मुसलमानों को आईएस से हमदर्दी क्यों नहीं?

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व्हाइट हाउस ने पिछले हफ़्ते इस्लामी हिंसक चरमपंथ से निपटने के लिए एक शिखर सम्मेलन की मेजबानी की जिसमें भारत का प्रतिनिधित्व सरकार की संयुक्त ख़ुफ़िया समिति (जेआईसी) के अध्यक्ष आरएन रवि ने

किया.

ये समिति देश में हो रही संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रखती है.

आएन रवि ने सम्मेलन में कहा कि भारत में 18 करोड़ मुसलमान रहते हैं जो देश की कुल आबादी का 14.88 प्रतिशत हैं, इसके बावजूद वो वैश्विक इस्लामी चरमपंथी समूहों में शामिल नहीं हैं.

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इंडियन मुजाहिदीन के बारे में कहा जाता है कि वो भारतीय मुसलमानों का देसी चरमपंथी ग्रुप है, लेकिन न तो इसके वजूद का कभी कोई ठोस सबूत मिला है और न ही इसका मुस्लिम समुदाय पर कोई असर है.

अल क़ायदा ने इन मुसलमानों को लुभाने की अनथक कोशिश की, लेकिन नाकाम रहा.

इससे पहले, कश्मीर के कुछ चरमपंथ गुटों ने भारतीय मुसलमानों से उनके संघर्ष में शामिल होने की उम्मीदें कीं, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया.

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अब इस्लामिक स्टेट की चर्चा है, जिसमें इक्का-दुक्का भारतीय मुसलमान युवकों ने शामिल होने की कोशिश की, लेकिन उनकी कहानी वहीं ख़त्म हो जाती है.

इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद दुनिया में सबसे अधिक मुसलमान भारत में रहते हैं. इंडोनेशिया चरमपंथ से मुक्त नहीं है जबकि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का गढ़ माना जाता है.

तो भारतीय मुसलमान 'ग्लोबल इस्लामिक टेररिज़्म' में शामिल क्यों नहीं हैं?

चरमपंथ

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26 नवंबर 2008 को मुंबई पर चरमपंथी हमलों के विरोध में एक सप्ताह बाद शहर के हज़ारों लोग दक्षिण मुंबई की सड़कों पर उमड़ पड़े.

मुझे आज भी वो मंज़र याद है जब मैंने बुर्का पोश मुस्लिम औरतों के हाथों में तख्तियां देखी थीं, जिन पर हिंदी में लिखा था 'आतंकवाद मुर्दाबाद'.

मुझे वो भी दिन याद है जब मैं 1993 में एक अख़बार के लिए रिपोर्ट करने श्रीनगर गया था.

सुरक्षा बलों ने एक बिहारी मुसलमान को चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के इल्ज़ाम में गिरफ्तार किया था.

मैंने अधिकारियों से पूछा, "क्या मेनलैंड इंडिया के मुसलमान कश्मीरी चरमपंथी अभियान में शामिल हैं?"

उनका कहना था 'नहीं'. उनका दावा था गरम कपड़ों और शॉल बेचने के बहाने कश्मीरी चरमपंथी देश भर में जाकर भारतीय मुसलमानों को भड़काने और अपनी मुहिम में शामिल करने का काम करते थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली.

उन्होंने बताया, 'ये युवा अकेला भारतीय मुस्लिम है जो हमारी नज़र में आया है.'

भारत के मुस्लिम समुदाय के अंदर की बात ये है कि ये सभी जानते हैं कि भारतीय मुसलमान अल क़ायदा या इस्लामिक स्टेट से हमदर्दी नहीं रखता और चरमपंथी गतिविधियों में शामिल नहीं होता, लेकिन इसके पीछे के कारणों के बारे में सबकी राय अलग-अलग है.

इनमें से कुछ राय ये हैं-

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लोकतंत्र और सेक्युलर देश: आम मुसलमान को देश के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास है, जिसके अंतर्गत 'अनेकता में एकता' पर ज़ोर दिया जाता है. इसके कारण भारत का मुसलमान देशभक्त है.

सूफ़ी और भक्ति मुहिम का असर: अगर आप हज़रत निजामुद्दीन दरगाह जाएँ या अजमेर की दरगाह, वहां पर आपको सभी धर्मों के लोग मिल जाएंगे. सूफी और संत का इस देश में सभी सम्मान करते हैं. मुसलमान खुद को समाज से अलग-थलग महसूस नहीं करते.

हिंदू धर्म और सहनशीलता: हिंदुत्व परिवार की हिंदू विचारधारा की बात को अलग रखें तो कई मुसलमान ये मानते हैं कि असली हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोग मुस्लिम विरोधी नहीं हैं और हिंदू समाज में ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है. भारत के मुसलमान पर हिंदू विचारधारा और संस्कृति का असर है, जिसके कारण यहाँ का मुसलमान इस्लामिक चरमपंथ से दूर रहता है.

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पाकिस्तान की ख़राब स्थिति: भारत का मुसलमान अपने पूर्वजों का शुक्र अदा करता है कि वो बंटवारे की गरम हवा में नहीं बहे और अपने देश में रहने का फ़ैसला किया. आज भारत का मुसलमान पाकिस्तान में चरमपंथी सरगर्मियों, हिंसा और वहां के कट्टरवादी मुसलमानों को हिक़ारत से देखता है.

मज़हबी आज़ादी: भारत के मुसलमानों को इस बात पर इत्मीनान है कि उसे अपने मज़हब पर चलने की पूरी आज़ादी है. देशभर में मस्जिदें रोज़ बन रही हैं, मदरसे रोज़ खुल रहे हैं और यहाँ तक कि आज़ान की आवाज़ हिंदू बहुल इलाक़ों में भी दिन में पांच बार गूंजती है.

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