आठ ग़लतियां, जो नीतीश को पड़ेंगी भारी!

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जो लोग बिहार की राजनीति के फ़िसलन भरे रास्तों से वाकिफ़ हैं, वह तब तक दम साधे रहेंगे जब तक नीतीश कुमार बिहार विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर देते.

उनके पास बहुमत साबित करने के लिए तीन हफ़्ते हैं, लेकिन बहुत संभव है कि वह ऐसा न कर पाएं और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग जाए.

Image caption कुछ ही दिन पहले नीतीश कुमार और मांझी समर्थक आपस में भिड़ गए थे.

अगर ऐसा मान लिया जाए कि वह बहुमत साबित कर देते हैं तो कुछ ऐसी राजनीतिक गल़तियां हैं जिनसे बचने की उन्हें सलाह है.

1-नकारात्मक प्रचार

पिछले साल लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने नकारात्मक प्रचार किया और राज्य की ख़स्ता हालत के लिए केंद्र और भाजपा को दोष देते रहे.

भाजपा को भी दिल्ली में नकारात्मक प्रचार की कीमत चुकानी पड़ी है.

लोग अब सत्ता में रहते हुए बच्चों की तरह रोने वाली सरकारों से ऊबने लगे हैं.

2-प्रधानमंत्री से बचना

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नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी ने एक-दूसरे से अपनी चिढ़ को छुपाने की कोशिश कभी नहीं की.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो तब भाजपा नेताओं के साथ रात्रिभोज को ही निरस्त कर दिया था जब पता चला कि उस समय नरेंद्र मोदी भी पटना में होंगे.

लेकिन अब वह प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों की उपेक्षा नहीं कर सकते.

3-'जंगल राज' की वापसी

लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी के कार्यकाल को बहुत से लोग 'जंगल राज' कहते थे.

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भाजपा इसकी याद दिलाने में चूक नहीं रही है कि नीतीश कुमार और उनके 'बड़े भाई' लालू प्रसाद और कांग्रेस अब साथ आ गए हैं.

4-वापस न लौटना

नीतीश कुमार अगले छह महीने में क्या कर सकते हैं? अब उनके पास न तो समय है और न ही सुख कि वह बड़ी घोषणाएं करें.

उन्हें अब बड़ी घोषणाएं करने से बचना चाहिए और उन वायदों को पूरा करना चाहिए जो उन्होंने वर्ष 2010 में किए थे.

5-मांझी की योजनाओं को रोकें

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नीतीश कुमार को उन सभी परियोजनाओं की व्यावहारिकता की जल्द और पारदर्शी समीक्षा करनी चाहिए जिनकी घोषणा जीतनराम मांझी ने की थी.

इसके साथ ही उन तथ्यों को सार्वजनिक करना चाहिए ताकि वह इस अंदेशे को नकार सकें कि उन्होंने मांझी से उचित व्यवहार नहीं किया और उनका अपमान किया.

6-मांझी को पार्टी बनाने दें

हालांकि मांझी की पार्टी, जब भी वह इसे बनाने का फ़ैसला करें, आधा दर्जन से ज़्यादा सीटें नहीं जीत सकती, लेकिन वह कई सीटों पर जीत और हार का फ़ैसला कर सकती है.

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अगर नीतीश खुद को एक कुशल राजनेता मानते हैं तो उन्हें मांझी के साथ सुलह का रास्ता निकालना होगा, उन्हें सही जगह देनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके सहयोगी मांझी का मज़ाक न बनाएं.

7-विधानसभा: अपने और प्रधानमंत्री के बीच चुनाव बनाना

हालांकि दिल्ली के अनुभव के बाद भाजपा बिहार चुनावों में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को घोषित करने से बचेगी, लेकिन केंद्र सरकार चुनाव से पहले राज्य में कई परियोजनाओं की घोषणा कर सकती है ताकि प्रधानमंत्री उन्हें पूरा करने के नाम पर भाजपा के लिए वोट मांगें.

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अगर नीतीश खुद को मोदी के बरअक्स खड़ा करने की कोशिश करते है तो वह भाजपा के जाल में फंस जाएंगे.

8-केजरीवाल से सीख न लेना

हालांकि नीतीश कुमार ने केजरीवाल की तर्ज पर 'सॉरी' बोला और ग़लती की माफ़ी मांगी है, लेकिन ऐसा लगता नहीं कि वह केजरीवाल अवधारणा को पूरी तरह समझ पाए हैं.

सत्ता छोड़ने के लिए माफ़ी मांगकर वह सिर्फ़ लोगों का ध्यान, खुद में एक हद तक मौजूद अभिमान, की तरफ़ ही खींच पाए हैं.

लेकिन केजरीवाल अवधारणा यह बताती है कि लोग अपने नेताओं के पहुंच में होने, ज़िम्मेदार के साथ ही थोड़ी नम्रता भी चाहते हैं.

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