मिलिए रायबरेली के 'धनपशु' से

बंदर को गोद लेने वाली रायबरेली की दंपत्ति इमेज कॉपीरइट ATUL CHANDRA

चुनमुन रायबरेली शहर में दो बीघा चार बिस्वा ज़मीन, एक पक्का मकान और कार का मालिक है. वो अपने दिन की शुरुआत अनार खाकर करता है. अनार खाने के दस मिनट बाद एक गिलास दूध, और फिर दस बजे पूरा खाना दाल, रोटी, सब्ज़ी, चटनी.

वो सूई तो लगवा लेता है लेकिन एलोपैथिक दवा बिलकुल नहीं खाता. आप सोच रहे होंगे, इसमें ख़ास क्या है, लेकिन आप शायद इस बात पर ज़रूर चौंकेंगे कि ये ठाट-बाट किसी इंसान नहीं बल्कि एक चुनमुन नामक बंदर के हैं.

आखिर कौन है ये बंदर? और कैसे और क्यों बन गया वो रायबरेली का रईस बंदर?

पढ़े चुनमुन के अमीर बनने क कहानी

चुनमुन को रायबरेली के निस्संतान दंपति ब्रजेश श्रीवास्तव और उनकी पत्नी शाबिस्ता ने अपने बच्चे की तरह पाला और अपना सब कुछ उसके नाम कर दिया.

एकाकीपन से ऊबे और इंसानों के प्रेम को तरसते ब्रजेश और शबिस्ता के जीवन में इससे पहले साल 2004 में एक बंदरिया आई.

शाबिस्ता मुस्लिम हैं. वे बताती हैं कि 1998 में उन्होंने ब्रजेश श्रीवास्तव से प्रेम विवाह किया जिससे नाराज होकर दोनों के परिवारों ने किनारा कर लिया.

एक दिन शाबिस्ता की नज़र अपने पड़ोसी बालकृष्ण शर्मा पर पड़ी. वे अपनी पालतू बंदरिया को पीट रहे थे. जब शाबिस्ता ने उन्हें रोका तो पड़ोसी ने कहा कि अगर बुरा लग रहा हो तो तुम्हीं इसे खरीद लो.

शाबिस्ता ने भी तुरंत 300 रुपए देकर उस बंदरिया को खरीद लिया और नाम रखा टिनटिन.

टिनटिन बंदरिया

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टिनटिन का व्यवहार शाबिस्ता और ब्रजेश को बहुत प्यारा लगा. साथ ही बिज़नेस और अन्य कामों में फायदा होना शुरू हो गया. टिनटिन के आने से उनका अकेलापन भी दूर हो गया.

लेकिन यह खुशियाँ थोड़े ही दिन रहीं.

शाबिस्ता बताती हैं, "हमें बंदरों के व्यवहार के बारे में ज़्यादा मालूम नहीं था. एक दिन हम दोनों ही घर पर नहीं थे और टिनटिन जिस रस्सी से बंधी थी, उसके गुलाटी खाने से वो उसके गले पर कसती गई और वो मर गई. वो हमारे पास मुश्किल से छह महीने रही."

शाबिस्ता को उसके मरने से बेहद दुःख हुआ. वो कहती हैं, "कोई इंसान हमारी वेदना को समझ नहीं सकता.".

चुनमुन का साथ

टिनटिन की मौत के बाद 2005 में शाबिस्ता ने 500 रुपए देकर चुनमुन को एक मदारी से खरीद लिया. महीने भर के चुनमुन की माँ करंट लगने से मर गई थी.

चुनमुन को शाबिस्ता ने माँ की तरह प्यार दिया. आज भी वो उसे अपने हाथों चम्मच से दूध पिलाती हैं.

शाबिस्ता बताती हैं, "चुनमुन हर वक़्त हमारे पास ही रहता था. जब कभी हमें कविता पाठ करना होता था तो ब्रजेश इसको लेकर बाहर खड़े हो जाते थे लेकिन ये हमको देखता रहता था."

बीच में एक दौर ऐसा आया कि चुनमुन लोगों को काटने लगा.

उन्होंने कहा, "हमने डॉक्टर से बात की तो उन्होंने बताया कि जंगली जानवर को पालना अपराध है. ये सुनकर हम दुखी हो गए. हमने बताया कि चुनमुन हमारे बेटे की तरह है. हमारी बात से उनका दिल पसीजा और उन्होंने कुछ अधिकारियों से हमारे लिए मानवता के आधार पर सिफारिश की. उसके बाद चुनमुन के काटने वाले दांतों को बराबर कर दिया गया."

एयरकंडीशन और हीटर

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शाबिस्ता और ब्रजेश ने अपनी खुशियाँ चुनमुन में तलाश ली हैं.

अब चुनमुन 10 साल का हो गया है. उसके घूमने के लिए बड़ा सा आँगन है और उससे लगा हुआ एयर कंडीशन और हीटर वाला एक कमरा है.

शाबिस्ता और उनके पति ने अपने घर का नाम बदलकर चुनमुन हाउस कर दिया है.

वे कहते हैं, "वास्तव में हम दोनों अपने आपको चुनमुन हाउस के केयरटेकर से अधिक कुछ नहीं समझते. इसके आने से हमारे हालात काफी अच्छे हो गए हैं."

शादी और जन्मदिन

शाबिस्ता कहती हैं कि 2010 में उन्होंने चुनमुन का विवाह बड़े धूमधाम से छजलापुर के अशोक यादव की बंदरिया बिट्टी यादव से कर दी.

चुनमुन का जन्मदिन और शादी की सालगिरह बहुत जोर-शोर से मनाई जाती है. सालगिरह पर भोज भी आयोजित होता है.

चुनमुन और बिट्टी साथ रहते हैं. इस बार उनकी पाँच जनवरी की शादी की सालगिरह कड़ाके की ठंड के कारण जून महीने तक के लिए टाल दी गई है.

जहां तक चुनमुन के जन्मदिन का सवाल है, तो सही तारीख पता नहीं होने के कारण एक जनवरी को उसका जन्मदिन मान लिया गया है.

इन दोनों की पारिवारिक संपत्ति केवल और केवल चुनमुन के नाम है.

सहकारी बैंक की निदेशक और पेशे से वकील शाबिस्ता अब चुनमुन के नाम पर एक ट्रस्ट बनाने की भी तैयारी कर रही हैं. इसमें वे और उनके पति अपनी सारी पूंजी लगा रहे हैं.

चुनमुन ट्रस्ट का उद्देश्य बंदरों के जीवन को बेहतर बनाना होगा.

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