल्ली हुआ करती थी.

आज 2015 में दिल्ली लघु भारत का रूप ले चुकी है. यहां पुरबिए रहते हैं, दक्षिण भारतीय रहते हैं, पहाड़ी रहते हैं.

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दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री ने सही कहा था कि जो देश का मूड है, वही दिल्ली का भी मूड है. अब उन्होंने इसे उलटकर पढ़ लिया है. उन्हें अब यह डर सताने लगा है कि जो दिल्ली का मूड है, वह देश का मूड हो सकता है.

धार्मिक स्वतंत्रता

इसलिए अब अचानक उन्हें बहुलता और सहिष्णुता के मूल्य नज़र आने लगे हैं. उन्हें कहना पड़ रहा है कि उनकी सरकार धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगी. यह दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों की वजह से हुआ है.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के लिए धर्मनिरपेक्षता चुनावी गुणा-भाग का विषय नहीं था. उनके लिए यह विश्वास की बात थी.

उस ज़माने के नेता जिन्हें हम आज वामपंथी और दक्षिणपंथी नेताओं के खेमे में बांटते हैं, वह भी धर्मनिरपेक्षता को लेकर एकमत थे. वो मानते थे कि भारत में किसी भी तरह की धार्मिक असहिष्णुता और आक्रामकता से काम नहीं चलेगा.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए धर्मनिरपेक्षता विश्वास की बात नहीं है. उनके लिए यह चुनाव से जुड़ा मसला है.

संघ प्रमुख का भी एक बयान आया है, जो प्रधानमंत्री के बयान से भी ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है. उन्होंने कहा है, ''हमारी माताएं-बहनें बच्चे पैदा करने की फैक्टरियां नहीं हैं.''

यह शायद भाजपा सांसद साक्षी महाराज के बयान के संदर्भ में दिया गया बयान है.

ऐतिहासिक जीत

अब प्रधानमंत्री और संघ प्रमुख को लेकर एक सवाल यह उठता है कि साक्षी महाराज का बयान एक-दो दिन पहले नहीं आया. उनका बयान महीने भर पहले आया था. मुझे लगता है कि ये दोनों बयान दिल्ली में आप को मिली ऐतिहासिक जीत का परिणाम हैं.

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सिक्किम विधानसभा के चुनाव में पवन चामलिंग को मिली जीत के बाद देश में ऐसा नहीं हुआ था कि किसी पार्टी को विधानसभा की 70 में से 67 सीटों पर जीत मिली हो.

दिल्ली में विपक्षी भाजपा को तीन सीटें मिली हैं.

दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आप को मिली जीत भाजपा के लिए ख़तरे की घंटी है. ये आंखें खोल देने वाले चुनाव नतीजे हैं.

सुधार की ज़रूरत

नरेंद्र मोदी और संघ प्रमुख के बयान को इस चुनाव परिणाम का नतीजा माना जा सकता है. इसे देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्री, संघ और उससे जुड़े संगठनों को अब सुधरना पड़ेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संघ परिवार एक दूसरे के बिना नहीं चल सकते हैं. दोनों को एक दूसरे की ज़रूरत है. इसके लिए वह कोई रास्ता ज़रूर निकालेंगे.

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Image caption दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटों पर आप ने जीत दर्ज की है.

पंद्रह साल पहले जब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी तो वैलेंटाइंस डे पर दिल्ली विश्वविद्यालय में तथाकथित राष्ट्रवादियों ने लड़के-लड़कियों को पकड़-पकड़कर पीटा था.

अब जब दिल्ली में आप की सरकार है तो वैलेंटाइन डे पर लड़के-लड़कियां बसों में भरकर हिंदू महासभा के दफ़्तर पहुंचे और कहा कि हमारी शादी करा दो. हालत यह हो गई कि हिंदू महासभा के लोग सफ़ेद गुलाब बांटते नज़र आए.

आज देश की आबादी का क़रीब 55 फ़ीसदी युवा है जो विकास और भ्रष्टाचार के नाम पर कांग्रेस, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह को नकार सकता है. वह घर वापसी, लव जिहाद और वैलेंटाइन डे के विरोध के लिए नरेंद्र मोदी को वोट नहीं देने वाला है.

अब संघ परिवार और नरेंद्र मोदी को इन मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी. नहीं तो वह समय भी आ जाएगा कि 2014 में मोदी-मोदी की रट लगाने वाले युवा पलट जाएं.

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