अमर्त्य सेन ने छोड़ा नालंदा विवि, बहस शुरू

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अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने स्पष्ट कर दिया है कि वो इस वर्ष जुलाई के बाद नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति का पद छोड़ देंगे.

उनका आरोप है कि सरकार नहीं चाहती है कि वह अब इस पद पर अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करें.

उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड को इस आशय की चिट्ठी लिखी है जिसने शिक्षाविदों के बीच बहस छेड़ दी है.

'राजनीति तो होती ही है'

उन्होंने विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि उनका नाम महीने भर पहले ही भेज दिया गया था लेकिन अब तक सरकार ने इस मामले में स्वीकृति नहीं भेजी है.

सेन ने कहा है कि बोर्ड ने 13 जनवरी को उन्हें दूसरे कार्यकाल के लिए सर्वसम्मति से चुना था मगर अब वह इस पद पर काम नहीं करना चाहते.

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सेन का कहना है कि भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस प्रस्ताव को मंज़ूरी नहीं दे पा रहे हैं क्योंकि अभी तक केन्द्र सरकार ने इस पर चुप्पी साध रखी है.

सरकार के इस रुख़ को सेन अकादमिक मामलों में राजनीतिक दख़ल के रूप में देखते हैं.

मगर अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला कहते हैं, "सरकार तो अपनी विचारधारा के हिसाब से ही काम करेगी. अमर्त्य सेन विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड के अनुमोदन को आंतरिक लोकतंत्र मानते हैं, तो सरकार का रुख़ भी लोकतंत्र का हिस्सा ही है."

"अगर अमर्त्य सेन कहते कि सरकार के रवैये से विश्वविद्यालय की स्वायत्ता ख़त्म हो रही है, तो मैं उनके साथ खड़ा नज़र आता. वह अकादमिक मामलों के राजनीतिकरण की बात कह रहे हैं, तो नोबेल पुरस्कार में भी तो राजनीति होती रही है. ऐसा नहीं होता तो गांधीजी को नोबेल पुरस्कार क्यों नहीं मिला?"

'गठन पर सवाल'

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेश पंत को लगता है कि विचारधाराओं के हिसाब से ही लोगों को सरकारें रास आती या नहीं आती हैं.

उनका कहना है, "जब तक सरकार माफ़िक़ है तो सब कुछ रास आता है. यूपीए सरकार में कई ऐसे अर्थशास्त्री थे जिन्हे दक्षिणपंथी विचारक मानकर तरजीह नहीं दी जाती थी. जगदीश भगवती और पद्मा देसाई उदाहरण हैं, जो अर्थशास्त्र के मामले में अमर्त्य सेन से उन्नीस भी नहीं थे."

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वहीं नेहरू मेमोरियल के प्रोफ़ेसर प्रकाश उपाध्याय अमर्त्य सेन के पक्ष में नज़र आए. उनका आरोप है कि मौजूदा सरकार अमर्त्य सेन के विचारों से तो बिलकुल सहमत नहीं है.

इस विवाद के बीच चल रही बहस के बीच शिक्षाविद कृष्णा कुमार ने तो नालंदा विश्वविद्यालय के गठन पर सवाल उठाए.

वह कहत हैं, "मुझे आज तक नालंदा विश्वविद्यालय का ताना-बाना समझ में नहीं आया. मुझे समझ में नहीं आया कि कैसे वहां शिक्षकों को विदेशी मुद्रा में तनख़्वाह मिलती है. यह तो ऐसा ही हुआ जैसे कोई विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया गया हो."

नालंदा विश्वविद्यालय के गवर्निंग बोर्ड का प्रस्ताव राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अनुमोदन के लिए राष्ट्रपति भवन में विचाराधीन है.

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