राहुल गांधी का 'छुट्टी' पर जाना

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सक्रिय राजनीति से कुछ दिनों की छुट्टी लेने का राहुल गांधी का फ़ैसला ऐसे समय पर आया है जब कांग्रेस पार्टी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है.

इससे पहले, कांग्रेस पार्टी के दो दिग्गज जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी भी इस तरह के फ़ैसले ले चुके हैं, लेकिन राहुल गांधी का मामला नेहरू और इंदिरा के ऐसे कदमों से बिल्कुल अलग है.

हालाँकि नेहरू और इंदिरा दोनों ने तब ऐसा फ़ैसला किया था जब वो ताक़तवर थे. नेहरू ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी और कांग्रेस संसदीय बोर्ड से पहले 1948 में और फिर 1958 में इसके लिए अनुमति मांगी थी, लेकिन पार्टी ने इनकार कर दिया था.

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1948 में नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन की सफलता से काफी व्यथित थे. उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर आचार्य कृपलानी को हराया था और सरदार पटेल ने टंडन का समर्थन किया था.

टंडन का इस्तीफ़ा

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Image caption कांग्रेस के कुछ नेता राहुल गांधी को नेतृत्व सौंपने के ख़िलाफ़ हैं.

नेहरू ने इस स्थिति में काम करने से मना कर दिया था जिसके कारण कुछ दिनों बाद ही टंडन को अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.

1958 में भी नेहरू ने पद छोड़ने की इच्छा जताई थी. उन्होंने राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से कहा था कि वो दिन प्रतिदिन के काम से छुटकारा पाना चाहते हैं और एक आम आदमी का जीवन जीना चाहते हैं.

दरअसल, नेहरू की इच्छा थी कि वो किताबें पढ़ें, दोस्तों से मिलें और पूरे देश की यात्रा करें. लेकिन नेहरू ऐसा नहीं कर सके. बड़े पैमाने पर कांग्रेस सांसदों और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने उन्हें ऐसा करने से रोक लिया.

इंदिरा गांधी का पत्र

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इंदिरा गांधी ने भी उस वक्त सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग करने की इच्छा जताई थी जब वो आधिकारिक तौर पर प्रधानमंत्री निवास पर अपने पिता जवाहर लाल नेहरू की ओर से अतिथियों की मेज़बानी करती थीं.

इंदिरा ने अपनी मित्र डोरोथी नॉर्मन को लिखा था कि वो खुद को अस्थिर और बंधक महसूस कर रही हैं.

उन्होंने लिखा था, "मैं जब छोटी बच्ची थी तभी से ऐसा लगता है जैसे मुझसे कोई काम ज़बरन कराया जा रहा है. जैसे मेरे ऊपर कोई कर्ज़ है जिसे मैं उतार रही हूं. लेकिन अचानक ऐसा लग रहा है जैसे कर्ज़ अदा कर दिया गया. ख़ैर मुझे आश्चर्यजनक रूप से ऐसा लग रहा है कि मैं सब कुछ छोड़छाड़ दूं और दूर कहीं पहाड़ों पर चली जाऊं."

योग्यता बनाम वंशवाद

हालाँकि अगले कुछ महीनों में इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष निर्वाचित हो गईं और पार्टी में ही कई लोगों के लिए ये चौंकाने वाली ख़बर थी.

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1959 में नेहरू के कुछ आलोचकों ने इस बात को लेकर उनकी काफी खिंचाई की कि उन्होंने अपनी बेटी को आगे बढ़ाने के लिए उसे अध्यक्ष बनाया, लेकिन उस युग के तमाम कांग्रेसी नेताओं को यही लगा कि इंदिरा गांधी ने ये जगह अपनी योग्यता से पाई थी.

उन्होंने केरल के संकट सुलझाया और भाषाई समस्या हल करने के लिए गुजरात और महाराष्ट्र को अलग राज्य बनाने का सुझाव दिया.

1960 में जब इंदिरा गांधी का कार्यकाल समाप्त हुआ, कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने बहुत कोशिश की और उनसे निवेदन किया कि वो दोबारा अध्यक्ष के लिए अपनी दावेदारी पेश करें, लेकिन इंदिरा ने दृढ़तापूर्वक मना कर दिया.

नेहरू, इंदिरा, राहुल

नेहरू और इंदिरा के विपरीत, राहुल का विश्राम के बाद, स्वीकार्यता और आकर्षक अंदाज़ में लौटने की रणनीति कहीं ज़्यादा चुनौतीपूर्ण दिख रही है. आज की कांग्रेस पार्टी में राहुल की स्वीकार्यता और उनका आदर परिवार विशेष का होने के नाते है न कि उनके काम की वजह से या फिर उनकी नेतृत्व शैली के कारण.

निजी तौर पर आज कई कांग्रेस कार्यकर्ता ये कहते हुए भी सुने गए कि राहुल गांधी राजनीति छोड़ दें और बेंगलुरु में होने वाली अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में प्रियंका गांधी को पार्टी में शामिल किया जाए.

कांग्रेस का एक वर्ग मानता है कि राहुल का छुट्टी पर जाना हो सकता है उनका निजी फ़ैसला हो सकता है. वहीं कुछ लोग ये भी मान रहे हैं कि राहुल ने ये क़दम इसलिए उठाया है ताकि वो इस बात का मूल्यांकन कर सकें कि उनके इस क़दम को पार्टी में किस तरह से लिया गया है.

हाल ही में कांग्रेस के कुछ नेताओं ने सोनिया गांधी से नेतृत्व सँभाले रहने की अपील की थी, जबकि पार्टी नेताओं का एक छोटा वर्ग ख़ासकर दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपने के पक्ष में आवाज़ उठाई है.

सोनिया गांधी 1998 से कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष हैं और इस तरह से वो पार्टी की सबसे लंबे कार्यकाल वाली अध्यक्ष बन गई हैं.

कांग्रेस का 'अंधकार युग'

साल 2015 की शुरुआत में सबसे पहले तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी के सफ़ाए ने और फिर पार्टी के मुख्यालय 24 अकबर रोड को खाली करने संबंधी नोटिस ने पार्टी को और परेशानी में डाल दिया है.

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस पार्टी को इतने वोट भी नहीं मिले जितने कि उसकी प्राथमिकता सदस्यता वाले लोग हैं. हालांकि पार्टी इसे इस तरह से भुलाने की कोशिश कर रही है कि दिल्ली में भाजपा को 29 लाख वोट ही मिले हैं जबकि उसके प्राथमिक सदस्यों की संख्या 30 लाख के क़रीब है.

लेकिन सच्चाई यही है कि दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए इतने बुर रहे कि इतनी ख़राब स्थिति शायद कभी नहीं हो सकती.

लेकिन पार्टी को जो सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात है वो ये कि कांग्रेस की जगह को आम आदमी पार्टी भर रही है.

आप की सफलता से पता चलता है कि ये बीजेपी की तुलना में कांग्रेस के लिए कहीं ज़्यादा ख़तरा है. आम आदमी पार्टी का एजेंडा प्रगतिशील है और वो समाज के उन सभी वर्गों को आकर्षित कर रही है जो कभी कांग्रेस की रीढ़ हुआ करते थे.

राहुल गांधी का अंदाज़

राहुल गांधी ने 2013 में सीआईआई में इस बात पर ज़ोर देकर कि वो कोई राजकुमार नहीं हैं और वो एक जननेता बनना चाहते हैं, उन्होंने अपने ही मक़सद को साधने की कोशिश की. जब उनसे ये पूछा गया कि केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलता को कैसे सुलझाया जाए तो उनका बेतुका जवाब सुनकर श्रोता भी हैरान रह गए थे.

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उन्होंने कहा था कि वास्तविक मुद्दा केंद्र और राज्य के बीच नहीं बल्कि उन लोगों के बीच है जिनकी आवाजें सुनी जाती हैं और जिनका राजनीतिक प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं है.

यही कारण है कि दिल्ली के मतदाताओं को राहुल लुभाने में नाकाम रहे जबकि केजरीवाल लुभा ले गए और दिल्ली की जनता ने नरेंद्र मोदी को नकार कर उन्हें सत्ता सौंप दी.

कहा जाता है कि विजेता तैमूर 'लंग' ने मशहूर इतिहासकार और समाजशास्त्री इब्न ख़ुलदुन से राजवंशों के भविष्य के बारे में बात की थी.

खुलदुन के मुताबिक किसी भी वंश का गौरव महज़ चार पीढ़ियों तक रहता है. पहली पीढ़ी जीत की ओर बढ़ती है, दूसरी प्रशासन की ओर, तीसरी इन सबसे स्वतंत्र होकर पीढ़ियों की इकट्ठा की गई दौलत को सांस्कृतिक और आनंददायक कार्यों में ख़र्च करती है. और आख़िर में चौथी पीढ़ी तक आते-आते कोई भी राजवंश अपनी दौलत और मानव शक्ति को लगभग ख़त्म कर चुका होता है.

इसलिए हर वंश का पतन उसके उत्थान की प्रक्रिया में ही निहित है. खुलदुन के मुताबिक ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसे टाला नहीं जा सकता.

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