बिहारः असल दंगल अभी दूर है

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Image caption अब समर्थकों की खींचतान नहीं, चुनावी दंगल की शुरुआत है

बिहार विधानसभा में विश्वास प्रस्ताव से पहले सब की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की नैया भारतीय जनता पार्टी पार लगाती है या वो अपनी नैया खुद डुबोते हैं

मांझी ने इस्तीफ़ा देकर अपनी नैया तो डुबो ही दी है साथ ही भाजपा की नाव को भंवर में फंसा दिया है

बिहार की राजनीति में पिछले कुछ सप्ताह से चल रही उठा पटक को आप कह सकते हैं कि ये साल के आखिर में होने वाले विधान सभा चुनाव का पहला राउंड था जो कम से कम सतही तौर पर जनता दल यूनाइटेड के प्रमुख नीतीश कुमार के पक्ष में गया.

सत्ता के लिए सभी आतुर

राज्य के इस सियासी अखाड़े में सभी पक्ष सत्ता पाने के लिए आतुर नज़र आते हैं. पिछले साल आम चुनाव में बेहद ख़राब प्रदर्शन की ज़िम्मेवारी लेने के बाद इस्तीफ़ा देकर मांझी को मुख्यमंत्री पद पर बैठाने वाले नीतीश कुमार सत्ता वापस लेने के लिए बेचैन हैं. मांझी सत्ता छोड़ना नहीं चाह रहे थे. कुछ लोगों के अनुसार भाजपा आगामी चुनाव को ध्यान में रख कर घी में आग लगाने का काम कर रही थी

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Image caption सत्ता की लालसा में दोस्त क्या दुश्मन क्या

इस राजनीतिक दंगल में सभी पक्षों का एक ही मक़सद है -- आगामी चुनाव में जीत हासिल करने के लिए इस दंगल में बाज़ी मारना.

नीतीश कुमार कहते हैं कि दिल्ली विधान सभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा बदहाल है. और अब भाजपा सारी ताकत बिहार में झोंक रही है लेकिन नीतीश की सत्ता में वापसी के बावजूद आगामी विधान सभा चुनाव में उनकी जीत यक़ीनी नहीं है.

चुनावी गणित

ज़रा सोचिए कि विश्वास मत से पहले नीतीश कुमार ने जिन 130 विधायकों का समर्थन हासिल करने का दावा किया क्या वो आगामी विधान सभा चुनाव में उन्हें टिकट न देने की हिम्मत कर सकेंगे? और इस सियासी नाटक के बाद इनमे से कितने दोबारा चुने जाएंगे?

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Image caption भाजपा ने सब हथकंडे अपनाए हैं मगर पटना दूर ही लगता है

पिछले साल के आम चुनाव में मोदी लहर में बह जाने वाले नीतीश ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी लालू यादव का हाथ थाम लिया है.

बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश की पार्टी का जनाधार एक ही रहा है, यानी दलित, मुसलमान और पिछड़ी जातियां. भाजपा को ऊंची जातियों की पार्टी समझा जाता है.

ज़ाहिर है नीतीश कुमार और लालू यादव के उम्मीदवार उन्हीं सीटों पर मज़बूत हैं जहाँ अब तक वो एक दूसरे के प्रतिद्वंदी रहे हैं और जहाँ इनका जनाधार है.

पूरी आशा है कि नीतीश और लालू विधान सभा चुनाव साथ लड़ेंगे. नीतीश कुमार अपने दोस्त लालू यादव को विधान सभा की कुल 243 सीटों में से कितनी सीटें देंगे? इस मुद्दे को लेकर इन दोनों पार्टियों में उठा पटक हो सकती है.

अगर ऐसा हुआ तो भाजपा इस उठा पटक का भरपूर फ़ायदा उठाना चाहेगी. दूसरी तरफ पार्टी को उम्मीद होगी कि माझी की बग़ावत का समर्थन करने से उसे महा दलित वोट मिलेंगे क्योंकि मांझी महादलित समुदाय के हैं.

आज जो हम देख रहे हैं वो आने वाले वाले विधान सभा चुनाव के मुकाबले की केवल एक झांकी है. असल दंगल तो अभी दूर है.

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