पश्चिम को ख़ुश रखने के लिए लिखते हैं रुश्दी

भालचंद्र नेमाड़े, सलमान रुश्दी

इस वर्ष के ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता भालचन्द्र नेमाड़े ने प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखक सलमान रुश्दी के साहित्य को 'औसत' (मीडियोकर) क़रार दिया है.

एक साहित्य कार्यक्रम में भाग लेने भुवनेश्वर आए नेमाड़े ने बीबीसी के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा कि फ़क़ीर मोहन सेनापति और गोपीचंद नारंग रुश्दि से '50 गुना बेहतर' लेखक हैं.

'बुकर ऑफ़ बुकर्स' पुरस्कार जीतने वाले रुश्दी के उपन्यास 'मिडनाइट चिल्ड्रन' के बारे में नेमाड़े का कहना था, "प्रवासी भारतीय पर्यटकों के पढ़ने के लिए यह ठीक है. लेकिन इसे गंभीर साहित्य के रूप में पढ़ने के लिए मैं किसी से सिफ़ारिश नहीं करूँगा."

'पूरा रुश्दी पढ़ा है'

नेमाड़े का मानना है कि दोस्तोवस्की और टॉलस्टॉय जैसे दुनिया के सभी बड़े लेखक अपनी भाषा में लिखते थे.

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"रुश्दी यह दावा तो करते हैं कि वह कश्मीरी हैं, लेकिन लिखते अंग्रेज़ी में हैं. उधर के लोगों को ख़ुश करने के लिए अपने लोगों का मज़ाक़ उड़ाते हैं."

भारतीय मूल के अंग्रेज़ी लेखकों के बारे में उनके विचार पर रुश्दी की तीखी प्रतिक्रिया के बारे में पूछे जाने पर नेमाड़े ने रुश्दी पर अपना वार और तेज़ किया.

उन्होंने कहा, "उसने वही किया जो उसकी संस्कृति है. उसको यही शोभा देता है. हमें शोभा नहीं देता. हमारी संस्कृति अलग है. हम ऐसा नहीं कर सकते. एक लेखक दूसरे लेखक के बारे में क्या कहेगा, इसकी एक संस्कृति है."

रुश्दी के इस आरोप के बारे में कि उन्होंने उनका लेख शायद पढ़ा ही नहीं है, नेमाड़े ने पहले तो ठहाके लगाए और फिर कहा, "उसे पता नहीं है कि मैंने उसकी किताबों को पढ़ाया है. 'मिडनाइट चिल्ड्रन' से लेकर 'द इनविज़िबल आइलैंड' तक उसकी हर किताबे मैंने पढ़ी है."

'पढ़ाई सिर्फ़ मातृभाषा में'

मराठी साहित्य के इस मशहूर साहित्यकार ने भारतीय मूल के दूसरे बड़े लेखक वी एस नायपॉल को भी नहीं बख़्शा.

"एक आदमी आता है, कहता है कि भारत एक 'एरिया ऑफ़ डार्कनेस' (अंधेरा इलाक़ा) है. फिर 15 साल बाद आता है और कहता है कि यह 'वूंडेड सिविलाइज़ेशन' (घायल सभ्यता) है. लिखता है कि मुसलामानों ने इसे घायल किया. अंग्रेज़ों का नाम नहीं लेता क्योंकि वहां उसे तकलीफ़ होगी. और 15 साल बाद फिर वापस आता है तो उसे 'मिलियन म्युटिनीज़' (करोड़ों बग़ावत) दिखाई देती हैं. पहले जब आया था उस समय बग़ावत नहीं चल रही थी क्या?"

स्कूली बच्चों को अंग्रेज़ी में शिक्षा दिए जाने का सख़्त विरोध करते हुए ज्ञानपीठ विजेता लेखक ने कहा, "बच्चों को प्राथमिक शिक्षा केवल उनकी मातृभाषा में ही मिलनी चाहिए. यह केवल मैं नहीं कह रहा. विश्व भर के भाषा शास्त्रियों का भी यही मानना है. संयुक्त राष्ट्र के बर्न और पेरिस कन्वेंशन में भी यही बात दुहराई गई है."

"हम क्यों इतने छोटे-छोटे बच्चों को मुसीबत में डालते हैं? यह बच्चे बाद में कुछ नहीं कर सकते, सिवाय इधर की फ़ाइल को उधर करने और लिखी हुई चीज़ को कॉपी करने के."

हंगरी का उदाहरण देते हुए नेमाड़े कहते हैं, "यह देश ओडिशा से बड़ा नहीं है. लेकिन लगभग हर वर्ष उसे किसी न किसी विषय पर नोबेल पुरस्कार मिलता है- कभी साहित्य के लिए तो कभी विज्ञान में. वहां के लोग अंग्रेज़ी में नहीं, हंगेरियन में पढ़ते हैं. हम क्यों ऐसा नहीं कर सकते?"

'लिंक लैंग्वेज क्यों?'

लेकिन भारत जैसे देश में जहां इतनी सारी भाषाएं हैं, वहां क्या एक 'लिंक लैंग्वेज' के रूप में अंग्रेज़ी की आवश्यकता नहीं है?

"अंग्रेज़ी कभी भारतीय भाषाओँ के लिए 'लिंक लैंग्वेज' नहीं बन सकती. केवल एक भारतीय भाषा ही 'लिंक लैंग्वेज' बन सकती है. सच पूछा जाये तो हमें 'लिंक लैंग्वेज' की कोई ज़रूरत ही नहीं है. हमारी सोच एक है, संस्कृति एक है. तो फिर हमें 'लिंक लैंग्वेज' क्यों चाहिए? अंग्रेज़ों के यहां आने से पहले क्या यहां सांस्कृतिक और भाषागत आदान प्रदान नहीं होते थे?"

नेमाड़े ने कहा कि हम ऐसा मानते हैं क्योंकि सदियों की ग़ुलामी के कारण 'अंग्रेज़ी का भूत' हम पर सवार हो गया है, जो उतरने का नाम नहीं ले रहा.

अंग्रेज़ी के ख़िलाफ़ जी भर कर भड़ास निकालने के बाद अंत में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर रह चुके नेमाड़े ने इस 'विदेशी' भाषा के लिए एक रियायत दी.

"अंग्रेज़ी रहे, लेकिन शिक्षा का माध्यम नहीं बनना चाहिए."

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