भारत से निर्यात बढ़ना तय: आईआईएफ़टी

भारत रुपया इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK

दुनिया की आर्थिक स्थिति इस वक़्त बहुत अच्छी नहीं है और भारत भी इससे अछूता नहीं है.

मोदी सरकार के पहले पूर्ण बजट से पहले बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव ने भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (आईआईएफ़टी) के निदेशक सुरजीत मित्रा से बात की.

उन्होंने बताया कि दुनिया में आयात-निर्यात परिदृश्य इस वक्त कैसा है और भारत की इसमें क्या स्थिति है?

पढ़ें, पूरी बातचीत

सवाल यह है कि निर्यात में यह गिरावट क्यों है?

दरअसल यूरोपीय बाज़ार अभी बहुत सुस्त हैं और उनकी विकास दर नकारात्मक है. अमरीकी बाज़ार बुरी तरह प्रभावित हैं और इसी तरह जापान भी. इसके बाद आपके पास दक्षिण अमरीकी, अफ़्रीकी और एशियाई बाज़ार ही बच जाते हैं- अब इनमें भीड़ हो गई है.

दो साल की दिक्कतें

पिछले दो साल में भारत ने ऐसे उत्पादों और बाज़ारों की पहचान की है जहां प्रतिस्पर्धा में उन्हें फ़ायदा हो सकता है. इस दिशा में काम किया जा रहा है और निर्यात भी सुधर रहा है.

इमेज कॉपीरइट Getty

लेकिन निर्यात आपकी घरेलू अर्थव्यवस्था का भी एक अंग है. यह भी देखना होगा कि आप मात्रा, गुणवत्ता और मूल्य के लिहाज से कितने प्रतियोगी माहौल में उत्पाद बना रहे हैं.

पिछले दो साल से राजनीतिक रूप से दिक्कत रही है. विधेयक पास नहीं हो पा रहे थे और सरकार फ़ैसले नहीं ले रही थी, इससे घरेलू अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई.

इसके अलावा महंगाई की समस्या थी, खाद्य पदार्थों की कीमतें चढ़ी हुई थीं और बेरोज़गारी थी क्योंकि निर्माण उद्योग सुस्त था- जिससे लागत बढ़ गई थी.

नीतिगत समस्याएं भी थीं. ऊर्जा क्षेत्र में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा योगदान करने वाला खनन उद्योग बुरी तरह प्रभावित था. कोयला उत्पादन हो नहीं रहा था, जिससे ऊर्जा क्षेत्र पर सीधा असर पड़ा था.

फिर पर्यावरण अनुमति को लेकर भी बाधाएं खड़ी हो गई थीं.

मौका और चिंताएं

इमेज कॉपीरइट AFP

अब पूरी अर्थव्यवस्था में स्थायित्व आ गया है. अब एक ऐसी सरकार है जिसके पास पूर्ण बहुमत है और वह उन नीतियों को आगे बढ़ा सकती है, जिन्हें वह पसंद करती है. वह नीतिगत फ़ैसले ले सकती है और उन पर वह क़ायम भी रह सकती है.

इससे घरेलू अर्थव्यवस्था को बहुत फ़ायदा हो सकता है और एक बार घरेलू अर्थव्यवस्था उत्पादन करने लगे तो निर्यात ख़ुद ही बढ़ जाएगा.

राजकोषीय घाटा अब भी बहुत ज़्यादा है लेकिन यह कम हो रहा है, जो बहुत अच्छा संकेत है.

महंगाई भी कम हो रही है और रिजर्व बैंक ने कहा है कि वह ब्याज़ दर घटा सकता है. इससे कर्ज़ लेना आसान होगा, उत्पादन को रफ़्तार मिलेगी और निर्माण लागत घटेगी.

इस तरह से देखें तो यह एक बहुत कमाल का मौका है और अगर ऐसा होता है तो निर्यात को रफ़्तार मिलना तय है.

इमेज कॉपीरइट bbc

लेकिन चिंता के कुछ विषय भी हैं. पहली बात तो यह कि तमाम बातों के बावजूद रूस समेत पूरे यूरोप का बाज़ार बहुत सुस्त है. एशियाई बाज़ार भी तेज़ी नहीं पकड़ रहे हैं. यहां विकास दर एक फ़ीसदी से भी कम रही है.

पश्चिम एशिया में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से वहां 5.5 फ़ीसदी से ज़्यादा की गिरावट आई है और हमारा 15 प्रतिशत से ज़्यादा निर्यात वहीं होता था.

सुधार की ज़रूरत

ऐसी कुछ दिक्कते हैं जिन्हें हम खुद दूर नहीं कर सकते. लेकिन अच्छी बात यह है कि हमारे अफ़्रीका, दक्षिण एशिया का व्यापार काफ़ी सुधरा है और उत्तरी अमरीका का व्यापार बढ़ा है.

रत्न और आभूषण जैसी बहुत सी कीमती चीज़ें अमरीका निर्यात की जाती हैं. रत्न और आभूषणों का हमारे निर्यात में 14 फ़ीसदी का योगदान है.

पिछले दो साल में रत्न और आभूषण निर्यात में भी गिरावट थी, उम्मीद है कि यह फिर रफ़्तार पकड़ेंगे.

इमेज कॉपीरइट Reuters

इसके बाद बारी आती है निर्माण उद्योग की. हालांकि निर्यात में इसका हिस्सा सिर्फ़ 3.5 फ़ीसदी ही है, लेकिन यह बढ़ सकता है.

आने वाले सालों में निर्माण उद्योग का ढांचा बेहतर होगा, ऐेसे में हमारे उत्पाद ज़्यादा प्रतियोगी साबित हो सकेंगे.

हालांकि हम दुनिया के सबसे बड़े पेट्रोलियम आयातकों में से एक हैं, लेकिन हम पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यातक भी हैं और इसका बाज़ार बेहतर हुआ है.

इसमें गुंजाइश बहुत हैं और यह हम पर है कि अपनी नीतियों से इसका फ़ायदा उठाएं. सुधार के दूसरे चरण को लागू करें, नए क्षेत्रों को खोलें, श्रम सुधार लागू करें.

इस सरकार ने बहुत सुधारों के दूसरे चरण को लागू करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है.

इमेज कॉपीरइट Reuters

ऐसा नहीं है कि इससे बहुत कमाल का विकास होगा, लेकिन हां इससे विकास को रफ़्तार ज़रूर मिलेगी.

बढ़ेगा एफ़डीआई

विदेशी निवेशकों की कई शिकायतें थीं. उनका कहना था कि हम बहुत संरक्षणवादी हैं, श्रम सुधार न होने की वजह से दिक्कतें हैं, उचित आधारभूत ढांचा नहीं है, अफ़सरशाही की वजह से होने वाली देरी और सबसे बढ़कर नीतिगत अस्थिरता है. इस सरकार ने साफ़ कर दिया है कि नीतियां स्थाई रहेंगी.

नई सरकार ने अपनी नीतियों की घोषणा कर दी है और समय-समय पर कर रही है.

आप देश में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के तत्व को देखिए- यह ज़्यादा उत्पादक निवेश है. फिर अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुधार आ रहा है.

इमेज कॉपीरइट AFP

जब 2008 में संकट आया था तो लोगों ने अपना पैसा निकाल लिया था और अमरीका में निवेश कर रहे थे क्योंकि वह ज़्यादा सुरक्षित निवेश था.

लेकिन अब वह पैसा बाहर आएगा. एक बार वह पैसा निकलेगा तो उसके लिए चार ठिकाने हैं. पहला है चीन, दूसरा है ब्रिक्स देश. तीसरा है भारत और चौथा है मध्य पूर्व.

इसलिए मुझे लगता है कि आने वाले सालों में भारत में एफ़डीआई बढ़ेगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार